जेल में मेधा के साथ अपराधियों जैसा सलूक, सोने के लिए चटाई तक नसीब नहीं

विशेष , धार जेल से लौटकर, बृहस्पतिवार , 24-08-2017


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पुष्पराज

(मेधा पाटकर को जमानत मिल गयी है लेकिन अभी वो धार जेल से बाहर नहीं आ पायी हैं। इसके पहले लेखक और पत्रकार पुष्पराज ने उनसे जेल में मुलाकात की थी। पेश है मेधा के साथ उनकी पूरी बातचीत-संपादक)

नर्मदा घाटी के 40 हजार विस्थापितों के पुनर्वास की मांग के लिए चिखल्दा (धार) में अनशन कर रहीं मेधा पाटकर को अनशन के 12 वें दिन मध्य प्रदेश सरकार ने 3 हजार पुलिस की ताकत से गिरफ्तार कर इंदौर के एक अस्पताल में 36 घंटे से ज्यादा समय तक नजरबन्द रखा। फिर 9 अगस्त 2017 को अस्पताल से मुक्त कर धार जेल में बंद कर दिया। मैं 12 अगस्त की शाम म.प्र आया और जेल जाकर उनसे मिलने के एक सूत्री एजेंडे के साथ जेल के बाहर-भीतर की सख्ती थोड़ी ढीली होने  का इंतजार करता रहा। उनके अधिवक्ता और मुक़दमे की पैरवी में लगी आन्दोलन समर्थक समूह की महिलाओं ने बताया था कि जेल में सिर्फ उनके मुक़दमे की पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं और महिलाओं को मिलने की इजाजत है। लेकिन महिलाओं के साथ भी शर्त है कि वे नर्मदा घाटी के विस्थापन प्रभावित गाँवों की ना हों।

मैं जब 12 अगस्त को रेल से इंदौर पहुंचा था तो मेधा जी के अनशन का 17 वां दिन था। मुझे देर शाम जानकारी मिली कि जेल में वे अनशन तोड़ने के लिए तैयार नहीं थी पर भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के केन्द्रीय समिति सदस्य, भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व सांसद हन्नान मौला, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख, नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इन्डियन वीमेंस की सचिव एन्नी राजा, असम के नामचीन युवा कृषक नेता अखिल गोगई, प्रगतिशील लेखक संघ, म.प्र. के महासचिव विनीत तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार चिन्मय मिश्र और पूर्व विधायक सुनीलम के आग्रह -दवाब में उन्होंने अपना अनशन तोड़ दिया है। मैं 2006 में दिल्ली के जंतर –मंतर पर आयोजित 22 दिनों तक चले अनशन आन्दोलन में पल–पल का गवाह्गार था।

इसलिए मैं मांगें पूरी हुए बिना अनशन तोड़ने से तत्काल परेशान हुआ था लेकिन निमाड़ के कथावाचक सीताराम काका ने जब बताया कि हम तो अब तक कभी हारे नहीं तो आज कैसे हार गए। चिखल्दा अनशन से हमने सरकार के उस आदेश को क्रियान्वित होने से रोक दिया, जिसमें डूब के गांवों को 31 जुलाई 2017 तक बल प्रयोग से खाली करना था। हमारे इस अनशन आन्दोलन की वजह से गुजरात में 27 जुलाई से शुरू होने वाली नर्मदा महाआरती यात्रा रुक गयी, जिसमें पूरे देश के 2000 साधुओं को आमंत्रित किया गया था। 12 अगस्त को अहमदाबाद में होने वाली नर्मदा महाआरती को अगर हमारे अनशन के झटके से उन्हें रोकना पड़ा तो महाआरती को रोकने के बाद अनशन समाप्त करना तो हमारी जीत है।

