जेएनयू में वामपंथी छात्र संगठनों की अग्निपरीक्षा

आंदोलन , नई दिल्ली , शुक्रवार , 01-09-2017


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। विश्वविद्यालयों में सीटों की कटौती, पाठ्यक्रमों के भगवाकरण, छात्रवृत्ति में कटौती और परिसरों के संघीकरण के बीच जेएनयू और डीयू छात्र संघ का चुनाव होने जा रहा है। केंद्र में संघ-भाजपा सरकार के तीन साल बीत गए हैं। इस दौरान जेएनयू, डीयू, इलाहाबाद, लखनऊ और हैदराबाद विश्वविद्यालय में छात्र आक्रोश चरम पर रहा। देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों में छात्र आंदोलनरत रहे। विश्वविद्यालय परिसर छावनी में तब्दील हो गए। केंद्र सरकार और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सीधे हस्तक्षेप से विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर चोट हुई।

जेएनयू में छात्र संगठनों के पोस्टर

अरावली पर्वत श्रृंखला की पहाड़ियों पर स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पठन-पाठन एवं जनहित के सवालों पर संघर्ष की चर्चा होती रही है। ऐसे में देश के ज्वलंत सवालों से परिसर भी अछूता नहीं रहा। नामांकन के समय अध्यक्ष पद के प्रत्याशियों ने कैंपस के सवालों मसलन नजीब, परिसर में टैंक लगाने,सीटों में कटौती के मुद्दों के साथ ही कैंपस के बाहर के सवालों जैसे बाबा राम रहीम,गौरक्षा के नाम पर दलितों-अल्पसंख्यकों पर होने वाली हिंसा को भी उठाया।

प्रत्याशियों ने कहा कि पिछले तीन सालों से अच्छे दिन का इंतजार कर रहे देशवासियों को गौगुंडों, कथित राष्ट्रवादियों के हिंसा का शिकार होना पड़ा है। उच्च शिक्षा संस्थानों और विश्वविद्यालयों को शिक्षा एवं शोध का केंद्र बनाने के बजाए योग, आयुर्वेद, गौ संरक्षण और राष्ट्रवाद के नाम पर संघी विचारहीनता का गढ़ बनाने की कोशिश की जा रही है।

जेएनयू वाम छात्र संगठनों को गढ़ माना जाता रहा है। कुछ साल पहले तक यहां की छात्र राजनीति आइसा और एसएफआई के बीच ही सीमित थी। बारी-बारी से दोनों छात्र संगठन छात्र संघ का चुनाव जीतते रहे हैं। लेकिन देश की राजनीति और समाज में होने वाले बदलावों के साथ ही जेएनयू की छात्र राजनीति में भी बदलाव देखने को मिल रहे हैं। ऐसे समय में जब देश की राजनीति में संघ-भाजपा का प्रभाव क्षेत्र दिनोंदिन बढ़ रहा है तो जेएनयू भी इससे अछूता नहीं है। संघ-भाजपा से जुड़े छात्र संगठन एबीवीपी का परसिर में आधार बढ़ा है। केंद्र सरकार के कारण एबीवीपी का उत्साह चरम पर है। दलित और अल्पसंख्यकों के हित की बात करने वाला नवगठित छात्र संगठन बापसा ने भी पिछले चुनाव में अपनी धमक दिखई थी। बापसा और वाम छात्र संगठनों के मुद्दों में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है। ऐसे में वाम-जनवादी छात्र संगठनों के सामने अपने कुछ मतभेदों और विरोधाभास को और तीखा करने के बजाए एकजुट होकर जेएनयू जैसे संस्थान में छद्म राष्ट्रवाद का चोला ओढ़े संगठनों को परास्त करने की चुनौती है। वाम छात्र संगठनों के लिए यह अग्निपरीक्षा का दौर है। ऐसे में देखना यह है कि इस बार वे छात्र विरोधी और शिक्षा के निजीकरण के पैरोकार संगठनों को जवाब दे पाते हैं या आपसी अंतर्विरोधों में उलझ कर परास्त होते हैं। 

वामपंथी छात्र संगठनों का प्रदर्शन

प्रत्याशियों ने किया नामांकन

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव के लिए प्रत्याशियों ने अपने नामांकन दाखिल कर दिए हैं।  बुधवार को जारी प्रत्याशियों की अंतिम सूची में अध्यक्ष पद के लिए कुल सात प्रत्याशी हैं जिसमें से पांच महिला और दो पुरुष उम्मीदवार हैं। इस बार सभी छात्र संगठनों ने अध्यक्ष पद के लिए महिला प्रत्याशी को मैदान में उतारा है। अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने वाले दोनों छात्र निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे। छात्रसंघ चुनाव में केंद्रीय पैनल की चार सीटों, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के लिए कुल 21 प्रत्याशी मैदान में हैं।

