दिल्ली ऊंचा सुनती है...!

आंदोलन , , बृहस्पतिवार , 06-04-2017


jatarmantarandolan

अरविंद कुमार सिंह

लोकतंत्र की आवाज और उसका सुर कैसे कमजोर पड़ता जा रहा है जंतर-मंतर उसकी जीती-जागती नजीर है। देश के लोगों को कभी सत्ता के कानों तक अपनी आवाज पहुंचानी होती थी तो वो राजपथ से सटे वोटक्लब पर अपनी रैलियां करते थे। उन रैलियों का अपनी अहमियत होती थी। और वहां होने वाला कोई भी कार्यक्रम अखबारों की राष्ट्रीय सुर्खियां बनता था। लेकिन समय के साथ सत्ता की ताकत मजबूत और लोकतंत्र कमजोर होता गया। इसका नतीजा ये निकला कि वोट क्लब पर होने वाली उन रैलियों पर पाबंदी लगा दी गई।

उसके बाद कुछ दिनों तक लालकिले के पास के मैदान को इस तरह के आयोजनों के लिए दिया जाने लगा। लेकिन बाद में उस पर भी रोक लगा दी गई। फिर आखिर में रामलीला के साथ जंतर-मंतर को इस काम के लिए चुना गया। हालांकि रामलीला में पहले भी कार्यक्रम होते रहे हैं। लेकिन अब अगर किसी को कोई बड़ी रैली करनी हो तो राजधानी में उसके लिए स्थान नहीं है। यानी आप चाहकर भी कोई बड़ा कार्यक्रम नहीं कर सकते हैं।

कुल मिलाकर अब जंतर-मंतर है। इस पर भी बीजेपी के सत्ता में आने के साथ ही बाबाओं और धर्माचार्यों के साथ साथ कथित गौरक्षकों का कब्जा हो गया है। अगर कोई प्रदर्शन करना भी चाहे तो उसके लिए जगह खोजना मुश्किल हो जाता है। बावजूद इसके जंतर- मंतर पर साल के बारहों महीने धरना-प्रदर्शन चलता रहता है। देश के कोने-कोने से लोग अपनी समस्याओं को लेकर यहां आते हैं।

ऐसा नहीं है कि सारे लोग यहां सच्चे मन से आते हैं। या अपनी मांगों के प्रति उतने ही ईमानदार होते हैं। यहां बहुत सारे ऐसे भी लोग धरना प्रदर्शन करते हैं जो अपने नेताओं की अवसरवादिता के शिकार हो जाते हैं। कुछ लोगों की तो मांगे ही अजग-गजब होती हैं। फिर भी कुछ व्यक्ति या संगठन अपना घर-परिवार छोड़कर ठंडी, गर्मी और बरसात में यहां डटे रहते हैं। क्या इसका कारण महज मीडिया की सुर्खियां बनना है या कुछ और है। इस बार हमने इसी सवाल का जवाब ढूढ़ने की कोशिश की है।

 

 

जंतर-मंतर पर धरना दे रहे पूर्व सैनिक फोटो: जनचौक

सरहद के बाद अब घर में लड़ाई

अर्जुन कागले भारतीय सेना के जांबाज सिपाही रहे हैं। लेकिन सीमा पर खून-पसीना बहाने के बाद अब उन्हें अपने घर में भी लड़ना पड़ रहा है। 1965 और 1971 की लड़ाई में बतौर सैनिक शामिल रहे इस जांबाज सिपाही को सरकार ने कोटा में 15 बीघा जमीन पट्टे पर दी थी। लेकिन कब्जा पाने की बात तो दूर सीलिंग में सरकार ने फिर से उनसे जमीन छीन ली। अब सरकार के इस तुगलकी फैसले के खिलाफ राजस्थान से लेकर दिल्ली तक का उन्हें चक्कर काटना पड़ रहा है। जमीन तो नहीं मिली जेब से पैसे ऊपर से जा रहे हैं। जंतर-मंतर पर महीनों तक बैठने के बाद भी न तो केंद्र सरकार सुन रही है और न ही उसका कोई महकमा। कहने को तो केंद्र में राष्ट्रवादी सरकार है और सेना के नाम पर वोट भी बटोरने से पीछे नहीं रहती। लेकिन उसका मुखौटा तब उघड़ जाता है जब अर्जुन कागले जैसे लोग सामने आ जाते हैं। 