धार जेल के गेट पर मेधा।

पत्रकार नहीं मिल सकते थे मेधा से

मेधा पाटकर के साथ पत्रकारों से मुलाक़ात प्रतिबंधित है, यह जानकारी मुझे इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली के पत्रकार अबीर दासगुप्ता ने दी। अबीर ने बताया कि धार जेल के जेल अधीक्षक ने उन्हें बताया कि अंडर-ट्रायल कैदी से पत्रकारों को मिलने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। अबीर मेधा पाटकर से मिलने के लिए इसलिए भी व्यग्र दिखे क्योंकि इंदौर अस्पताल से वापसी के क्रम में अचानक 35 गाड़ी पुलिस ने जब गाड़ी को कब्जे में लेकर मेधा को गिरफ्तार किया था, उस समय मेधा से अबीर फोन पर बात कर रहे थे। अबीर धार जेल जाकर मेधा से मिले बिना लौट आए थे पर उन्होंने जेल अधीक्षक से मिलने का निवेदन बंद नहीं किया था। मैंने इस तरह के प्रतिबन्ध को चुनौती देने का फैसला लिया। 17 अगस्त की शाम 4 बजे जब मैं मजबूत लौह फाटकों से बंद धार जिला जेल के गेट के पास पहुंचा तो संतरी ने ठीक से मेरी पड़ताल की। उसने बताया कि मिलने का वक्त समाप्त हो चुका है लेकिन मेधा पाटकर से उनके अधिवक्ता, उनके निकट रिश्तेदारों के अलावा किसी का भी मिलना प्रतिबंधित है।

मैंने कुछ देर पहले जेल अधीक्षक को whatsapp पर अपना परिचय सन्देश भेजा था, जिसे देखते ही उन्होंने मुझे तत्क्षण ब्लॉक कर दिया था। जेल के फाटक से लौटने के बाद जेल अधीक्षक को मैंने फोन कर खुद को लेखक बताते हुए मेधा जी से मिलने का अनुरोध किया। अधीक्षक ने अंडर-ट्रायल कैदी से सबको मिलने की अनुमति नहीं होने का अपना रटा-रटाया मन्त्र सुनाया। मैंने उनसे बताया कि मेधा जी को आप विचाराधीन कैदी (अंडर –ट्रायल) नहीं कह सकते हैं। उनके विरुद्ध आरोप पत्र दायर नहीं हुआ है। अदालत ने उनके विरुद्ध आरोपों को प्रमाणित नहीं किया है तो आप उनके साथ अपराधियों की तरह का बर्ताव नहीं कर सकते हैं। मैंने उनसे पूछा कि आप क्या यह जानते हैं कि मेधा पाटकर विश्व की एक प्रसिद्ध सख्शियत हैं। मेरा अनुरोध है कि आप मेधा जी के साथ उनके प्रोफाईल के अनुसार ही बर्ताव करें।

अधीक्षक ने कहा कि वे मेधा जी की ख्याति से अच्छी तरह परिचित हैं पर हमारे ऊपर भी अधिकारी होते हैं। हम तो कानून से बंधे हुए हैं। उन्होंने मेरे विनम्र निवेदन को स्वीकार किया और मुझे अगली सुबह मुलाकात का भरोसा दिलाया। मैंने जेल से वापस लौटते हुए एतिहासिक धार जेल की एक तस्वीर ली। मैंने लौटते हुए इस जेल की दीवारों को ठीक से देखने की कोशिश की। जेल की दीवारें काफी ऊँची आकाश के क्षितिज को छू रही थीं।

मेधा पाटकर।

मिलने के लिए बेलने पड़े बहुत पापड़

मैं 18 अगस्त को सुबह 10 बजे जेल के फाटक पर आया तो संतरी ने मुझे जेलर से मिलवाया। यशवंत सिह मांझी नामक जेलर ने एक साँस में मेरे मुलाकात को ख़ारिज कर दिया। जेलर ने बताया कि अधीक्षक आज अवकाश पर हैं और मेधा पाटकर से सबको मिलने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। मैंने थोड़ा दूर हटकर एस के उपाध्याय नामक जेल अधीक्षक को फोन किया। उन्होंने एक बार फिर मेरी पड़ताल की कि आप पत्रकार तो नहीं हैं। मैंने उन्हें आश्वस्त कराया कि मैं पत्रकार नहीं हूँ। उन्होंने पुनः  मेरे मिलने के उद्देश्य के बारे में पूछा। मैंने उनसे कहा कि कुलदीप नैयर साहब से आप परिचित हैं। अधीक्षक ने कहा –क्योँ नहीं, वे तो सर्वमान्य हैं।

