औरतों के खिलाफ चौतरफा युद्ध

आंदोलन , , रविवार , 21-05-2017


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कुमुदिनी पति

देश में महिलाओं पर जिस  प्रकार के यौन-आक्रमण जारी  है, उसे यदि किसी श्रेणी में रखा जा सकता है तो वह  है ऑल आउट वॉर ऑन विमेन’, यानी औरतों पर चौतरफा युद्ध- यह शारीरिक, मानसिक और वैचारिक युद्ध है। 2012 में दिल्ली की एक मेडिकल छात्रानिर्भया के साथ जो कुछ हुआ थावह दरिंदगी और वहशियानापन की सीमा पार गया ।लोगों को लगा था कि इससे अधिक बर्बर कुछ हो नहीं सकता इस घटना ने समाज के एक बड़े हिस्से को झकझोर डाला और देश के कोने-कोने में लोग सड़कों पर उतर पड़े थे, पर यह जन उभार स्वतः स्फूर्त था। बॉलीवुड ने विरोध दर्ज किया और मीडिया ने भी महिलाओं की सुरक्षा व आज़ादी के प्रश्न पर अनवरत बहस चलाई इस देशव्यापी प्रतिरोध का ही नतीजा था कि बलात्कार और महिलाओं पर हिंसा संबंधी कानूनों में संशोधन के मकसद से जस्टिस जे.एस वर्मा समिति की नियुक्ति हुई और आपराधिक कानून में व्यापक परिवर्तन हुए। लेकिन आज 5 साल बाद हमें लगता है कि समस्या जहां-की-तहां है; महिलाओं की दावेदारी पर प्रतिक्रियात्मक हमला जारी  है।

दिल्ली जंतर-मंतर पर महिला आंदोलन की तस्वीर।

जागरूकता बढ़ी लेकिन...

जब 1973 में नर्स अरुणा शॉनबॉग के साथ कार्यस्थल पर हुई हिंसा ने उसे एक अधमरे मांस के लोथड़े में बदल डाला था, 1995 में नैना साहनी शर्मा को उसके पति ने मारकरटुकड़े-टुकड़े कर तंदूर में झोंक दिया था, 1996 में होनहार विधि-छात्रा प्रियदर्शिनी मट्टू को एक स्टॉकर  ने उसके घर पर बलात्कार कर जान से मार डाला था तो इतना व्यापक प्रतिरोध नहीं हुआ था । और बथानीटोला, बिहार से लेकर गुजरात, छत्तीसगढ़ से लेकर मणिपुर और पश्चिम बंगाल के सिंगूर-नन्दीग्राम में महिलाओं के साथ जब जघन्यतम अपराध हए, प्रतिरोध स्वतः स्फूर्त और व्यापक नहीं, बल्कि संगठित और समाज के सचेतन हिस्सों से प्रारंभ हुआ था ये सारे मामले उस दौर के थे जब इलेक्ट्रॉनिक और सोशल  मीडिया कहीं नहीं थे, इसलिए उन पर आम समाज में व्यापक चर्चा नहीं थी। इस लिहाज से देखा जाए तो आज महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार के प्रति जागरूकता और सजगता बढ़ी है 

हमारी 'सेन्सिबिलिटी' कुंद हो रही है?

दूसरी ओर हम यह भी देख रहे हैं कि महिलाओं पर अपराध की बर्बरता की तुलना में उस पर संघर्ष कमज़ोर है। क्या हमारी सेन्सिबिलिटी कुंद हो रही हैं? क्या हम कुछ देर के लिए बहुत क्रोधित होते हैं, फिर ट्वीट करते  हैं, फेसबुक पर तस्वीरें शेयर करते हैं, कभी-कभी गाली देकर कमेंट लिखते  हैं या ऑनलाइन पेटिशन पर हस्ताक्षर कर संतुष्ट हो जातेहैं । ऐसा तो नहीं कि हम इन खबरों और उनके विश्लेषण इतना अधिक देख, सुनपढ़ रहेहैं कि हमारी इंद्रियां मस्तिष्क कुंद होते जा रहे हैं? घटनाओं की वीभत्सता का वर्णन, सरकारी बयानबाज़ी, मीडिया डिबेट ने हमारे मस्तिष्क को पूरी तरह से सैचुरेट कर दिया है, मानो सोचने, समझने, करने को कुछ बचा ही न हो।

