बेकार नहीं गयी हैं मेधा की लड़ाईयां

आंदोलन , , शुक्रवार , 11-08-2017


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गिरीश मालवीय

इंदौर। मेधा पाटकर एक बार फिर गिरफ्तार हो गयीं। तीन दिन पहले पुलिस उन्हें जबरन बड़वानी के अनशन स्थल से उठाकर इंदौर लायी थी। जिसके बाद उन्हें बॉम्बे हॉस्पिटल के आईसीयू में रखा गया था। लेकिन जैसे ही उन्होंने थोड़ा स्वस्थ महसूस किया। वो तुरन्त बड़वानी के लिए निकल पड़ीं।

मेधा पाटकर नर्मदा घाटी के विस्थापितों की लड़ाई कोई साल दो साल से नहीं लड़ रही हैं उन्होंने यह लड़ाई कांग्रेस की केंद्र सरकार और उससे भी पहले दिग्विजय सिंह के दौर से लड़ रही हैं। जब वो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। यह वो वक्त था जब आम आदमी पार्टी पैदा भी नहीं हुई थी। नर्मदा बचाओ आंदोलन का इतिहास 30 साल पुराना है,  इसलिए भाजपा समर्थकों को चाहिए कि इस मुद्दे पर वो अपनी भक्ति को थोड़ा काबू में रखें।

लोग पूछते हैं कि इस आंदोलन ने क्या दिया है। उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने देश के विस्थापितों के पक्ष में जो कानून बनवाये वह काम सत्ता में बैठे लोग नहीं कर सके। मेधा पाटकर ने अन्य जन संगठनों के साथ मिलकर नया भू-अर्जन कानून लाने के लिए सरकार से लम्बी लड़ाई लड़ी है। 

यह बात अलग है कि नए भू-अर्जन अधिनियम का लाभ देश में एक भी विस्थापित को नहीं मिला है। राजनैतिक पार्टियों को इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई देती कि नये भू-अर्जन अधिनियम का लाभ विस्थापितों को मिले। कांग्रेस भले ही नया भू-अर्जन अधिनियम कानून बनाने का श्रेय ले लेकिन सच्चाई यही है कि उसने भी इसे कभी जमीन पर लागू नहीं किया। 

मेधा पाटकर को जेल जाते हुए।

यह नर्मदा बचाओ आन्दोलन की ही उपलब्धि है कि प्रत्येक परिवार के वयस्क पुत्र को पांच-पांच एकड़ जमीन दी जायेगी, तीन राज्यों के 15000 विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन मिलना आन्दोलन की बड़ी उपलब्धि है। लेकिन आज केंद्र और राज्य में बैठी भाजपा सरकार इन विस्थापित लोगों की मूल समस्याओं से आंख मूंद ली है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभालते ही जिन फैसलों को सबसे पहले लिया था, उसी में था सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई को 17 मीटर बढ़ाने का। इस ऊंचाई को बढ़ाने से पहले ना तो लोगों के पुनर्वास और राहत के लिये कोई योजना बनायी गयी, और ना ही प्रभावित लोगों को भरोसे में लेने का प्रयास किया गया। बस एक तुगलकी आदेश जारी कर दिया गया कि 31 जुलाई 2017 तक सारे गांव खाली कर दिए जाए।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विस्थापित परिवार को 2 हेक्टेयर भूमि के बदले 60 लाख रुपया देने का आदेश हुआ है। लेकिन आज तक परिवारों की सूची तैयार नहीं हो पायी है। पुनर्वास स्थल बनाने के टेंडर निरस्त हो चुके हैं। कुम्हारों, मछुवारों, भूमिहीनों के पुनर्वास एवं उनके रोजगार के कोई साधन उपलब्ध नहीं कराये गए हैं। 60 प्रतिशत लोगों का पुनर्वास नहीं हुआ है नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण एवं अधिकारियों का गठजोड़ भ्रष्टाचार करने में लिप्त है। 60 लाख की राशि उसी व्यक्ति को मिलेगी जो 15 लाख रुपया इस गठजोड़ को उपलब्ध करायेगा। पात्र व्यक्तियों के नाम मुआवजे की सूची से गायब है क्योंकि वे इस गठजोड़ को पैसा देने की स्थिति में नहीं हैं।

यह है सही स्थिति विस्थापितों की, लेकिन देश का मीडिया आप को यह क्यों बताएगा। वह तो आपको दिन रात उन मुद्दों में उलझा कर रखेगा जिनका जनहित से कोई सीधा सम्बन्ध ही नहीं है।

(गिरीश मालवीय सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं और सम-सामयिक विषयों पर पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहते हैं। आजकल इंदौर में रह रहे हैं।)

 






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