मैंने कहा कि उनकी उम्र 90 से ज्यदा हो रही है और वे मेधा जी की सेहत के बारे में जानने के लिए परेशान हैं। मैं उनका एक संदेशवाहक होकर मेधा जी से मिलने आया हूँ। अब उन्होंने मुझे ज्यादा महत्व दिया और कहा कि मैं अवकाश पर हूँ, बावजूद इसके जेलर से आपकी मुलाकात करवाने को कहता हूं। साढ़े 11 बजे मुझे मेधा जी से मुलाक़ात के लिए बुलाया गया। मुझसे कहा गया कि मैं एक डायरी या एक पन्ना  कागज भी अपने साथ नहीं रख सकता हूँ। मैंने सुरक्षा प्रहरी की इजाजत से 2 कलम अपने साथ रख लिए।

आखिर हो ही गयी मुलाकात

मजबूत लौह फाटकों को मैंने उसी तरह पार किया, जैसे हम अन्तरिक्ष की तरफ उड़कर प्रवेश कर चुके हों। मुझे सुरक्षा प्रहरी ने जेलर के कक्ष में प्रवेश कराया तो मेधा ताई जेलर के सामने रखी कुर्सी पर बैठी थीं। एक दूसरे को देखकर हम लोग मुस्कुराए पर सामने जेलर की आँखें ताई को उनकी स्वाभाविक मुस्कराहट से रोकती रहीं। मैंने सबसे पहले उनकी सेहत के बारे में पूछा–उन्होंने कहा कि बी.पी. हाई है। मैंने पूछा कितना है? उन्होंने कहा –‘142/90 है, आज सिर भी कुछ भारी–भारी है। मैंने पूछा –दवाएं ले रही हैं? उन्होंने कहा–दवाएं अन्दर क्या असर करेंगी, अगर बाहर सब कुछ बुरा चल रहा हो। जेलर साहब अपनी फाईल छोड़कर हम लोगों की बातचीत पर ज्यादा गौर करने लगे तो मैंने मेधा ताई को पहली बार आतंकित होकर संकेतों में बात करते हुए देखा। मैंने पूछा कि आपके बैरक में कितनी महिलाएं हैं?

उन्होंने कहा-53 महिलाओं वाले बैरक में सब अच्छा है। मैंने पूछा –आपको कमर-दर्द की समस्या है तो सोने के लिए क्या कोई वैकल्पिक सुविधा उपलब्ध कराई गयी है? उन्होंने कहा –गर्मी में कंबल बिछाकर सोने से बेहतर है,फर्श पर सोना। मुझे बुरा लगा,”आप फर्श पर सोती हैं। “मेरी आवाज उनकी कान से ज्यादा होकर जेलर तक पहुँच गयी। ताई ने कहा –फर्श पर बहुत आनंद है। जेलर ने हस्तक्षेप किया –मेधा जी को सारे कैदियों से अलग, विशेष सुविधा उपलब्ध है। मेधा ताई ने विनम्र भाव से उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, वह तो आप लोग दे ही रहे हैं। मैंने चिखल्दा में अनशन करते हुए पुलिस के द्वारा गिरफ्तार कर इंदौर के मुम्बई हॉस्पिटल में नजरबन्द किए जाने से लेकर रास्ता रोक कर धार जेल लाने की घटना का संस्मरण जानना चाहा। उन्होंने कहा –“चिखल्दा में तो वे गिरफ़्तारी स्वीकार ही नहीं कर रहे हैं लेकिन चिखल्दा में तो गिरफ्तारी नहीं, हमला था, सब कुछ वैसा ही था,जैसे एक ताकतवर देश की सेना दूसरे गरीब देश; पर हमला करने आ गयी हो और गरीब देश के गरीब निहत्थे अपनी मानव काया को हथियार बनाकर उनसे जूझ रहें हों। जौ के पास सारी तस्वीरें हैं, देख लेना कि बहनों ने किस तरह आखिरी–आखिरी तक उन्हें रोकने की कोशिश की “मैंने कहा कि गायत्री बहन ने बताया कि उन्हें जिस तरह जबरन खींचातानी कर अनशन स्थल से उठाया, उससे उन्हें कई जगह चोटें आईं।

