विरोधियों को आज भी परेशान कर रही है अक्टूबर क्रांति की ऊर्जा

क्रांति के 100 साल , , शनिवार , 20-05-2017


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गोपाल प्रधान

अक्टूबर क्रांति के सौ साल बाद उस पर विचार करते हुए आज कुछ बातों पर जोर देना जरूरी है। सबसे पहली बात कि रूसी क्रांति को समाजवादी चिंतन की एक दीर्घकालीन निरंतरता में देखना उचित होगा। समाज में विषमता के जन्म के साथ ही उसके विरोध की भी शुरुआत होती है। स्वाभाविक रूप से यह विरोध इतिहास की विभिन्न अवस्थाओं से निर्धारित होता रहा है। जब समाज में धर्म का बोलबाला था तो यह विरोध धर्म के आवरण में प्रकट हुआ। पूंजीवाद के आगमन के साथ पहले से चली आ रही विषमता का रूप बदला। अब उसके साथ निर्दय-निर्मम उदासीनता और अकेलेपन का भी वातावरण बना। इसी के साथ शासन की लोकतांत्रिक पद्धति के आने से विरोध का संगठित और राजनीतिक स्वरूप सामने आया। लोकतांत्रिक पद्धति के जरिए भी जनता की आकांक्षा की अभिव्यक्ति संभव होती हुई नहीं लगी तो समाजवादी विचारों का आकर्षण शुरू हुआ।

रूस की बोल्शेविक क्रांति की तस्वीर।

बोल्शेविक क्रांति

इसी क्रम में 1789 की फ़्रांसिसी क्रांति से जनता द्वारा समाज के पुनर्गठन की ऐसी राजनीति शुरू हुई जो 1871 में पेरिस कम्यून से होते हुए लेनिन के नेतृत्व में 1917 में रूस में बोल्शेविक क्रांति तक पहुंची। मुख्य बात यह है कि अक्टूबर क्रांति पूंजीवादी सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध समानता पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था स्थापित करने की एक ऐतिहासिक प्रक्रिया का नतीजा थी। मानव जीवन से शोषण का राज खत्म करने की उस कठिन प्रक्रिया को इसने पूर्णता प्रदान करने की कोशिश की थी।    

दूसरी बात कि रूसी क्रांति कोई ऐसी ऐतिहासिक दुर्घटना नहीं थी जिसे 1990 में दुरुस्त कर लिया गया। पूंजीवाद के ज्यादातर चिंतक अक्टूबर क्रांति को इसी तरह पेश करते हैं। वे बुर्जुआ लोकतंत्र से बेहतर किसी राजनीतिक प्रणाली की कल्पना ही नहीं कर सकते। ‘इतिहास का अंत’ के रूप में फ़ुकुयामा ने इसी मान्यता को गंभीरता के साथ प्रकट किया था। लेकिन यदि कोई होशमंद व्यक्ति आज पश्चिमी लोकतंत्र को आदर्श या पहले की समाजवादी व्यवस्थाओं से बेहतर बताने की कोशिश करे तो यही कहा जा सकता है कि तथ्य जैसी चीज पर उसका यकीन ही नहीं है।

वर्तमान पूंजीवादी प्रणाली जहां पहुंच गई है उसे समझने के लिए ‘उत्तर-सत्य’ जैसी धारणा का प्रचलन हुआ है जिसके अनुसार बेहयाई और झूठ बुरी बातें नहीं वरन हमारे राजनीतिक जीवन के प्रमुख रूप हैं। जनता के दिमाग पर संचार माध्यमों का इस कदर कब्जा हो चुका है कि पूरी तरह झूठी बात पर भी लोग विश्वास कर ले रहे हैं। 

चुनाव पूरी तरह नाटक बने

तीसरी बात कि समाज में बराबरी और लोकतंत्र तथा आजादी की लंबी लड़ाई में रूसी क्रांति के अनुभवों से सीखना होगा। हमने पहले ही कहा कि प्रयासों की लंबी कड़ी में यह क्रांति एक कोशिश थी। जिन सवालों को इस क्रांति ने हल करने का प्रयास किया था वे और भी गंभीर होकर उपस्थित हुए हैं। समाज में विषमता के बढ़ते स्तर को आज ‘1% बनाम 99%’ के मुहावरे में व्यक्त किया जा रहा है । विकसित पश्चिमी देशों में सचमुच के मुट्ठी भर ऐसे धन्नासेठों का उदय हुआ है जो समाज की विराट बहुसंख्या से अधिक संपदा के मालिक बनकर उभरे हैं।

