सवर्ण आरक्षण और 13 प्वाइंट रोस्टर वापसी को चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करने की मांग

आंदोलन , लखनऊ, सोमवार , 11-02-2019


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जनचौक ब्यूरो

लखनऊ। सामाजिक न्याय और संविधान पर हो रहे हमलों के खिलाफ शाहिद आजमी की नौंवी बरसी पर सामाजिक न्याय के लिए संघर्षरत साथियों का जमावड़ा लखनऊ के कैफी आजमी एकेडमी में हुआ। रिहाई मंच द्वारा आयोजित कार्यक्रम से सवर्ण आरक्षण, 13 प्वाइंट रोस्टर वापस लेने, संख्यानुपात में प्रतिनिधित्व, न्यायपालिका व निजी क्षेत्रों में आरक्षण देने, दलित मुसलमान-ईसाई को एससी में शामिल करने की मांग का प्रस्ताव पारित करते हुए राजनीतिक दलों से चुनावी घोषणापत्र में शामिल करने की मांग की। सभी ने एक मत से कहा कि अगर मोदी की छात्र-नौजवान-मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ जो खुलकर नहीं है हम उसके खिलाफ होंगे। 

जनमंच के संयोजक पूर्व आईजी एसआर दारापुरी ने कहा कि वर्तमान में सरकार अभिव्यिक्त की आजादी, मानवाधिकार कार्यकताओं का दमन और विरोध की आवाजों को दबाने में लगी है। जो कि बड़ा खतरा है। इसके खिलाफ हम सबको खड़ा होना होगा। 

रिहाई मंच अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा कि आर्थिक आधार पर सवर्ण आरक्षण के जरिए संविधान, सामाजिक न्याय व बहुजनों पर बड़ा हमला बोला गया है। सवर्ण आरक्षण को लागू करने और संविधान संसोधन के जरिए संविधान की मूल संरचना और वैचारिक आधार पर हमला किया गया है। सामाजिक न्याय व आरक्षण की अवधारणा को निशाने पर लिया गया है। यह खतरनाक है दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के आरक्षण के खात्मे का रास्ता खुल गया है।

जनज्वार के संपादक अजय प्रकाश ने कहा कि चांदी के मुंह में चम्मच लेकर जो राजनीति करने की परंपरा है उसके सामानान्तर सामान्य जनों के बीच राजनीति उभरनी चाहिए और उनके बीच से नेतृत्व पैदा होना चाहिए। आजादी के 60-70 साल बीतने के बावजूद अगर देश की जनता जो मेहनत करती है जो इस देश को चलाती है वहां ऐसे राजनेताओं के सामने अगर हाथ जोड़ के खड़ी रहेगी तो न देश मजबूत होगा और न लोग मजबूत होंगे। 

लेखक व पत्रकार विनय जायसवाल ने कहा कि आरक्षण प्रतिनिधित्व का मसला है और यह प्रतिनिधित्व उसी रुप में और उन्हीं लोगों के लिए है जिसका संविधान में स्पष्ट उल्लेख किया गया है यानि सामाजिक और शैक्षणिक रुप से पिछड़े हुए लोग। आज हमें जिस रुप में संवैधानिक आरक्षण मिल गया है अब उसे बचाए रखने का खतरा भी हमारे सर पर मंडराने लगा है क्योंकि देश के संवैधानिक और नीति नियामक संस्थाओं में आजादी के इतने सालों बाद भी दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं है जिसका परिणाम आरक्षण लागू करने से लेकर कार्यपालिका और न्यायपालिका दोंनों के निर्णयों में साफ देखा जा सकता है। इसका ताजा उदाहरण 13 प्वाइंट रोस्टर है।

इसीलिए आरक्षण प्रतिनिधित्व का मसला है न कि गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम। आज देश में ओबीसी तबके की आबादी 52 प्रतिशत से भी कहीं ज्यादा है जो दलित आदिवासी और अल्पसंख्यक को मिलाकर तीन-चैथाई से भी बहुत अधिक हो जाती है। मीडिया में भी इन तबकों का प्रतिनिधित्व न होने के चलते वंचित समाज के मुद्दों को गुमराह कर दिया जाता है। आज जरुरत इन्हीं से लड़ने की है।  