गायत्री बहन और दूसरे अनशनकारी दूसरे अस्पताल में आपसे अलग होने की वजह से रो रहीं थीं और छटपटा रहीं थीं। मेधा ने कहा –“मैं खुद क्या मुम्बई अस्पताल में सुख में थी, मैं तो अपने साथियों के साथ क्या हुआ है, वे कहाँ हैं, उनसे मिलने के लिए छटपटा रही थी। मैं मुम्बई अस्पताल से निकल कर अपने अनशनकारी साथियों के साथ क्या हुआ है, यह जानने के लिए उनसे मिलने ही जा रही थी लेकिन मुझे अभी तक उन सबसे मिलने कहाँ दिया गया। ” मैंने जब बताया कि 9 अगस्त को आपको अस्पताल से लौटते हुए बीच रास्ते में पुलिस के द्वारा अपहृत कर जेल में बंद करने की खबर को नेशनल मीडिया में बलैक –आउट कर दिया गया तो उन्होंने आश्चर्य भाव से कहा –“अरे यह तो मुझे अब तक किसी ने बताया ही नहीं।

मेधा पाटकर।

तब तो मैं सोच रही थी कि इतना जुल्म ये किस ताकत पर ढा रहे हैं। क्या तुमने कुछ लिखा। ”मैंने कहा -2006 का अनशन और तब का कवरेज देखकर आज का बलैक –आउट देखना मैंने फेसबुक में लिखा –देश में आपातकाल लागू हो चुका हैं। क्या आपको पता चला कि त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक बाबू के स्वतंत्रता दिवस संबोधन को आकाशवाणी और दूरदर्शन ने प्रसारित करने से मना कर दिया। मेधा ताई ने आशचर्य करते हुए कहा –“मुझे तो जेल के बाहर क्या हो रहा है, यह कहीं से पता ही नहीं चल रहा है। जेल के भीतर जो टेलीविजन है, उससे तो जेल जैसी ही खबर मिलती है। सक्सेना ने साकेत कोर्ट में मेरे ऊपर अदालत में गैर –हाजिरी की फाईन करवाई है,यही खबर चल रही है।

बेहद सतर्क थे जेलर

मैं पिछली तारीख के समय चिखल्दा में अनशन पर थी, कल की तारीख के समय यहाँ जेल में थी तो फाईन का क्या मतलब है। टीवी पर खबर चलती है–खादी बोर्ड के चेयरमेन ने कहा, यह क्योँ छुपाते हैं कि अडानी के सीओ ने कहा। ”मैंने जेल डायरी लिखने और जेल के भीतर से अख़बार में प्रकाशन की बात कही। मैं उनके कान के पास होकर बात कर रहा था तो जेलर अपनी आँखों को कान की तरह इस्तेमाल कर रहे थे। मेरी बात मेधा संकेतों से समझ गईं पर जेलर की घूरती नजर की वजह से उन्होंने जेलर से पूछा–“ सर मैंने बिहार की बाढ़ पर एक लेख लिखा है, आपके मुहर के साथ जेल से बाहर जा सकती है ना। “जेलर ने कहा, लेख में तो छपेगा, जेल के भीतर से, यह अच्छा नहीं होगा। नहीं, हम आपका लेख, बाहर भेजने की अनुमति नहीं दे सकते हैं। मेधा ताई ने पूछा –“क्या आप सबको मुझसे मिलने नहीं दे रहे हैं? घाटी से अब तक कहाँ कोई मिलने आया है। ऐसा थोड़े है कि घाटी के लोग मुझसे मिलने नहीं आते होंगे। ”जेलर ने कहा –आपसे हजारों लोग मिलना चाहेंगे तो हम लोग ऐसा तो नहीं कर सकते हैं।