दिल्ली जंतर-मंतर पर महिला आंदोलन की तस्वीर।

महिलाओं के खिलाफ चौतरफा युद्ध

हाल के दिनों में महिलाओं पर हुई अपराध की घटनाएं- रोहतक या गुड़गांव साबित करते हैं  कि हम निर्भया काण्ड के बाद से अधिक सचेत भले ही हुए हों, इन्हें रोकने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। महिलाओं पर चौतरफा युद्ध जारी है - जो महिला बोले या लड़े वह बचती नहीं; जो प्राथमिकी दर्ज करे वह भी असुरक्षित है। एक महिला मल्टीमीडिया प्रॉजेक्ट के जरिये पता करना चाहती है कि पुरुष यौनहिंसा के लिए प्रेरित क्यों होते हैं?  क्या यह परवरिश का मामला है, क्या पॉर्नोग्राफी इसके लिए जिम्मेदार है, क्या युवकों को अन्य किस्म की निराशाएं हैं और वे अपनी मर्दानगी इसी तरह साबित कर रहे हैं? क्या पुलिस जांच छिद्रों से भरी है या न्याय व्यवस्था भ्रष्ट हो चुकी है

अब  हमें  चक्र पूरा करना ही होगा- गोलबन्दी-संघर्ष-दावेदारीप्रतिरोधऔर फिर आत्मबलि तक की तैयारीक्योंकि समाज का व्यापक हिस्सा महिला के साथ खड़ा नहीं होता। शायद हमें ब्राह्मणवादी-पितृसत्तात्मक व्यवस्था अपने तरीके से समझा रही है कि कोई सरल  रास्ते  नहीं हैं और कानून भी अधिकतर शक्तिशाली के हाथ का खिलौना बन जाता हैतब और भी जब दक्षिणपंथीप्रतिक्रियावादी विचार का बोलबाला होता  है और प्रशासनिक मशीनरी से लेकर  न्यायाधीश उससे प्रभावित रहते हैं। इस दौर की एक और त्रासदी है। मोदी सरकार द्वारा एफसीआरए के प्राविधानों को कसने के चलते महिला मुद्दों पर काम कर रहे एनजीओज़ के मानो  पर ही कट गएक्योंकि फंड नहीं है वाम महिला संगठनों की सीमा उजागर हो रही हैवाम पार्टियों पर संकट है तो महिला संगठन भी जड़ हो गए। वरना शब्बीरपुर, रोहतक या कश्मीर  में  चल  रहे घटनाक्रम पर वाम महिला संगठनों के संयुक्त जांच दल का जाना और आंदोलन में उतरना असंभव न थाशायद इसी किंकर्तव्यविमूढ़ता के कारण बंगलुरु में  गार्मेंट उद्योग की महिला श्रमिकोंकेरल की प्लांटेशन मज़दूरों या कश्मीर की छात्राओं के प्रतिरोध में महिला संगठनों के प्रतिनिधियों को पूछा न गया। महिला आंदोलन की स्वायत्ता पर चुनौती है  फंडिंग और दलगत राजनीति के दबावों से मुक्त होकर आधी आबादी के अस्तित्व की लड़ाई के लिए खड़ा होना होगाबाकी समाज पीछे-पीछे आएगा।

(कुमुदिनी पति, सीपीआई (एमएल) की केंद्रीय समिति की सदस्य और महिला संगठन एपवा की राष्ट्रीय महासचिव रही हैं। आजकल इलाहाबाद में रहती हैं और महिला से लेकर तमाम ज्वलंत राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर लिख रही हैं।) 






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