यूपी:कानून ठेंगे पर रखकर उजाड़े जा रहे हैं गरीबों के घर

विशेष , लखनऊ/नौगढ़, शुक्रवार , 21-07-2017


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जनचौक ब्यूरो

लखनऊ/नौगढ़। बरसात के इस मौसम में जब कोई चिड़ियों का घोसला भी उजाड़ने की हिम्मत नहीं कर पाता है तब यूपी का प्रशासन वन विभाग के साथ मिलकर गरीबों को उनके घरों से बेदखल करने का अभियान छेड़ दिया है। मामला चंदौली जिले में स्थित नौगढ़ के मंझगाई का है। यहां बृहस्पतिवार को कचनरवा नाला में जिला प्रशासन, पुलिस और वन विभाग की संयुक्त टीम ने लगभग 40 परिवारों को वनभूमि पर बने उनके पुश्तैनी मकानों से बेदखल कर दिया।  

सिर पर छत का साया भी नहीं रहा

इस मामले में ग्रामीण मजदूर मंच के जिला सह संयोजक रामेश्वर प्रसाद के नेतृत्व में एक जांच टीम मौके पर गयी थी। जिसने पाया कि गांव के शम्भू वनवासी, लालती वनवासी, धूरा कोल, तुलसी चमार, सुरेन्द्र चमार, राम दुलारे कोल, रमेश कोल, राम प्रवेश कोल, शेर अली, श्रीनाथ कोल, छविनाथ यादव समेत 40 गरीबों के घरों को पुलिस और प्रशासन ने मिलकर गिरा दिया है। बरसात के इस मौसम में उनके घरों के गिरने से अब उनके सिर पर छत का साया भी नहीं रहा। नतीजतन बच्चों, बूढ़ों समेत महिलाओं को अब आकाश के नीचे दिन गुजारने पड़ रहे हैं। 

मामला यहीं नहीं थमा पुलिस की क्रूरता की कहानी अभी बाकी है। बुल्डोजर के साथ गए खाकीधारियों ने उनके कुए पाट दिए और घर में रखे अनाज को तहस-नहस कर दिया। तांडव यहीं नहीं रुका उसके बाद उनके खेतों में जेसीबी मशीन लगाकर उनकी खड़ी फसलों को बर्बाद कर दिया गया। प्रशासन की निरंकुशता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके घरों में लगे सोलर लाइट तक को नहीं बख्शा गया। कुछ को तोड़ दिया गया और बाकी को प्रशासन के लोग अपने साथ उठा ले गए। 

प्रशासन की कार्रवाई।

दावेदारों की अर्जी का कोई जवाब नहीं मिला

जांच टीम ने पाया कि इनमें से कई लोगों ने वनाधिकार कानून के तहत दावा भी जमा किया हुआ है जिसके संबंध में आजतक दावेदार को कोई सूचना नहीं दी गयी है। जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि इससे पहले वन विभाग के द्वारा ग्राम गोलाबाद, बोदलपुर, जयमोहनी के चोरमोरवां, भैसोड़ा में बेदखली की कार्रवाई की गयी थी। सुखदेवपुर में तो ग्रामीणों के धान के खेतों में बबूल के कांटे और बीज डाल दिए गए।

जांच रिपोर्ट को देखने के बाद स्वराज अभियान के राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य अखिलेंद्र प्रताप सिंह ने प्रशासन के इस जनविरोधी और वहशियाना रवैये की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि यूपी सरकार को वनाधिकार कानून से संबंधित उच्च न्यायालय के आदेश का सम्मान करना चाहिए। इस कड़ी में उसे तत्काल वन भूमि पर पुश्तैनी रूप से बसे आदिवासियों एवं वनाश्रितों की बेदखली पर रोक लगा कर वनाधिकार कानून के तहत पेश दावों का विधि के अनुरूप निस्तारण करना चाहिए। जिन गरीबों का नौगढ़ में मकान गिराया गया है और फसल बर्बाद की गयी है उन्हें तत्काल मुआवजा देना चाहिए। उन्होंने इस सिलसिले में एक पत्र मुख्यमंत्री को भेजा है।

हाईकोर्ट के आदेशों का खुला उल्लंघन

गौरतलब है कि वनाधिकार कानून को लागू कराने के सम्बंध में दायर एक जनहित याचिका के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की खण्डपीठ का एक स्पष्ट निर्देश है। इसमें उप्र सरकार को कहा गया है कि वो संशोधन नियम 2012 के अनुसार वनभूमि पर प्रस्तुत दावों के सम्बन्ध में विधिक प्रक्रिया अपनाते हुए मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया पूर्ण करे। नियम 2012 के अनुसार दावेदार को उसके दावे के निस्तारण के सम्बंध में लिखित रूप से सूचित करना है। जानकारों का कहना है कि वनाधिकार कानून खुद कहता है कि दावों के संबंध में मान्यता और सत्यापन प्रक्रिया पूरी किए बिना किसी को भी उसकी जमीन से बेदखल नहीं किया जा सकता है। इस सम्बंध में बार-बार पत्रक देने के बाद भी न्यायालय के आदेश का सम्मान नहीं किया जा रहा है। इसलिए प्रशासन द्वारा नौगढ़ में की जा रही बेदखली की कार्रवाई कानून के खिलाफ है। प्रशासन को न्यायालय के आदेश का सम्मान करते हुए बेदखली की कार्रवाई पर रोक लगानी चाहिए। 






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2xTGm :: - 09-09-2017
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Pradeep Bhattacharya :: - 07-23-2017
ये ग़रीब और दलित लोग पुश्तैनी रूप से जंगल की ज़मीन पर बसे हुए हैं। "कानून" के तहत अगर उन्हें वहां से हटाना है तो उन्हें वैकल्पिक आश्रय और जीविका के साधन मुहैया कराना आवश्यक है। इन अधभूखे लोगों के घर, आसवाब, खेत और फसल को उखाड़ फेकना कहाँ की मानवता है... योगी पर भी तो लोगों को भड़काकर दंगा, आगजनी और हत्या करवाने के कई मुक़दमे लम्बित है, राज्यपाल ने केस को आगे बढ़ाने की अनुमति न देकर कानून के हाथ क्यों बाँध दिए है? अम्बानी-अडानियों-टाटाओं की जमात पर बैंको की NPA की शक्ल में देश का लाखों करोड़ रूपया हड़प लेने का आरोप है। क्या "क़ानून" के हाथ उनके गर्दन तक पहुँच सकता है? क्या उनके घरों और कारखानों की कुर्की हो सकती है? क्या उनके क्लबों और ऐशगाहों पर किसी योगी या मोदी का बुलडोजर चल सकता है? क्या मोदी सिर्फ एकबार उनका नाम लेकर उनकी निंदा तक करने की हिम्म्मत कर सकते हैं? 56 इंच की सारी ताकत क्या सिर्फ ग़रीब-गुरबों को बेघर करने के लिए है?