अपने ही वजूद के खिलाफ खड़ा होने को मजबूर मुलायम सिंह यादव

आंदोलन , , सोमवार , 10-12-2018


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चरण सिंह

नई दिल्ली। वर्षों के संघर्ष से हासिल ये मुलायम सिंह यादव के साख और नेतृत्व का ही नतीजा था कि “जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है” का नारा लगते ही समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता जोश से भर जाया करते थे। मुलायम सिंह ने अपनी इस राजनीतिक कुशलता को पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से लेकर चंद्रशेखर तक के सामने साबित किया। उत्तर प्रदेश में अपने बलबूते पर पार्टी खड़ी कर न केवल खुद मुख्यमंत्री बने बल्कि अपने बेटे को भी मुख्यमंत्री बनाया। 

मुलायम सिंह ने कभी सोचा नहीं रहा होगा कि एक दिन उनको अपनी ही बनायी उस पार्टी के खिलाफ अपने उस भाई के साथ बैठना पड़ेगा, जिसे दोनों भाइयों ने मिलकर अपने खून पसीने से सींचा है।

मुलायम सिंह को इस स्थिति में पहुंचाने के लिए उनका वो पूरा परिवार जिम्मेदार है, जिसको बनाने की कड़ी में उनको वंशवाद, परिवारवाद और जातिवाद समेत न जाने क्या-कया आरोप झेलने पड़े। विडंबना देखिए उन्हें अपना उत्तराधिकारी चुनने का अधिकार तक हासिल नहीं हुआ। और विरासत उनसे छीन ली गयी। ये काम कोई और नहीं बल्कि उनके अपने बेटे अखिलेश ने किया। दूसरी ओर उनके अनुज शिवपाल यादव भाजपा के रहमोकरम पर बनी पार्टी के जरिये उनके वजूद पर ही कुठाराघात कर रहे हैं। लोकप्रिय तौर पर नेताजी के नाम से जाने जाने वाले मुलायम सिंह को कल उस मंच पर बैठना पड़ा जो उनकी घोर विरोधी पार्टी रही भाजपा की शह पर बना था। जिस विचारधारा के खिलाफ वह जिंदगी भर लड़ते रहे। आज उसके साथ भाई शिवपाल ने उनको खड़ा कर दिया।

ये बात अब किसी से छुपी नहीं है कि भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाने की कड़ी में शिवपाल यादव को लगाया हुआ है। मुलायम सिंह को शिवपाल के मंच पर पहुंचाने में उनके दूसरे बेटे प्रतीक यादव औऱ उनकी बहू अपर्णा यादव का बड़ा योगदान रहा।

इतना ही नहीं मुलायम सिंह की भूमिका कमोवेश एक बिन बुलाए मेहमान वाली हो गयी थी। क्योंकि शिवपाल यादव ने उससे पहले ही कह दिया था कि उनके आने या न आने से अब उन पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। ये वाकया उस त्रासदी का बयान कर रहा है जिससे मुलामय सिंह को उम्र के अपने आखिरी पड़ाव पर गुजरना पड़ रहा है। दूसरे शब्दों में कहा जाए कि लखनऊ में आयोजित जनाक्रोश रैली मुलायम सिंह यादव के वजूद के खिलाफ थी तो कोई उल्टी बात नहीं होगी।

वैसे भी शिवपाल किसके खिलाफ आक्रोश व्यक्त कर रहे थे? उस सरकार के जिसने मायावती से बंगला छीन कर उन्हें सौंप दिया था। और ऊपर से जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा दे दी है। या फिर उस सरकार से जिसके निर्देश पर उन्हें ये सब सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।

जिस तरह से गत दिनों मुलायय सिंह ने समाजवादी पार्टी के नई दिल्ली जंतर-मंतर पर आयोजित युवाओं के कार्यक्रम में अखिलेश यादव को खुला आशीर्वाद दिया था, उससे तो यही लग रहा था कि वे रैली में नहीं पहुंचेंगे। यह अंदेशा खुद शिवपाल यादव को भी था। लेकिन सबको अचरज में डालते हुए वो रैली में पहुंचे।

मुलायम सिंह यादव के जनाक्रोश रैली में पहुंचने से  अखिलेश यादव की मुश्किलें और बढ़ने वाली हैं। आज की तारीख में उनके घोर राजनीतिक विरोधी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर उनको शिकस्त देने का दंभ भर रहे उनके चाचा शिवपाल यादव उनके जनाधार में सेंध लगाने में लगे हैं। मुलायम सिंह के शिवपाल खेमे में जाने से अखिलेश यादव के कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी असर पड़ने का अंदेशा है।

मुलायम सिंह के इस रुख का समाजवादी पार्टी पर इसलिए भी असर पड़ेगा क्योंकि शिवपाल ने यह रैली शक्ति-प्रदर्शन के लिए रखी थी। वैसे भी अखिलेश यादव आज इस स्थिति में हैं कि उन्हें उस मायावती के मदद की जरूरत पड़ रही हैं, जो उनकी प्रतिद्वंद्वी रही हैं।

अलग पार्टी बनाने के बाद रविवार को शिवपाल यादव ने पहली बार सियासी ताकत दिखाने के लिए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के रमाबाई आंबेडकर मैदान में जनाक्रोश रैली का आयोजन किया। शिवपाल सिंह यादव के मंच पर जब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व उनके बड़े भाई मुलायम सिंह यादव पहुंचे तो शिवपाल समर्थकों का जोश आसमान पर पहुंच गया जो स्वाभाविक था।

मुलायम सिंह के भाषण में कई बार समाजवादी पार्टी का नाम आने पर उन्हें कई बार शिवपाल समर्थकों की हूटिंग का भी समना करना पड़ा। यह स्वाभाविक भी था। शिवपाल के कहने पर उन्होंने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात कही। उन्होंने शिवपाल को आशीर्वाद भी दिया।

अखिलेश के लिए यह और भी दिक्कत भरा रहा कि मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव ने शिवपाल यादव को शेर बताकर रैली में जन सैलाब की तारीफ की।

शिवपाल यादव ने रैली में अपने बेटे आदित्य यादव को भी प्रोजेक्ट किया। आदित्य यादव ने हिन्दू-मुस्लिम की बात न करते हुए रोजगार की बात कही। सुरक्षा की बात करते हुए उन्होंने प्रगतिशील को ही अपना धर्म बनाने की बात कही। आदित्य ने भले ही दिखावे के लिए ही सही योगी आदित्यनाथ पर भी हमला बोला, कहा कि विकास शहरों के नाम बदलने से नहीं अलग शहर बनाने से होगा। उन्होंने फिर से समाजवाद को जिंदा करने की बात कर एक तरह से अखिलेश यादव पर कटाक्ष किया।

योगी आदित्यनाथ की मदद से आयोजित की गई इस रैली में शिवपाल यादव अपनी ताकत दिखाने में कामयाब रहे। यह ताकत ही थी कि उनकी पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के मंच पर उनके अलावा, पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह, उनकी बहू अपर्णा यादव, राज्यसभा सांसद सुखराम सिंह यादव, एमएलसी मधुकर जेटली, पूर्व मंत्री शादाब फातिमा, शारदा प्रताप व पूर्व विधायक राजेंद्र यादव जैसे दिग्गज मौजूद थे।








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