“प्रो. इलैया का साथ न देना, अपने बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना है”

आंदोलन , एकजूटता, मंगलवार , 03-10-2017


kancha-Ilaiah-solidarity

संजय जोठे

बुद्धिजीवी किसी "एक समुदाय से" जरूर हो सकता है लेकिन किसी "एक समुदाय का" नहीं होता।

भारत जैसे समाज में बुद्धि और बुद्धिजीवियों का अपमान करना और उन्हें सताना एक लंबी परम्परा है। यह बेशर्म परम्परा एक अखंड जोत की तरह जलती आई है, इसके धुएं और जहर ने देश समाज की आँखों को अंधा बना रखा है।

सदियों-सदियों से विचार और तर्क की संभावना को कुचलने वाला ब्राह्मणवाद अब अपने पूरे शबाब पर है। राजनीति अर्थनीति सहित नीति अनीति सब उनके हाथ में है। इसीलिये उनका छुपा हुआ एजेंडा एकदम खुलकर सामने आ गया है।

लेखक कांचा इलैया। फोटो साभार

कांचा इलैया प्रमुख दलित बुद्धिजीवी

प्रोफेसर कांचा इलैया भारत के एक प्रमुख दलित बुद्धिजीवी हैं। उनकी आवाज को खामोश करने का प्रयास करना न केवल दलित बहुजनों के हितों के खिलाफ है बल्कि स्वयं भारत के हितों के खिलाफ है। दलित बहुजन इस देश की पच्चासी (85) प्रतिशत जनसंख्या का निर्माण करते हैं और इन बहुजनों के हित में लिखने वालों को मुट्ठी भर अल्पसंख्यक ब्राह्मणवादी खामोश कराना चाहते हैं।

वो एकजूटता नज़र नहीं आ रही

ये अजीब स्थिति है, इसपर भी दुर्भाग्य ये है कि दलित बहुजन छात्र, छात्र संगठन, आम जनता बड़ी संख्या में प्रोफेसर इलैया के साथ नहीं नजर आ रहे हैं। ये असल में अपने ही बच्चों एक भविष्य से गद्दारी करने जैसी बात है।

समाज के सबसे अँधेरे कोने में रौशनी फैलाने वाली मशाल को सामान्य से ज्यादा देखभाल और सम्मान की जरूरत होती है। दिन की रोशनी में खुले आंगन में जल रही मशालें बुझ भी जाएँ तो कोई नुक्सान नहीं होता लेकिन अँधेरे कोने कंदराओं में जहां देश समाज के खिलाफ सबसे भयानक कीटाणु और बीमारियाँ पनपती हैं वहां तक उस घुटन में जाकर उजाला करने वाले बुद्धिजीवियों की रक्षा करना पूरे देश और समाज की जिम्मेदारी है।

लेखक कांचा इलैया के समर्थन में 2 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ।

मध्यकालीन मानसिकता

ये जिम्मेदारी जिन देशों और समाजों ने ठीक से उठाई है वे सभ्य हो सके हैं। तमाम संघर्षों के बावजूद यूरोप अमेरिका ने सिद्ध किया है कि वे विज्ञान तकनीक और लोकतंत्र के विकास के साथ सामाजिक और वैचारिक रूप से भी आगे बढ़ रहे हैं। मिडिल ईस्ट साउथ एशिया और विशेष रूप से भारत ने सिद्ध किया है कि ये समाज अभी भी मध्यकालीन मानसिकता में कैद हैं। इन समाजों में ऊपर ऊपर से विज्ञान और तकनीक की चमक जरूर ओधा दी गयी है लेकिन इनका मूल बर्बर और पाषाण कालीन चरित्र अभी भी इनकी चमड़ी के ठीक नीचे छुपा हुआ है।

इलैया जैसे लेखकों की हमें ज़रूरत

भारत को सभ्य बनाने के लिए जरूरी है कि प्रोफेसर कांचा इलैया और उनकी तरह काम करने वाले दलित बहुजन लेखकों चिंतकों कार्यकर्ताओं को सुरक्षा दी जाए। हर बार जब भी इनपर आक्रमण होता है तब तब पूरे दलित बहुजन समाज को मिलकर प्रदर्शन करना जरूरी है ताकि भारत के मुट्ठीभर शोषक ये जान सकें कि भारत की बहुजन जनसंख्या अपने भविष्य के लिए जागरूक और संगठित हो रही है। 

आइये प्रोफेसर कांचा आइलैया के पक्ष में और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में आवाज बुलंद करें। 

(लेखक एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और सामाजिक विषयों पर लंबे समय से बेबाक लेखन कर रहे हैं। आप ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।)






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ram sharan joshi :: - 10-06-2017

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