7 फरवरी को देश के युवा संसद पर बोलेंगे धावा ,मांगेंगे मोदी से अपमान और विश्वासघात का हिसाब!

आंदोलन , , बुधवार , 06-02-2019


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लाल बहादुर सिंह

"सस्ती अच्छी शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार" के उनके नारे को आम चुनाव में प्रमुख मुद्दा बनाइये, क्योंकि यह महज उनके जीवन की बेहतरी के लिए जरूरी नहीं वरन राष्ट्रीय विकास की भी पूर्वशर्त है!

दरअसल मोदी सरकार की सबसे विराट असफलता रोजगार के मोर्चे पर ही रही । वादों और डिलीवरी के बीच सबसे बड़ी खांईं यही रही  । युवा भारत, डेमोग्राफिक डिविडेंड, 3 करोड़ सालाना रोजगार आदि सब बातें कोरा जुमला ही साबित हुईं ।

5 साल के बाद आज हालत यह है कि देश में बेरोजगारी दर 45 साल के सबसे ऊंचे मुकाम पर पहुंच चुकी है । सरकारी संस्था NSSO के लेबर सर्वे के अनुसार यह आज 1972-73 के बाद के अपने अधिकतम बिंदु 6.1% पर पहुंच चुकी है ।CMIE  के अनुसार तो यह 9% के भयावह स्तर पर है । 2011-12 में यह मात्र 2.2% थी । 

सबसे भयावह स्थिति तो उन युवाओं के लिए है, जो अच्छे दिन की उम्मीद में कभी मोदी-मोदी का कलरव करते हुए मोदी को सत्ता में ले आये थे । 15-29 साल के युवाओं के लिये बेरोजगारी दर 2011-12 के 8.1% से बढ़कर 2017-18 में 28.7% पुरुषों के लिए तथा 13.1%से बढ़कर 27.2% महिलाओं के लिए पहुंच चुकी है ।

CMIE के अनुसार 2018 में तो लगातार गिरावट हुई है और 1 करोड़ 10 लाख रोजगार के अवसर ख़त्म हो गए तथा दिसम्बर 2018 में बेरोजगारी दर 7.4% पहुंच गयी ।

इन आंकड़ों से सरकार खुद इतनी डरी हुई है कि वह इन्हें छिपाने की हर चंद कोशिश कर रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के अध्यक्ष तथा एक सदस्य ने हाल ही में इसलिए त्यागपत्र दे दिया कि उसकी दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में पेश सर्वे रिपोर्ट पर सरकार बैठ गयी और उन्हें सार्वजनिक करने से इंकार कर दिया ।

सरकार शुतुरमुर्ग बन गयी है । हाल में पेश अंतरिम बजट में रोजगार के सर्वाधिक ज्वलंत सवाल पर चुप्पी साध ली गयी है और मुद्रालोन के संदिग्ध आंकड़ों को छोड़कर सरकार के पास रोजगार सृजन पर कोई दृष्टि या पहल नहीं है ।

यह आश्चर्यजनक है कि पूरे देश में बेरोजगारों तथा प्रतियोगी छात्रों के रोजगार व प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर लगातार होने वाले जुझारू आंदोलन, बैरिकेड पर जूझते, पुलिस दमन का मुकाबला करते नौजवान जेटली जी को दिखे ही नहीं और उन्होंने अपने इस दृष्टिदोष के आधार पर यह निष्कर्ष निकाल लिया कि देश में बेरोजगारी की कोई समस्या है ही नहीं ! 

पिछले 5 साल देश के तमाम विश्वविद्यालयों, कैम्पसों में अभूतपूर्व उद्वेलन, बेचैनी, प्रतिवाद, प्रतिरोध के साल रहे, लेकिन मोदीजी के विद्वान संकटमोचक "स्पिन मास्टर" जेटलीजी यह समझ ही नहीं पाए कि जिस अनिश्चित भविष्य की ओर पूरी युवा पीढ़ी को ठेल दिया गया है, उससे भी इसका कुछ लेना-देना है ! 

वे यह भी नहीं समझ पाए कि आरक्षण के लिए पाटीदारों, मराठों, जाटों के जबर्दस्त आंदोलनों के पीछे भी मूल उत्प्रेरक रोजगार के घटते अवसर ही हैं और उसी बहती गंगा में हाथ धोने के लिए उनकी सरकार ने गरीबों के लिए 10% आरक्षण की घोषणा भी किया ।

यह सब कुछ मोदी सरकार की देश की युवापीढ़ी के प्रति घोर संवेदनहीनता और वायदाखिलाफी का नमूना है। कल देश के युवा दिल्ली में पहुंचकर सरकार के इन सभी कारनामों का हिसाब मांगेंगे।

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हैं और आजकल लखनऊ में रहते हैं।)










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