जेएनयू में इस बार अध्यक्ष पद के लिए छात्राओं के बीच मुकाबला होने जा रहा है। तीन वाम संगठनों आइसा, एसएफआई और डीएसएफ ने वाम एकता का पैनल बनाया है। संयुक्त लेफ्ट यूनिटी पैनल के लिए गीता कुमारी को अध्यक्ष पद के लिए प्रत्याशी बनाया है। वहीं सीपीआई के छात्रसंगठन एआईएसएफ ने अपराजिता राजा को अध्यक्ष, संघ-भाजपा से जुड़े अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने निधि त्रिपाठी और एनएसयूआई ने वृषनिका सिंह और बापसा ने शबाना अली को अपना उम्मीदवार बनाया है।

वाम संगठनों की उम्मीदवार गीता कुमारी इतिहास विभाग में एमफिल कर रही हैं। इससे पहले वह जेएनयू में जेंडर सेल की प्रमुख भी रह चुकी हैं। बिरसा अंबेडकर फुले स्टूटेंड्स एसोसिएशन की उम्मीदवार शबाना अली आर्ट्स एवं स्थेटिक्स विभाग से पीएचडी कर रही हैं। छात्रसंगठन एबीवीपी की उम्मीदवार निधि त्रिपाठी संस्कृत सेंटर में पीएचडी की छात्र हैं।

जेएनयू में छात्रों का प्रदर्शन

जेएनयू छात्र संघ चुनाव का मुद्दा

जवाहरलाल नेहरू छात्रसंघ चुनाव के अध्यक्ष पद के लिए लड़ रहीं छात्राएं बाबा राम रहीम, सीट कटौती और मॉब लिंचिंग को भी विशेष महत्व दे रही हैं। प्रत्याशियों ने अपने भाषण में इन मुद्दों को उठाया। अध्यक्ष पद के अधिकतर प्रत्याशियों ने केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना की। इसके अलावा परिसर से गायब हुए छात्र नजीब अहमद को भी अधिकतर संगठनों ने मुद्दा बनाया। निर्दलीय प्रत्याशी मोहम्मद फारुख आलम ने कहा कि जेएनयू में छात्र और शिक्षक एक साथ मिलकर लड़ाई लड़ते आए हैं। फारुख ने कहा कि प्रधानमंत्री जी ने जो जुमले सुनाए थे अब जनता उनका जवाब मांग रही है। एआईएसएफ की अध्यक्ष पद की प्रत्याशी अपराजिता राजा ने कहा कि जेएनयू प्रशासन ने जबरदस्ती यूसीजी गैजेट को संस्थान में लागू कर दिया। वे इसे मुद्दा बनाएंगी। एनएसयूआई की अध्यक्ष पद की उम्मीदवार वृषनिका सिंह ने कहा कि बीजेपी की सरकार में बच्चे ऑक्सीजन की कमी से मर रहे हैं। वीसी के कैंपस में टैंक रखने वाले बयान पर भी निशाना साधा। एबीवीपी प्रत्याशी निधि त्रिपाठी ने वामपंथी संगठनों पर आरोप लगाया कि उन्होंने छात्रसंघ को अपने हित के लिए इस्तेमाल किया है न कि छात्रों की समस्याओं के लिए। बापसा प्रत्याशी शबाना अली ने कहा कि इस समय देश भर में दलितों और अल्पसंख्यकों पर भीड़ हमला कर रही है। इसे मुद्दा बनाएंगे।

छात्रसंघ के नामांकन के बाद अध्यक्ष पद के सभी प्रत्याशियों को प्रेस वार्ता में पांच मिनट के लिए अपनी बात रखने का मौका दिया गया। इन प्रत्याशियों ने जेएनयू परिसर से लेकर देश-विदेश तक के मुद्दों पर अपनी बात रखी। अब 6 सितंबर को अध्यक्ष पद के उम्मीदवारों को एक डिबेट कार्यक्रम में सभी छात्रों के सामने अपनी बात रखने का मौका दिया जाएगा। 

 

 






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Thakur Prasad :: - 09-02-2017
3 morche me bivajit hokar larna es se bari murkhta kya ho sakti hai.