बदलाव के लिए उठ खड़ी हुई महिलाएं

आंदोलन , , शुक्रवार , 05-04-2019


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ऋचा साकल्ले

सफ़दर हाशमी ने कहा था औरतें उठी नहीं तो ज़ुल्म बढ़ता जाएगा। और बृहस्पतिवार को मानो महिलाओं ने यह बात सुन ली। वो उठ खड़ी हुईं और सड़क पर आ गईं बदलाव के लिए यात्रा के साथ। चुप्पी तोड़ो, एकजुट हो और झूठ का पर्दाफ़ाश करो इस संकल्प के साथ गुरुवार को दिल्ली में क़रीब दो हज़ार महिलाएं सड़क पर उतरीं। मंडी हाउस से जंतर-मंतर तक बदलाव के लिए इन महिलाओं ने बुलंद की अपनी आवाज़ वर्तमान सरकार के ख़िलाफ़। 

हमारा टाइम आ चुका है इस आत्मविश्वास के साथ महिलाओं ने मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने पूछा हिंसा, नफ़रत और रेप की राजनीति क्यों? उनका सरकार से सवाल था। कहां है विकास, कहां है रोज़गार, कहां हैं महिलाओं के नेतृत्व के निर्माण की योजनाएं, क्यों ग़ायब है संवैधानिक संस्थाओं से महिलाओं की उपस्थिति। वो संसद मार्ग पर पूछ रहीं थीं कहां हैं संसद में महिलाओं के आरक्षण का बिल।

लोकसभा चुनाव सामने हैं और ये मार्च चुनाव से पहले मोदी सरकार के ख़िलाफ़ महिलाओं के ग़ुस्से का ग़ुबार था। इन महिलाओं का मानना है कि पिछले 5 सालों में यह साफ़ तौर पर देखा गया कि महिलाओं के बराबरी के संघर्ष और तमाम मुश्किलों के बाद पाई आज़ादी को बुरी तरह कुचला जा रहा है। इतना ही नहीं पूरे देश में झूठ, नफ़रत और स्त्री द्वेष का निरंतर प्रचार हो रहा है। इसीलिए ये महिलाएं इस चुनाव में बदलाव चाहती हैं और साफ़ कहती हैं-अब नहीं सहेंगे। उनका कहना है इस बार वो नफ़रत, हिंसा और रेप की राजनीति के ख़िलाफ़ वोट देंगी।

मार्च में शामिल एक्टिविस्टों के मुताबिक़ 20 राज्यों में क़रीब 150 जगहों पर महिलाएं बदलाव के लिए सड़कों पर हैं। जंतर-मंतर पर वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने कहा कि हम सब महिलाएं और बच्चियां अमन की बेटियां हैं और हम हिंसा, नफ़रत और रेप की राजनीति नहीं चाहते। उन्होंने कहा हमारा टाइम आ चुका है और ‘तुम्हारा’ टाइम जाएगा। वहीं महिला मार्च की आयोजकों में से एक शबनम हाशमी कहती हैं कि हम महिलाएं आज आइडिया ऑफ़ इंडिया को बचाने के लिए उठ खड़ी हुई हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय ने कहा कि अगर यह सरकार एक बार फिर आ जाती है तो महिलाएं अपने दो मौलिक अधिकारों से हाथ धो बैठेंगीं एक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दूसरा बराबरी का अधिकार। क्योंकि यह सरकार संविधान बदलने की धमकी देती है। इसलिए मोदी को हमारी ‘ना’है।

मार्च में शामिल महिलाओं का मानना है कि वर्तमान सरकार अपने  नागरिकों से ही लड़ाई लड़ रही हैं। महिला, दलित, आदिवासी, ईसाई, मुसलमान, छात्र, मज़दूर, किसान, कलाकार और लेखक आदि तमाम वर्गों को प्रताड़ित किया जा रहा है और बहुतों की हत्या भी कर दी गई। चारों ओर हिंसा बढ़ती जा रही है। सिर्फ़ और सिर्फ़ पुरुषवादी उन्माद बनाया जा रहा है जो हर रुप में महिला विरोधी है। सरकार की महिलाओं के लिए बनी उज्जवला योजना को सरकार ग़रीब महिलाओं को मिला उपहार बताती है जबकि वो हमारे पैसे पर हमारा हक़ है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ एक फ़ेल योजना है। स्त्री पुरुष अनुपात जस का तस कम बना हुआ है और सरकारी पोस्टरों पर योजना के प्रचार के बजाय उसके नेता का प्रचार ज़्यादा है।

महिलाओं का यह मार्च अपनी आवाज़ उठाकर बताना चाहता है कि हम इस दमनकारी शासन को नष्ट कर एक न्याय और शांति की व्यवस्था चाहते हैं। यह मार्च हिंसा, घृणा, भेदभाव और युद्ध के विरुद्ध सशक्त आवाज़ है। ये महिलाएं मिलकर लोकतांत्रिक गणराज्य में ‘बदलाव के लिए यात्रा’ कर वोट के अपने संवैधानिक अधिकार को बचाने का संकल्प ले रही हैं। और लोकतंत्र की आत्मा को बचाने का संकल्प वो ले चुकी हैं।

(ऋचा साकल्ले की रिपोर्ट।)

 








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