हमें जेल की सुरक्षा को ज्यादा महत्व देना होता है। मेधा ताई से मैंने पूछा कि जेल में उनका समय किस तरह बीत रहा है तो उन्होंने बताया कि “पर्यावरण और शिक्षा पर एनसीआरटी के लिए जो दो किताबें अंग्रेजी में लिखी थी, उसका तीसरा पार्ट लिख रही हूँ। एक कविता भी  लिखी है, तुम्हें अच्छी लगेगी “(मेधा ताई कुछ बात जेलर की कानों तक पहुँचने के भय से संकेतों में कहती हैं, जिसे हम समझ चुके होते हैं। जेलर हम–दोनों को घूरते हुए परेशान से होते हैं कि वे बातचीत को अच्छी तरह समझने में विफल क्योँ हो रहे हैं।)अपनी विफलता से परेशान जेलर महोदय, दूसरी बातें छेड़ते हैं ताकि हम लोग अपने–अपने मन की बात एक दूसरे से प्रकट ना कर सकें।

न अभिव्यक्ति और न ही किसी तरह की स्वतंत्रता

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाले राष्ट्र में अभिव्यक्ति को रोकने का इससे बेहतर दृश्य हमने पहले कभी नहीं देखा था। जेलर जी ने कहा –सुना है कि आपके अनशन के दौरान सरकारी अधिकारियों को लोग गांवों में घुसने नहीं दे रहे थे। यह तो बहुत गलत था । सरकारी अधिकारी गाँव घुसने से डर रहे थे। मेधा जी ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि “हमलोग शांतिपूर्ण तरीके से सत्य –अहिंसा के संकल्प से सत्याग्रह -अनशन ही कर रहे थे। आपको गलत जानकारी है ,हमारे लोगों ने डूब प्रभावित गाँवों में कभी ऐसा नहीं किया। ”जेलर ने फिर कहा ,जो डॉक्टर अनशन के दौरान आपका चेकअप करने जाते थे, वे तो पूरे दिन भूखे ही रह जाते थे। मेधा ताई ने कहा–“ ऐसा संभव नहीं है इसलिए कि गाँव के लोग अनशन स्थल पर बाहर से आने वाले हर एक आदमी के भोजन का इंतजाम रखते थे। हम भूखे थे, इसका  मतलब क्या है कि हम आगत अतिथियों को भूखे ही वापस कर दें।”

हमने जेलर साहब की तरफ से बातचीत को अपनी तरफ खींचते हुए ताई से बताया कि आपका गाया हुआ “आजादी गान“ जौ ने आपकी जेल यात्रा के साथ जोड़कर शानदार तरीके से कम्पायल किया, जिसे देश भर में आज़ादी दिवस के अवसर पर लाखों लोगों ने सुना। मेधा ने धीरे से कहा –“मैंने तो जेल में भी महिलाओं को यह गीत याद करवा दिया है। महिलाओं को कुछ –कुछ पढ़ाती भी रहती हूँ। जैसे देश, लोकतंत्र, उनके जीने के संवैधानिक अधिकार और उनकी जिन्दगी के लिए उपयोगी बातें। “जेलर के कान जो खड़े थे, उन्होंने झटके से सवाल किया –आप क्या पढ़ाती हैं। मेधा ने कहा –“ जेल में बंद महिलाएं कितनी कांसस हैं, जानकर आपको आश्चर्य होगा। एक महिला ने सवाल किया कि अंग्रेजी में ‘जज’ लिखने में ‘डी’ क्योँ आता है।

“जेलर महोदय ने महिला कैदियों को जेल में पढ़ाने के लिए मेधा जी के प्रति आभार प्रकट करना उचित नहीं समझा। जेलर महोदय अब हमारी बातचीत को पसंद भी नहीं कर रहे हैं और उन्होंने अचानक कह दिया, आप लोगों की बातचीत 45 मिनट हो चुकी है। अब बहुत हो गया। मेधा ताई ने अपने साथ एक लिफाफा लाया था, वे अपनी जेल में लिखी कविता मुझे दिखाना चाहती थीं लेकिन जेलर की अनुमति के बिना अब बातचीत अधूरी छोड़कर निकलने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

