मां...जिन्होंने अपने आंचल को परचम बना लिया

विशेष , , शुक्रवार , 16-06-2017


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मुकुल सरल

यह तस्वीरें आप देख रहे हैं। इन सबके बारे में मैं कुछ ज़्यादा नहीं जानता। हां, बस इतना जानता हूं कि ये चारों मां हैं। इंसाफ के लिए लड़ती मां। ऐसी मां जिन्होंने अपने आंचल को परचम बना लिया है।

इनमें से दो ने अपना बेटा खोया है तो एक आज भी अपना खोया बेटा ढूंढ रही है, और एक के बेटे पर संकट के बादल छाए हैं।

कभी इनके बेटे इनकी ताकत थे लेकिन आज यह हमारे-आपके जैसे हज़ारों-लाखों बेटे-बेटियों की ताकत बन गई हैं। घर की चारदिवारी से बाहर निकल कर अब इन्होंने मोर्चा संभाल लिया है। यह आज अपने बेटों के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ती हुईं पूरी शासन व्यवस्था से टकरा रही हैं।

मां तुझे सलाम!

इसलिए फादर्स-डे से पहले इन बहादुर मदर्स को एक बार फिर सलाम...मां तुझे सलाम। मैं परंपरागत तरीके से यह नहीं कहूंगा कि इन मांओं ने पिता की भूमिका संभाल ली है, बल्कि यह कहूंगा कि पिताओं को भी इनसे सीख लेने की ज़रूरत है। यही है असली मां, असली औरत, असली हीरो, जिसने आंसू पोंछ दिए हैं और जो न्याय के लिए सड़क पर निकल आई है। इसकी मिसाल हमें आज़ादी के समय से मिलती है।

इन मांओं की लड़ाई अब सिर्फ एक चंद्रशेखर, एक नजीब या एक रोहित के लिए नहीं रह गई गई है बल्कि अब इनकी लड़ाई देश में इंसाफ का राज रहेगा या नहीं इसकी लड़ाई बन गई है।

इन मांओं में एक हैं भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ रावण की मां कमलेश देवी। दूसरी हैं अपने लापता बेटे को तलाशती नजीब अहमद की मां फ़ातिमा नफ़ीस। तीसरी हैं दलित स्कॉलर और आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिए गए रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला।

इन मांओं के साथ एक और मां है जिसने भी बहुत लंबी लड़ाई लड़ी और जीती भी। वह हैं नीलम कटारा। नीतीश कटारा की मां नीलम कटारा।

18 जून के भीम आर्मी के प्रदर्शन के लिए सोशल मीडिया पर जारी की गई अपील।

चंद्रशेखर की मां

9 मई को सहारनपुर हिंसा के बाद सुर्खियों में आई भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ रावण को हिंसा के ही आरोप में पुलिस ने पिछले दिनों गिरफ़्तार कर लिया। यूपी पुलिस ने चंद्रशेखर को हिमाचल के डलहौजी से गिरफ़्तार किया। और अब उन्हें ही इस पूरे कांड का मास्टर माइंड बताया जा रहा है, जबकि सहारनपुर कांड की अब तक जो स्वतंत्र जांच रिपोर्ट आईं हैं उनमें इस पूरे कांड के पीछे साफ तौर पर इलाके के संपन्न ठाकुर (राजपूत) वर्ग खासतौर पर फूलन देवी के हत्यारे शेर सिंह राणा का नाम भी आ रहा है। बताया जा रहा है कि पहले 5 मई को शब्बीरपुर में और उसके बाद बढ़े इस पूरे बवाल के पीछे उसी का हाथ था। लेकिन बलि का बकरा सिर्फ दलितों और उनमें भी चंद्रशेखर को बनाया जा रहा है और इसमें स्थानीय पुलिस-प्रशासन से लेकर राज्य शासन व्यवस्था सब शामिल हैं। यही वजह है कि इंसाफ की मांग को लेकर अब चंद्रशेखर की मां कमलेश देवी सड़क पर उतर रही हैं।

कमलेश देवी रविवार, 18 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हो रहे भीम आर्मी के जुटान में शामिल होंगी। उन्होंने इसमें अन्य लोगों से भी बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की है। इस प्रदर्शन में चंद्रशेखर की मां के शामिल होने की ख़बर से पुलिस-प्रशासन के होश उड़ गए हैं।

नजीब की तलाश में लगातार संघर्ष कर रहीं नजीब की मां (फाइल फोटो) साभार: गूगल

नजीब की मां

जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के एमएससी बायोटेकनोलॉजी, प्रथम वर्ष का छात्र नजीब अहमद अक्टूबर, 2016 से गायब है। वह कॉलेज कैंपस से ही लापता हुआ और आरोप है कि उससे पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े छात्रों ने उनके साथ मारपीट की थी। इसके बाद से जेएनयू छात्र संघ के साथ तमाम संगठन नजीब की बरामदगी के लिए लगातार आंदोलन कर रहे हैं लेकिन अब तक उनका कोई सुराग नहीं लगा। नजीब की मां ने भी बदायूं, उत्तर प्रदेश से आकर दिल्ली में मोर्चा संभाला, लेकिन कोई फायदा न हुआ। नजीब की मां और बहन ने जेएनयू वीसी से लेकर पुलिस-प्रशासन तक न जाने कितने चक्कर लगाए, भूखे-प्यासे रहकर न जाने कितने जुलूस-प्रदर्शनों में भाग लिया, फिर भी न सरकार जागी न पुलिस प्रशासन। इतना ही नहीं बल्कि पुलिस को उनका धरने-प्रदर्शनों में भाग लेना भी नागवार गुजरा और उन्हें कई बार पुलिस ज़्यादती का भी शिकार होना पड़ा। इंडिया गेट पर उन्हें घसीटा तक गया। इस मामले में अब तक जितनी भी कार्रवाई हुई है सब कोर्ट के आदेश पर ही हुई है। हालांकि अब तक नजीब का पता नहीं लगा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने अब यह मामला सीबीआई को सौंप दिया है। 