 

जंतर-मंतर पर आंदोलन फोटो: जनचौक

ताकि चेहरा चमकता रहे

जनाब ने पार्टी का नाम भी रखा तो उसमें पब्लिक पहले लगा दिया और फिर बन गयी पब्लिक पोलिटिकल पार्टी। शायद उन्हें अपनी पार्टी का भविष्य और उसकी हैसियत का पहले से ही एहसास हो गया था। इसलिए अकेले धरना पर बैठने के बावजूद जरूरी पब्लिक की कमी अपनी पार्टी के नाम से पूरा कर लेते हैं। इस देश में आरक्षण ऐसी मिठाई हो गयी है जिसे हर कोई खाना चाहता है। फिर मधुबनी के जयकुमार झा जी कहां पीछे रहते। उन्हें भी लगा कि इसके जरिये अपना नाम आगे बढ़ाया जा सकता है। और अगर स्थान दिल्ली हो तो प्रचार-प्रसार जल्दी हो जाएगा। लिहाजा पहुंच गए जंतर-मंतर पर अपने साजो सामान के साथ। अकेले बैठने की बात पर उन्होंने कहा कि लोग आते हैं और कुछ देर रहने के बाद चले जाते हैं। इनका धरना पब्लिक पोलिटिकल पार्टी के बैनर के नीचे 8 दिसंबर 2016 से जारी है। 

 

 

जंतर-मंतर पर आंदोलन फोटो: जनचौक

रामराज्य और विश्व स्वराज के राजदूत

मिलिए छत्तीसगढ़ के जशपुर से आए श्री मुक्तिराम से। जनाब इतनी दूर से अकेले इतना बड़ा काम लेकर चले आए हैं। काम है रामराज्य एवं विश्व स्वराज को स्थापित करना। रामराज्य और विश्व स्वराज क्या होता है शायद ही उन्हें पता हो। और लेकिन ये उन्हें किसी भी कीमत पर चाहिए और उससे कम पर कत्तई कोई समझौता नहीं करेंगे। रामराज्य तो मौजूदा सरकार के बायें हाथ का खेल है लेकिन इसको संविधान में कैसे शामिल करेगी उसके लिए भी हल न होने वाले किसी एलजबरा के सूत्र कम नहीं है। लेकिन विश्वस्वराज के लिए क्या करेंगे ये अभी भी सवालों के घेरे में है।

इतनी बड़ी मांग के लिए इतना छोटा पोस्टर बताता है कि मुक्तिराम जी के हौसले बुलंद हैं। उनके हाव भाव को देखकर ऐसा लगता है कि इस मुद्दे से तो वो शायद ही इस जीवन में मुक्त हो पाएंगे। लेकिन उनके भीतर के जज्बे को देखकर कहा जा सकता है कि वो सरकार को भी मुक्त नहीं होने देंगे। लिहाजा उनका धरना जारी रहेगा कभी जंतर-मंतर तो कभी रायपुर में। और अगर किसी ने उनको यूएन का नाम बता दिया तो फिर विश्व स्वराज के लिए वहां भी जाने से वो पीछे नहीं हटेंगे। मजेदार बात ये है कि उनके साथ उनके चार पांच समर्थक भी हैं। अब उन्हें कौन बताये कि राम राज्य और विश्व स्वराज ऐसी चीज नहीं है जिसे सरकार जब चाहेगी उठा कर उन्हें दे देगी।