वरिष्ठ पत्रकार मनोज सिंह ने कहा कि सही मायने में देश में लोकतंत्र तभी होता है जब सामाजिक न्याय और आर्थिक गैरबराबरी न हो। आज के समय में आर्थिक-सामाजिक गैरबराबरी की खाई चरम पर पहुचं गई है। बाबा साहेब ने भी कहा था कि स्वतंत्रता वहीं होती हैं जहां किसी तरह का शोषण न हो। जहाँ एक वर्ग दूसरे वर्ग पर अत्याचार न करता हो। सामाजिक न्याय, सम्मान, गरीबी का मामला हो, बेरोजगारी का मामला हो उसमें चीजें बद से बदतर हुई हैं और देश पीछे गया है। 

आरएसएस पहले भी संविधान और डा0 अंम्बेडकर का विरोधी रहा है और मनुसंहिता का राज कायम करना चाहता है। पाखंड, झूठ, लूट, फूट उनकी बुनियाद में है। अंबेडकर के स्मारक बनाते हैं, रोज दलितों का नाम लेते हैं और रोज एक रोहित वेमुला की जान लेते हैं।  

इंसाफ मंच के संयोजक मोहम्मद सलीम ने कहा कि मुल्क के हालात आपके सामने हैं चुनाव एक रास्ता है पर चुनाव ही एक रास्ता नहीं है। लोग सोच रहे हैं कि सिर्फ चुनाव के जरिए इस फासिस्ट निजाम को हरा देंगे जो कि मुमकिन नहीं है। इस मुल्क में अगर जम्हूरियत बचाना है, संविधान बचाना है तो जम्हूरी तहरीकों को खड़ा करना होगा। 

एएमयू छात्र नेता अहमद मुजतबा फराज ने दलित मुसलमान-ईसाई को एससी में शामिल करने की मांग करते हुए कहा कि आरक्षण का अधार सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ापन है। आज भी आकड़े कह रहे हैं कि आबादी के अनुपात में सत्ता व शासन की संस्थाओं-विभिन्न क्षेत्रों में दलितों-आदिवासियों व पिछड़ों का प्रतिनिधित्व काफी कम है। केन्द्र सरकार की ग्रुप ए की नौकरियों में लगभग सवर्ण 68 प्रतिशत, ओबीसी 13 प्रतिशत, एससी 13 प्रतिशत, एसटी 6 है। देश के 496 विश्वविद्यालयों के कुलपतियों में 448 सवर्ण हैं। 43 केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में 95 प्रतिशत प्रोफेसर, 92Û9 प्रतिशत एसोसिएट प्रोफेसर, 66Û27 प्रतिषत एसिसटेंट प्रोफेसर सवर्ण हैं। केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में एक भी प्रोफेसर ओबीसी तबके से नहीं है।

बीएचयू के छात्र नेता रणधीर यादव, कुलदीप मीना और भुवाल यादव ने कहा कि संविधान और सामाजिक न्याय पर इस दौर के इस बड़े हमले को कत्तई बर्रदास्त नहीं किया जा सकता है। नरेन्द्र मोदी सरकार ने आरएसएस के संविधान बदलने की योजना के एक पैकेज को अमली जामा पहनाया है। आरएसएस की संविधान व आरक्षण से नफरत जगजाहिर है। 

इस मौके पर प्रस्ताव पारित कर निम्न मांगें की गयीं-

1- यह सम्मेलन स्पष्ट तौर पर मानता है कि आर्थिक आधार पर सवर्ण आरक्षण के जरिए संविधान व सामाजिक न्याय पर बड़ा हमला किया गया है। सवर्ण आरक्षण को लागू करने और संविधान संशोधन के जरिए संविधान के मूल ढांचे और सामाजिक न्याय की अवधारणा को क्षतिग्रस्त किया गया है। इसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। सवर्ण आरक्षण दलितों-आदिवासियों व पिछड़ों के आरक्षण पर सीधा हमला भी है। एक तो दलितों-आदिवासियों-पिछड़ों के आरक्षण के खत्म करने का रास्ता खुल गया है और दूसरा सवर्ण आरक्षण दलितों-आदिवासियों-पिछड़ों  के आरक्षण को लागू रहने के बावजूद भी प्रभावहीन बना देता है। 