मजबूर होकर आत्महत्या करने वाले हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला (दायं) और उनकी मां राधिका वेमुला (बायं)। (फाइल फोटो)

रोहित की मां

रोहित वेमुला, हैदराबाद युनिवर्सिटी का होनहार छात्र था। वह वहां से पीएचडी कर रहे थे। रोहित बाबा साहेब अंबेडकर के विचारों से प्रेरित थे और तमाम मुद्दों पर बहस और संघर्ष में आगे रहते थे लेकिन यही कथित दबंग जातियों के छात्रों को बर्दाश्त नहीं था और एक दिन रोहित भी उनकी साजिश का शिकार हो गए।

रोहित के परिजनों और साथियों का कहना है कि रोहित को एक झूठे आरोपों में हॉस्टल से निलंबित किया गया और उनकी फेलोशिप रोक दी गई। रोहित ने अपने साथियों के साथ इसके खिलाफ भूख हड़ताल भी की, लेकिन कोई सुनवाई न हुई। इस तरह पहले रोहित के सपनों की मौत हुई और फिर रोहित ने 17 जनवरी, 2016 को फांसी लगाकर अपना जीवन खत्म कर लिया। रोहित एक लेखक बनना चाहते थे। अपने अंतिम पत्र में उन्होंने लिखा भी कि मैं हमेशा से एक लेखक बनना चाहता था, विज्ञान पर लिखने वाला, कार्ल सगान की तरह।

इस पूरे मामले में  केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और उस समय की मानव संसाधन एवं विकास मंत्री स्मृति ईरानी पर कई आरोप आए। कहा गया कि इन्हीं मंत्रियों के गैरज़रूरी हस्तक्षेप की वजह से रोहित की जान गई।

आपको याद ही होगी फरवरी, 2016 में संसद में हुई वह तीखी बहस। याद होगा कि किन भाव-भंगिमाओं के साथ तत्कालीन एचआरडी मंत्री स्मृति ईरानी ने लोकसभा में जवाब दिया था। किस तरह राज्यसभा में उनकी बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती से बहस हुई थी। रोहित को इंसाफ के लिए रोहित की मां उसी समय से सक्रिय हैं और अब तो वह हर आंदोलन में कंधे से कंधा मिलाए दिखती हैं। नजीब की लड़ाई में भी रोहित की मां साथ आईं।

नीतीश कटारा की मां नीलम कटारा (फाइल फोटो)। साभार : गूगल

नीतीश की मां

नीतीश कटारा की मां नीलम कटारा हालांकि एक सक्षम महिला हैं। चंद्रशेखर, नजीब और रोहित की मां से यही एक बात उन्हें अलग करती है, लेकिन इंसाफ की लड़ाई इतनी ही लंबी और मुश्किल भरी थी, जिसपर अभी ये अन्य मांएं चल रही हैं। नीलम ने भी अपना बेटा खोया था। उनकी लड़ाई भी किसी मामूली आदमी से नहीं बल्कि एक बाहुबली नेता से थी। यानी यह सब मांएं किसी न किसी तरह सत्ता से ही टकरा रही हैं।

नीलम कटारा के 25 साल के बेटे नीतीश की 17 फरवरी 2002 को बाहुबली नेता डीपी यादव के बेटे विकास यादव ने हत्या कर दी थी। नीतीश का कसूर यह था कि वह डीपी यादव की बेटी और विकास यादव की बहन भारती यादव, जो उसकी सहपाठी थी, से प्यार करता था। इसी जुर्म में उसे मौत के घाट उतार दिया गया। फिर चली लंबी अदालती लड़ाई। निचली अदालत ने इसे झूठी शान के लिए हत्या माना और 2008 में विकास यादव और विशाल यादव को उम्र  कैद की सज़ा दी। इसके बाद केस ऊपरी अदालतों में गया। और अंतत: अभी 3 अक्टूबर, 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने फाइनल डिसीजन दिया, जिसमें विकास और विशाल की सज़ा को संशोधित किया गया।

तो इस तरह नीलम कटारा ने करीब 14 साल इंसाफ के लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की। 

ऐसी न जाने कितनी मांएं हैं, जिनकी मिसाल दी जा सकती है। शायद अनगिनत...। शायद सभी। मेरी मां भी और आपकी भी। और आपको यह जानकर हैरत होगी कि मुझे इन सब मांओं की सूरत एक सी लगती है। आप भी अपनी मां को आज गौर से देखिए और फिर इन मांओं की तस्वीर। शर्त लगाकर कह सकता हूं कि आपको इनमें भी अपनी मां ही नज़र आएगी। 






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