दिग्विजय सिंह ने की मेधा से मुलाकात।

सरकारी अधिकारियों के अपहरण का मुकदमा

उन्होंने अपने ऊपर लादे गए मुकदमे के कागजात दिखाते हुए कहा –“देखो,कितने आश्चर्यजनक आरोप इन्होंने लगाए हैं कि जब मैं अनशन कर रही थी तो सरकारी अधिकारियों का अपहरण करने की मैंने कोशिश किस तरह की थी। सुनकर भी विचित्र लगता है लेकिन मैं अभी तो इसी आरोप में जेल में बंद हूँ। क्या दिल्ली में लेखक –साहित्यकारों को हकीकत पता है। जंतर–मंतर पर राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर जी आते थे। ”मैंने छूटते हुए संकेतों में कहा –मैंने जेल में प्रवेश के लिए खुद को कुलदीप नैयर का संदेशवाहक कहा था। ताई ने कहा –कुलदीप जी के संदेशवाहक तो हो ही, उन्हें सब बता देना। मैंने बताया कि विभूति नारायण राय कुछ अवकाश प्राप्त प्रशासकों की टीम लेकर आपसे मिलने वाले हैं। उन्होंने कहा –लेकिन जल्दी आएं तो अच्छा। मुझे 2 कलम अपने साथ लेकर जेल के भीतर  प्रवेश करने की अनुमति मिली थी तो मैंने ताई को लिखने के लिए दोनों कलम देना चाहा। उन्होंने कहा –“एक ही काफी है। कोई अच्छी किताब लेकर आता तो अच्छा। जेलर की सख्ती की वजह से अधूरी बातचीत को विराम देकर ताई को हाथ जोड़ कर प्रणाम किया तो उनसे विदा कहना अच्छा ना लगा।

उम्मीद भरी मुस्कराहट के साथ उनके चेहरे पर थोड़ी चमक दिखी। जेल गेट की तरफ बढ़ते हुए उन्होंने फिर आवाज देकर कहा –घाटी से लोग क्योँ नहीं आ रहे हैं, राहुल को जल्दी भेज देना। वह मेरे ग्रे बैग से’गुजरात फाईल ‘ किताब साथ लाएगा। घाटी में डूब के गांवों में रोज सभाएं चलनी  चाहिए।

एमपी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान।

मेधा अपराधियों से भी बड़ी अपराधी

हमने जेल से निकलकर घड़ी का वक्त मिलाया तो हमारी बातचीत 25 मिनट से ज्यादा तो नहीं हुई थी लेकिन हुजूर जेलर ने 25 मिनट को 45 मिनट बता कर हमें बाहर कर दिया तो हम कौन होते हैं, उनकी तानाशाही को चुनौती देनेवाले। धार जेल तक हम 50 रुपये में ओटो रिजर्व कर आए थे, वापसी के लिए क्या करें। जेल शहर से 5 किलोमीटर दूर जो है। हमने एक कार से लिफ्ट लिया। ये एक बड़े अपराधी के परिवारजन थे। उन्होंने कहा कि जब चाहें जेल में बंद अपने आदमी से मिलते हैं और उनके लिए रोज घर का खाना भी पहुंचाते हैं। मुझे महसूस हुआ कि मैंने जिन मेधा पाटकर से मुलाकात की, वे इस समय जेल में बंद बाकी तमाम अपराधियों से बड़ी अपराधी हैं। आईये, इंदौर से धार 70 किलोमीटर से ज्यादा दूर नहीं है।

प्रधानमंत्री जी के आँखों की किरकिरी मेधा पाटकर के साथ मध्य प्रदेश सरकार राज्य के सबसे बड़े अपराधी की तरह का बर्ताव कर रही है तो इन मेधा पाटकर से मिलने आप भी धार जेल के मजबूत लौह फाटकों के बाहर खड़े हो जाईये। अबीर दासगुप्ता इकॉनोमिक एंड पोलिटिकल विकली में ठाकुरता के साथ पत्रकारों के उस समूह लेखन में शामिल थे, जिस आलेख की वजह से ठाकुरता को इस्तीफा देना पड़ा। मुझे ठाकुरता के समूह से जुड़े हुए एक पत्रकार को मेधा पाटकर से मिलने से प्रतिबंधित करने की कार्रवाई से सख्त एतराज है।

