विचारधारा के आवेग में नहीं बल्कि तथ्यों के आइने में चीजों को देखने की जरूरत: दिलीप सिमियन

विरासत , नई दिल्ली, रविवार , 27-05-2018


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विष्णु शर्मा

नई दिल्ली। इतिहासकार और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर दिलीप सिमियन ने शनिवार को पेरिस छात्र आंदोलन के विभिन्न पक्षों और विचारधारा पर विस्तार से चर्चा की। मौका था पेरिस छात्र आंदोलन की 50वीं बरसी का। प्रोफेसर सिमियन ने अपनी बात की शुरुआत करते हुए कहा कि पेरिस छात्र आंदोलन उस वक्तन विश्वभर में हो रही उथल—पुथल का प्रतिबिम्ब तो बना ही साथ ही इसने वामपंथ के पुराने सिद्धांतों पर प्रश्नचिन्ह  भी खड़ा कर दिया। माओवाद की अपनी पृष्ठभूमि को याद करते हुए सिमियन ने बताया कि हम लोग ये मानकर चल रहे थे कि यूरोप और अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों में क्रांतिकारिता खत्म  हो गई है और वहां आंदोलन की अब कोई गुंजाइश नहीं बची है। 

वामपंथियों का मानना था कि क्रांति का केंद्र ऐशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देश होंगे लेकिन पेरिस छात्र आंदोलन के आरंभ और इसके विस्तागर ने क्रांति के सिद्धांतों पर पुनर्विचार करने पर मजबूर कर दिया। इसने क्रांति और बदलाव के सवाल पर नए नजरिए से विचार करने की प्रेरणा क्रांतिकारियों और इतिहासकारों को दी।

दिलीप सिमियन ने कहा कि मई 1968 को पेरिस छात्र आंदोलन का पर्यायवाची माना जाता है, लेकिन यह भी सच है कि उसी वक्त दुनियाभर में आंदोलन और परिवर्तन की हवा बह रही थी। अमेरिका में वियतनाम युद्ध के खिलाफ आंदोलन जोर पकड़ रहा था, पॉलैंड और चेकोस्लोवाकिया में आंदोलन चल रहे थे, पाकिस्तानन में बंगालियों के खिलाफ दमन और उसके खिलाफ प्रतिरोध गति पकड़ रहा था, चीन में सांस्कृतिक क्रांति चल रही थी, भारत में नक्सलवादी आंदोलन उफान पर था। 1967 में बोलिविया में चे ग्वेरा की हत्या  के बाद उनका कल्ट दुनियाभर में बन रहा था और अप्रैल 1968 में मार्टिन लूथर किंग की हत्या के बाद अमेरिका में गृह युद्ध जैसी हालात बन गए थे।

बांग्लादेश में पाकिस्तान सरकार की दमनकारी नीति के चलते लाखों बंगाली भारत पलायन कर रहे थे। ऐसा भी कहा जा सकता है कि पूरी दुनिया को बांग्लादेश ने बांट दिया था। एक तरफ भारत, बंगलादेश और कम्युनिस्ट सोवियत संघ था तो दूसरी ओर अमेरिका, चीन और पाकिस्तान खड़े थे। ऐसा ही पेरिस में हो रहा था। नया वाम जिसकी अगुवाई छात्र कर रहे थे, वह पुराने वाम से उत्पन्न  निराशा का परिणाम था। वहां भी दक्षिणपंथियों और पुराने वाम ने छात्रों के खिलाफ गठबंधन बना लिया था। सिमियन ने चुटकी लेते हुए कहा कि भारतीय नक्सलवादियों की बड़ी भूल थी कि वे लोग चीन के प्रभाव में आकर पाकिस्तान और उसके सैन्य तानाशाह याह्या खान को क्रांतिकारी मान रहे थे।

प्रोफेसर सिमियन ने कहा कि तथ्य विचारधारा से ऊपर होता है। विचारधारा अंधा करती है, लेकिन तथ्य आखें खोलने वाले होते हैं, इसलिए विचारधारा के आग्रह के बिना तथ्यों को सामने रख कर चीजों को देखने की जरूरत है।

आयोजन में दर्शकों की ओर से उठे प्रश्नों  का भी सिमियन ने जवाब दिया। एनडीटीवी इंडिया के सीनियर एडिटर हृदयेश जोशी ने भी बातचीत के दौरान कई जानकारियां साझा की और इस आंदोलन को उत्तराखण्ड के सवालों से भी जोड़ा। एक प्रश्न  के जवाब में दिलीप सिमियन ने चिंता व्यक्त की कि लोग आपस में बात नहीं करते, जिससे गलतफहमी पैदा होती है। सिमियन ने आपसी संवाद पर जोर दिया, कहा बातचीत हर समस्या का हल है।

कार्यक्रम की शुरुआत में जनज्वार के संतोष कुमार ने अपने पेरिस प्रवास के अनुभवों को साझा किया। संतोष ने पेरिस छात्र आंदोलन के नेताओं और फ्रांस के लोगों से अपनी बातचीत का उल्लेख करते हुए बताया कि फ्रांस के लोग आज भी स्वयं को किसी न किसी रूप में पेरिस आंदोलन से जोड़कर ही देखते हैं।

कार्यक्रम प्रेस क्लब में जनज्वार डॉट कॉम की तरफ से ‘मई 1968 : छात्र आंदोलन-युवा आंदोलन के 50 गौरवशाली वर्ष’ विषय पर आयोजित किया गया था। 




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:: - 06-03-2018