घरों से निकलो अपनी जीत का परचम उठा के

विशेष , , मंगलवार , 29-08-2017


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सीमा फ़ैज़ी

बलात्कारी बाबा गुरमीत राम रहीम को दोषी ठहराये जाने के बाद शुक्रवार को हिंसा का जो दौर शुरू हुआ, सड़कों पर जो खौफ दिखा, कानून व्यवस्था का जो मज़ाक उड़ा...जिस तरह कोर्ट की सख़्त टिप्पणियां आईं...उसने दो साध्वियों की लड़ाई को राजनीति और सरकार की नाकामयाबी का प्रतीक बना दिया। इस पर खूब राजनीति हो रही है और आगे भी होगी, लेकिन इस हिंसा ने एक सवाल इस देश की महिलाओं के लिए भी खड़ा कर दिया...सवाल है कि वो कहां हैं? उनकी आवाज़ क्या है? वो क्या सोचती हैं? पिछले हफ्ते ही एक और फैसला आया था, उसपर टीवी समाचार चैनलों के ज़रिए हमने कुछ महिलाओं की सोच को सुना था...जाना था...समझा था ...लेकिन तब भी और अब भी जब राम रहीम जैसे ताकतवर बाबा के खिलाफ फैसला आया है हम उन हज़ारों हज़ार बेटियों की, उनकी मांओं की या आधी आबादी की आवाज़ नहीं सुन पाये। वो क्या सोचती हैं, नहीं समझ पाए।

निर्भया कांड के विरोध में प्रदर्शन (फाइल फोटो) साभार : गूगल

निर्भया कांड ने बदली तस्वीर

मुझे याद है जब निर्भया कांड हुआ था, हज़ारों की संख्या में महिलाएं सुरक्षा की मांग को लेकर इंडिया गेट पहुंची थी। उन्होंने वहां डंडे खाए थे। पुलिस ने उन्हे घसीटा था...दौड़ाया था...मारा था...लेकिन वे वहां से हटने को तैयार नहीं हुई थीं। वो नज़ारा, वो ताकतवर तस्वीरें अभी भी लोगों के दिमाग में बरकरार हैं। उस विरोध प्रदर्शन के बाद ही राजनैतिक पार्टियों को महिलाएं भी वोट बैंक नज़र आने लगी थीं। उसके बाद ही योजनाओं में महिलाओं की भागीदारी पर ज़ोर बढ़ा उसके बाद ही सरकारें और विपक्ष महिला सुरक्षा को अपने महत्वपूर्ण मुद्दों में रखने लगे थे। उसके बाद ही देश ने बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ के नारे को गंभीरता से लेना शुरू किया। ऐसा नहीं है कि पहले महिला सशक्तीकरण की आवाज़ नहीं थी...जरूर थी पर बस इतनी कि एक बिल ड्राफ्ट हुआ महिलाओं के आरक्षण का। उसे कई बार संसद में पेश किया गया और फाड़ दिया गया और फिर वो अपनी मौत मर गया। कहने का मतलब आवाज़ थी पर बेहद कमज़ोर और थोड़ी धीमी भी। लेकिन निर्भया आंदोलन से जो धमाका हुआ...उसने राजनीति से लेकर सरकार तक...परिवार से लेकर समाज तक को महिलाओं के बारे में सोचने को मज़बूर किया। यानी 1857 के गदर में जैसे मेरठ छावनी का विद्रोह स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बना ठीक उसी तरह इंडिया गेट पर हुए विरोध की तस्वीरें महिलाओं के संघर्ष का निशान बन गईं।

(फाइल फोटो) साभार : गूगल

आज तुम घर पर क्यों हो?

अब सवाल ये है कि तीन तलाक हो या राम रहीम की हार तुम आज घर में क्यों हो...तुम उनको जवाब देने क्यों नहीं निकलीं जो सड़क से लेकर टीवी की स्क्रीन तक पर तुम्हारी जीत को बेमानी बता रहे हैं। तुम क्या सोचती हो...तुम क्या चाहती हो...बताने बाहर आओ...आओ इंडिया गेट पर और बता दो की चार राज्यों पंजाब, हरियाणा, दिल्ली (यहां पुलिस केंद्र के पास है) और राजस्थान की सरकारें भले तुम्हारे साथ नहीं हैं...पर तुम राम रहीम के गुंडों से नहीं डरती... बता दो तुम उन दो साध्वियों के साथ हो जो इतने साल तक अकेले लड़ती रहीं.....बता दो तुम एक साथ तीन तलाक के डर से आज़ाद होकर खुश हो।

(फाइल फोटो) साभार : गूगल

इंडिया गेट तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है

निर्भया के समय तुम विरोध करने निकली थी...आज अपने जश्न से फिर एक बार ऐसा धमाका करो की सरकार, समाज, परिवार सब हिल जाएं। बाबा के गुंडे समझ जाएं कि वो सरकार को डरा सकते है तुमको नहीं। सरकार समझ जाए की इसबार डर गए तो कहीं के नहीं रहेंगे। इसलिए निकलो अपनी जीत का परचम उठा के...निकलो जश्न के जरिए अपनी ताकत दिखाने... इंडिया गेट तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है....और इंडिया गेट जैसे हर शहर-कस्बे के चौक-चौराहे, घंटाघर, टाउन हॉल, हर राज्य की विधानसभा तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। फिर एक बार बदलाव की आंधी को तेज़ करो।

(लेखक टीवी पत्रकार हैं और आजकल मुम्बई में रहती हैं।)






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Jyoti sidana :: - 08-29-2017
Very nicely and ststematically written article. Yes it is true it is the time to come out from parda and home and raise their voice against violence against women. Because "Dar ke Aaage he Jeet hai".