चुनाव पूरी तरह से नाटक बनकर रह गए हैं। इन्हीं धन्नासेठों से चंदा लेकर सत्तारूढ़ और विपक्षी दोनों ही दल चुनावी अभियान संचालित कर रहे हैं। जिस सार्विक मताधिकार को लोकतंत्र की आत्मा समझा जाता था उसका कोई वास्तविक मूल्य नहीं रह गया है। अर्थतंत्र पर राजनीतिक सत्ता का कोई नियंत्रण नहीं रह गया है। सामाजिक जीवन से राजनीतिक तंत्र का और राजनीतिक तंत्र से अर्थतंत्र का रिश्ता टूट गया है । इसने एक तरह की जाति व्यवस्था को जन्म दिया है। अमीर की संतान अमीर ही होगी। अमेरिका में अच्छी शिक्षा इतनी मंहगी हो गई है कि उसे हासिल करना केवल अमीरों के लिए संभव रह गया है। इसने उन देशों में विरासत में मिली संपत्ति पर सौ फ़ीसद टैक्स लगाने की मांग को जन्म दिया है ।

रूस की बोल्शेविक क्रांति की तस्वीर।

घटना नहीं, प्रक्रिया

रूसी क्रांति कोई घटना नहीं, एक प्रक्रिया थी जो एक जीवंत समाज में चली। उस समाज में मशीन मानव नहीं, वास्तविक मनुष्य रहते थे जो शासन की बनाई नीतियों को प्रभावित करते थे। इन वास्तविकताओं से जूझते हुए क्रांति से पैदा हुए अनुभवहीन नेताओं को अकल्पनीय स्थितियों के समक्ष नए तंत्र का रेशा रेशा तैयार करना था। यह काम उन्हें अपने समाज की वास्तवकिता से टकराते हुए तो करना ही था ऊपर से पश्चिमी देशों ने एक दिन भी नई सत्ता को उखाड़ फेंकने की कोशिश बंद नहीं की। उन्होंने नई सत्ता के विरोधियों को लड़ने के लिए धन से लेकर हथियार तक सब कुछ मुहैया कराया।

अक्टूबर 1917 से लेकर हिटलर की पराजय तक पश्चिमी ताकतों के साथ तमाम तरह के ठोस वैचारिक संघर्ष चलाते हुए इस क्रांति को अपने अस्तित्व को कायम रखने की लड़ाई लड़नी पड़ी थी। इन विपरीत परिस्थितियों में भी उसने शत प्रतिशत साक्षरता और बेरोजगारी के खात्मे जैसे वे मुकाम हासिल किए जो पश्चिमी देशों के लिए सपना ही रहा। क्रांति की ऊर्जा के चलते ही उसने खेलों की दुनिया में अपना दबदबा बनाए रखा। जन स्वास्थ्य और रचनात्मक साहित्य तथा सांस्कृतिक सृजन की दुनिया में रूसी उपलब्धियों को झुठलाना असंभव है।

जर्मनी की सेनाओं ने द्वितीय विश्व युद्ध में जब स्तालिनग्राद को 199 दिनों तक घेरे रखा था तो घिरी हुई आबादी के लिए आयोजित संगीत समारोह की तरंगों को रेडियो पर सुनकर जर्मन सैनिकों के छक्के छूट गए थे। उन्हें लगा कि मौत के मुहाने पर जो लोग संगीत समारोह आयोजित कर सकते हैं उन्हें पराजित करना असंभव है। अक्टूबर क्रांति की ऊर्जा ने ही अंतरिक्ष विज्ञान में भी रूस को हमेशा अग्रणी बनाए रखा।

आज भी जीवित है विचार 

शीतयुद्ध के दौरान थोपी हुई हथियारों की होड़ और प्रभाव क्षेत्र के विस्तार की आकांक्षा में फंसकर रूस ने वैचारिक मोर्चे पर बरतरी खो दी। इस तरह उस महान प्रयोग का दुखद अंत हुआ जो धरती और मनुष्य की बेहतरी के लिए लड़ने वालों को अपनी गलतियों और उपलब्धियों से शिक्षा लेने के लिए हमेशा आमंत्रित करता रहेगा। इस सदी में भी उस क्रांति के मूल्यों और विचारों की धमक विरोधियों के प्रचार में सुनी जा सकती है। जो विचार पराजित हो गया होता है उसे नष्ट करने के लिए इतने परिश्रम और संसाधन की जरूरत नहीं पड़ती।

(लेखक गोपाल प्रधान हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक और मार्क्सवादी चिंतक हैं और आजकल दिल्ली स्थित अंबेडकर विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य कर रहे हैं।)






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