 

 

जंतर-मंतर पर आंदोलन फोटो: जनचौक

लॉलीपॉप नहीं चलेगा

कहने को तो केंद्र सरकार ने पूर्व सैनिकों के पेंशन के मामले को हल कर दिया है और कुछ चुनावों में इस पर उसने वोट भी बटोर लिए हैं। लेकिन जंतर-मंतर पर बैठे ये पूर्व सैनिक उसकी कलई खोल देते हैं। ये लोग 14 जून 2015 से जंतर-मंतर पर धरना दे रहे हैं। धरने पर बैठे इन पूर्व सैनिकों का कहना है कि सराकर जिस तरह से पेंशन का निर्धारण कर रही है उससे पूर्व सैनिकों और उनकी विधवाओं को काई फायदा नहीं हो रहा है। लिहाजा ये लोग अपनी मांगों पर धरना जारी रखेंगे। लेकिन देखते हैं राष्ट्रवादी सरकार कब इनकी तरफ अपना मुंह करती है। 

 

जंतर-मंतर पर आंदोलन फोटो: जनचौक

जाट फिर मैदान में

देश की राजधानी दिल्ली जाटलैंड का ही एक हिस्सा मानी जाती है। लिहाजा इस समुदाय के एक बड़े तबके का मानना है कि यहां किसी और से ज्यादा उनकी चलनी चाहिए। ये नजरिया न केवल सिद्धांत में बल्कि मौके-मौके पर व्यवहार में भी दिखता रहा है। वो महेंद्र सिंह टिकैत का किसान आंदोलन रहा हो या फिर चौधरी देवीलाल की दिल्ली की सत्ता पर दावेदारी। इन लोगों ने कई बार अपनी ताकत दिल्ली को बतायी है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब जाटों ने पूरे हरियाणा को अपने कब्जे में लेकर सुरक्षा बलों की नाक में दम कर दिया था।

तकरीबन एक हफ्ते तक हरियाणा पर भीड़ का राज था। कानून-व्यवस्था की ऐसी की तैसी करने में उन्होंने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। जब मामले की जांच हुई तो जाटों की अराजकता साबित हो गयी। अब जब कानून अपना काम कर रहा है तो उनके लोग दिल्ली तक उसका हाथ पकड़ने आ गए हैं। धरने पर बैठे ये लोग अपने साथ अन्याय होने की बात कह रहे हैं। और अपने खिलाफ दायर सभी मुकदमों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। 

 

 

जंतर-मंतर पर आंदोलन फोटो: जनचौक

उम्मीदों का पहाड़

जम्मू-कश्मीर के डोडा के रहने वाले केसरी शशि कुमार को भले एक धरने से सफलता नहीं मिली लेकिन वो निराश नहीं हुए। देश के लोकतंत्र और उसकी व्यवस्था में उनकी गहरी आस्था है इसीलिए वो दोबारा जंतर-मंतर पर धरने पर बैठ गए हैं।

केसरी जी का कहना है कि जम्मू में आठ लोगों की हत्या कर दी गयी थी जो निर्दोष थे। लिहाजा उस मामले की सीबीआई से जांच होनी चाहिए। हालांकि उनकी आवाज अभी तक सत्ता के सर्वोच्च ठिकाने तक नहीं पहुंची है लेकिन उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस बार वो कामयाब जरूर होंगे। केसरी जी 99 दिन का धरना देने के बाद 6 जनवरी 2014 को समाप्त कर दिए थे। लेकिन एक बार फिर उम्मीदों का पहाड़ लेकर दिल्ली पहुंच गए हैं।

 






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हा ..पर इनके बारे आपने सूचना दी ये एक अच्छी बात है ......जन्तर मन्तर पर आना ही दर्द को रेखांकित तो करता ही है उस व्यक्ति की नजर में जो बैठा है और जो संवाद चाहता है ..