2- इसलिए यह सम्मेलन सवर्ण आरक्षण और संविधान संशोधन रद्द करने के लिए निर्णायक लड़ाई का आह्वान करता है।

3- सवर्ण आरक्षण के बाद केन्द्र सरकार ने आरक्षण खत्म करने के एजेंडा को आगे बढ़ाते हुए दलितों-आदिवासियों-पिछड़ों पर दूसरा बड़ा हमला किया है, विश्वविद्यालयों में शिक्षक नियुक्ति में विभागवार 13 प्वाइंट रोस्टर। 13प्वाइंट रोस्टर शिक्षक नियुक्ति में दलितों-पिछड़ों का आरक्षण लगभग खत्म कर देता है तो आदिवासियों को आरक्षण के दायरे से ही बाहर कर देता है। उच्च शिक्षा में सामाजिक न्याय पर इस हमले और उच्च शिक्षा से दलितों-आदिवासियों-पिछड़ों के बेदखली के इस मनुवादी फरमान को कतई मंजूर नहीं किया जा सकता है। 

4- सम्मेलन मांग करता है कि रिव्यू पिटीशन की झांसेबाजी के बजाय केन्द्र सरकार अध्यादेश लाकर अविलंब 200 प्वाइंट रोस्टर बहाल करे।

5- यह सम्मेलन मांग करता है कि पिछले जनगणनाओं के जातिगत आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं और 2021 की जनगणना खुले तौर पर जातिगत आधार पर कराई जाए।

6- आज भी आबादी के अनुपात में सवर्ण शासन-सत्ता की विभिन्न संस्थाओं व क्षेत्रों में कई गुना ज्यादा हैं। यह सम्मेलन लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए पिछड़ों को संख्यानुपात में प्रतिनिधित्व की गारंटी के लिए पिछड़ों के आरक्षण को 27 प्रतिशत से बढ़ाकर संख्यानुपात में देने की मांग करता है।

7- यह सम्मेलन मांग करता है कि दलितों-आदिवासियों-पिछड़ों को न्यायपालिका-मीडिया व अन्य क्षेत्रों के साथ निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की गारंटी की जाए। यह सम्मेलन 1990 से बैकलॉग भरने की गारंटी के साथ तमाम सरकारी रिक्त पदों पर नियुक्ति की मांग करता है।

8- यह सम्मेलन दलित मुसलमान-इसाई को एससी लिस्ट में शामिल करने की मांग करता है।

9- यह सम्मेलन बराबरी और संख्यानुपात में महिला आरक्षण की मांग करता है।

10- यह सम्मेलन मांग करता है कि फर्जी एनकाउंटर, मॉब लिचिंग व सांप्रदायिक हिंसा के साथ 2 अप्रैल 2018 के भारत बंद में दलित-हिंसा के दोषियों को कठोर सजा की गारंटी हो।

11- 2 अप्रैल 2018 आंदोलनकारियों पर लादे गये झूठे मुकदमे अविलंब वापस हों।

12- यह सम्मेलन मांग करता है कि न्यायपालिका में मौजूदा ब्राह्मनवादी कोलीजियम सिस्टम को खत्म किया जाए। 

13- यह सम्मेलन सवर्ण आरक्षण व 13 प्वाइंट रोस्टर का समर्थन करने वाले और चुप्पी साधने वाले राजनीतिक दलों का विरोध करता है। जो राजनीतिक दल इससे सहमत है वो इसे अपने 2019 के चुनावी घोषणा में शामिल करे और पूरा करें। 

14- यह सम्मेलन आरक्षण-सामाजिक न्याय-संविधान पर बढ़ते हमले के खिलाफ सहमत संगठनों के साथ मिलकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन का आह्वान करता है।

 








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