ऊना कांड बरसी: दलित उत्पीड़न और भीड़ हत्याओं के खिलाफ लड़ाई का संकल्प

आंदोलन , अहमदाबाद, बुधवार , 12-07-2017


jignesh-sammelan-kanhaiya-dalit-uan-barsi-ahmadabad

कलीम सिद्दीकी

अहमदाबाद। ऊना दलित आंदोलन की बरसी पर राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच की ओर से गौ आतंक और भीड़तंत्र के खिलाफ एक दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। ऊना आंदोलन के नेता जिग्नेश मेवानी के बुलावे पर हुए इस सम्मेलन में जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रतनलाल समेत भीड़ हत्या के शिकार पहलू खान और जुनैद के परिजनों ने हिस्सा लिया। सभी ने एक स्वर में जातीय उत्पीड़न और भीड़ हत्या के खिलाफ लड़ाई लड़ने का संकल्प जाहिर किया। 

अधूरा रह गया दलितों का संकल्प 

राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के संयोजक जिग्नेश मेवानी ने कहा कि ऊना आन्दोलन 1927 में बाबा साहेब के महाड़ सत्याग्रह जैसा था। जिसने बीजेपी और संघ को मुंह तोड़ जवाब देने का काम किया। उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष 20 से 25 हज़ार दलितों ने शपथ ली थी कि वो अब मैला नहीं उठाएंगे, गटर में नहीं उतरेंगे, मृत पशुओं की खाल निकालने का काम नहीं करेंगे और उसके बदले सरकार से वैकल्पिक रोज़गार के तौर पर पांच एकड़ ज़मीन मांगेंगे। लेकिन वो संकल्प अधूरा रह गया। क्योंकि सरकार ने अब तक वैकल्पिक रोज़गार की व्यवस्था नहीं किया। जिग्नेश ने कहा कि इसीलिए उनके संगठन ने दलित आन्दोलन में अस्मिता के साथ-साथ आर्थिक मुद्दों को भी जोड़ने की रणनीति बनायी है। उनका कहना था कि दलित-मुस्लिम एकता को और मजबूत किया जायेगा। धर्म, जाति के नाम पर हो रहे उत्पीड़न तथा भीड़ द्वारा हो रही हत्याओं का पुरजोर तरीके से विरोध किया जाएगा। और इसी कड़ी में दलित और मुस्लिम एकता और मजबूत होकर उभरेगी।

सम्मेलन में मौजूद लोग।

पीएम मोदी पर निशाना 

इस मौके पर मेवानी ने पीएम मोदी पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि मोदी के गौ रक्षकों की गुंडागर्दी पर मुंह खोलने का भी कोई फायदा नहीं। क्योंकि उनके खिलाफ बोलने के बाद भी घटनाएं नहीं रुक रही हैं। सिर्फ इतना परिवर्तन आया है कि पहले गौ गुंडे जब वीडियो वायरल करने के लिए बनाते थे तो वीडियो में उनका चेहरा भी होता था। अब इस तरह से बनाते हैं कि सिर्फ पीड़ित का ही चेहरा वीडियो में दिखे। 

जिग्नेश ने इस मौके पर राष्ट्र और संविधान को बचाने के लिए एक डेमोक्रेटिक फ्रंट बनाए जाने का भी प्रस्ताव रखा। जिग्नेश ने बताया कि गुजरात में कागज़ पर दलितों को ज़मीन दी गई है लेकिन कब्जा नहीं मिला है। यहां तक कि सरकार ने हाई कोर्ट में हलफनामा देकर माना है कि दलितों की ज़मीनों पर उच्च जाति के लोगों का क़ब्ज़ा है। 

सम्मेलन से बाहर कन्हैया लोगों से बात करते।

हिटलर बनने की कोशिश 

जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया ने कहा कि इस देश में सबसे ज्यादा सेक्युलर मुसलमान हैं। उन्हें सबसे पहला सेकुलरिज्म का ज्ञान जिससे मिला उसका नाम मोहम्मद कासिम है। कन्हैया ने धर्म रक्षा के नाम पर जारी आतंक पर कहा कि हिन्दुओं को भगवान ने बनाया है न कि भगवन को हिन्दुओं ने। भगवान इतना कमज़ोर नहीं है किसी को उसकी रक्षा करनी पड़े। इसी प्रकार से इस्लाम भी इतना कमज़ोर नहीं है। मुसलमानों में दरअसल विश्वास पैदा करने की ज़रूरत है। 

उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि देश के मुसलमान न ही यहूदी हैं न ही वो लोग हिटलर हैं जो हिटलर बनने की कोशिश कर रहे हैं। देश को एक समता मूलक समाज चाहिए न कि भीड़ तन्त्र। ये देश सेक्युलर है और रहेगा। खून-खराबा करने और नफरत एवं घृणा फैलाने वालों के मंसूबे कभी सफल नहीं होंगे। कन्हैया ने कहा कि बिहार दो बार रथ रोक चुका है तीसरी बारी अब गुजरात की है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के दलित उम्मीदवारी पर खुश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि 1984 में सिख नरसंहार के समय ज्ञानी ज़ैल सिंह राष्ट्रपति थे। 2002 में गुजरात नरसंहार के समय अब्दुल कलाम। और अब कोविन्द जी और मीरा कुमार का नंबर है। उन्होंने कहा कि वो सूरत जाकर कपड़ा व्यपारियों के विरोध में शामिल होना चाहते थे। लेकिन उन्हें लोगों ने बताया कि अमरनाथ हमले में मारे गए लोगों में अधिकतर श्रद्धालु सूरत के आस-पास के ही हैं। अब जीएसटी के आदोंलन की ऐसी की तैसी हो गयी। 

'संघ ने की अंग्रेजों की मुखबरी' 

दिल्ली विश्वविद्यालय के परोफेसर रतन लाल ने कहा कि संघियों को घी नहीं पच पा रहा है। पहले इन लोगों ने मुग़लों की गुलामी की। मुगलों के समय मंदिरों और मठों के नाम पर भीख मांग कर सोना जमा किया। फिर अंग्रेजों की मुखबरी की। इसलिए अब जब हाथ में सत्ता आई है तो उसे पचा नहीं पा रहे हैं। ये लोग अपनी विचारधारा को जनता पर थोपना चाहते हैं। भविष्य में आम्बेदकरवाद और मनुवाद को लेकर बड़ा संघर्ष हो सकता है। उसके लिए दलितों समेत पूरी जनता को तैयार रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि दलित समाज के लोग थोड़ा अच्छा कपड़ा भी पहन कर निकलते हैं तो इन संघियों को लगता है ऐसा करने वाले लोग इनके धर्म के खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं। 

‘नॉट इन माई नेम’ के पीछे की कहानी

‘नॉट इन माई नेम’ की आयोजक और फिल्मकार सबा दीवान की नुमाइंदगी करने वाले राजा हैदर ने कहा कि जब सबा दीवान और राहुल रॉय ने फेसबुक पर लिखा ‘नॉट इन माई नेम’ और लोगों का विरोध के लिए आह्वान किया। तो उन्होंने भी नहीं सोचा था कि यह चिंगारी इतनी बड़ी हो जाएगी। उन्होंने बताया कि तक ‘नॉट इन माई नेम’ से 6 देशों और 26 राज्यों में प्रदर्शन हो चुका है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने महसूस किया की कुछ तो गलत हो रहा है लिहाजा उसने मामले की नोटिस ली। और उसका नतीजा भी निकला। प्रधानमंत्री को मुंह खोलने के लिए मजबूर होना पड़ा।

पहलू और जुनैद के परिजनों ने बताई आपबीती 

सम्मलेन पहेलू खान के भतीजे रफ़ीक ने भी अपनी बात रखी। गौरतलब है कि उस मौके पर रफीक भी मौजूद थे और गौरक्षकों ने उनका भी पीट-पीट कर बुरा हाल कर दिया था। उन्होंने पूरे सिलसिलेवार तरीके से घटना का ब्योरा दिया। रफ़ीक के अनुसार अभी तक सभी आरोपी नहीं पकड़े जा सके हैं। जो पकड़े भी गए हैं उनको अगली तारीख पर ज़मानत मिलने वाली है। यहां तक कि उनके छीने गए पैसे और गाय भी उनको वापस नहीं मिल पायी है। 

जुनैद के भाई ने कहा कि ट्रेन में झगड़ा सीट को लेकर नहीं हुआ था। झगड़ा मुसलमान, मुल्ले, गौ मांस खाने वाले और पाकिस्तानी जैसी संप्रदायिक टिपण्णी के चलते हुआ था। उन्होंने कहा कि ये देश किसी एक का नहीं। सब का है। हमारे पूर्वजों ने देश के लिए कुर्बानी दी है। 






Leave your comment