धार के स्थानीय संवाददाताओं से मैंने बात की तो सबने बताया कि मेधा पाटकर से जेल जाकर मिलने की इन्हें इजाजत नहीं है। पत्रिका के पत्रकार प्रीतम लखवाल ने हिम्मत जुटाई। उन्होंने जेल में मेधा जी से मेरी मुलाकात की सूचना अपने प्रधान कार्यालय को दी तो उन्हें मेधा जी के स्वास्थ्य को केंद्र में रखकर खबर बनाने का निर्देश हुआ। जब 19 अगस्त को पत्रिका में यह खबर छपी कि मेधा जी का रक्तचाप बढ़ा हुआ है और उन्हें हॉस्पिटल वार्ड की बजाय सामान्य अपराधी कैदियों के साथ बंद रखा गया है तो देर शाम जानकारी मिली कि जेल प्रशासन ने मेधा जी के साथ सख्ती बढ़ा दी है। जेल मिलने पहुंचे डूब प्रभावितों को वापस लौटा दिया गया और देर शाम तक मेधा जी तक अख़बार पहुँचने नहीं दिया गया।

जब फैली मेधा के बीमारी की खबर

शासकीय महकमे से पत्रिका के पास दबाव आए कि मेधा जी की सेहत जेल के भीतर अच्छी ही है तो तबीयत ख़राब क्योँ छाप दिया। पत्रकार ने जवाब दिया कि अगर जेल के भीतर मेधा जी का रक्तचाप बढ़ा हुआ था तो क्या यह उनकी सेहत अच्छी होने का संकेत है। पत्रिका ने मेधा जी के स्वास्थ्य को मुद्दा बनाकर उन्हें जेल की बजाय अस्पताल में भर्ती कराने के लिए जिस तरह मुद्दे को बल दिया था, उसे नर्मदा बचाओ आन्दोलन के समर्थकों ने ठीक से नहीं समझा। मेरे पास दिल्ली से किसी व्यक्ति का फोन आया, उन्होंने मेधा जी के जेल में अस्पताल वार्ड की बजाय सामान्य वार्ड में होने और सेहत  नासाज होने की खबर को उजागर करने के लिए मेरी बेतरह खिंचाई की। फोन करने वाले व्यक्ति कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति ही रहे होंगे पर उनका नाम इस समय मैं पूरी तरह से विस्मृत हो रहा हूँ लेकिन उनकी आवाज़ में शहाबुद्दीन के छोटे भाईयों जैसा तेवर था, जिससे मैं भयाक्रांत हुआ। यही वजह है कि मेधा पाटकर से मुलाकात की डायरी लिखने में मुझे काफी हिम्मत जुटानी पड़ी और लिख पाने में मैं अंततः चौथे दिन सफल हुआ।

मैं आखिरी बात आपसे यह कहना चाहता हूँ कि मेधा पाटकर से मुलाकात में जो बात अधूरी रह गयी है, उसे मैं अब जेल जाकर तो नहीं पूछ सकता कि अब जेल और जिला प्रशासन दोनों की नज़रों में हमारी पहचान शातिरों जैसी हो गयी है। कुलदीप नैयर को जब मैंने फोन से बताया कि मैं आपका दूत बनकर मेधा से जेल में मिला तो उन्हें ख़ुशी हुई। उन्होंने कहा –बुरा क्या किया, मैं तो मेधा के कहने से बार –बार कोर्ट में खड़ा हो रहा हूँ। मेधा पाटकर ने 32 वर्षों के संघर्ष में खुद को इतना तपा लिया है कि वे जेल में अपराधी कैदियों की तरह का बर्ताव आत्मसम्मान के विरुद्ध नहीं मानतीं हैं लेकिन हम जानना चाहते हैं कि क्या मेधा पाटकर अपराधी हैं? अगर वे अपराधी नहीं हैं तो जेल के अन्दर उन्हें “राजनीतिक कैदी “ का दर्जा क्योँ नहीं प्राप्त हो? उन्हें फर्श पर लेटने में सुख महसूस हो रहा है लेकिन क्या एक सभ्य राष्ट्र के लिए यह शर्मनाक नहीं है कि दुनिया के देशों में प्रतिष्ठित एक त्याग की प्रतिमूर्ति सख्शियत को उनके अपने ही राष्ट्र में जेल में सोने के लिए फर्श पर एक  चटाई भी उपलब्ध ना हो। क्या चटाई के बिना फर्श पर सोने से उनके मेरुदंड (स्पायनल कोड) का दर्द समाप्त हो जाएगा?






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