भाजपा के फिर आने का मतलब हमारे जैसे एक्टिविस्ट मारे जाएंगे या फिर जेल में यातना भुगतेंगे: जिग्नेश मेवानी

सप्ताह का साक्षात्कार , अहमदाबाद, शुक्रवार , 09-11-2018


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बसंत रावत

( जिग्नेश मेवानी आज निर्विवाद रूप से देश के उन चुनिंदा युवा नेताओं में से एक हैं जिनकी अपील अपने प्रदेश की सीमाओं से बाहर भी उतनी ही ज़्यादा है जितनी कि  गुजरात में जहां उन्होंने पिछले साल वडगांव विधान सभा सीट से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार जीत हासिल कर दलित आंदोलन को एक नया आयाम दिया। और  तभी से  लगभग सभी राजनीतिक दलों ख़ासकरकांग्रेस और भाजपाकी निगाहें अलग-अलग कारणों से मेवानी पर टिकी हुई हैं    

बतौर एक युवा दलित नेता के रूप में देश में जाने जाने के बाद मेवानी अपने ऐतिहासिक दायित्व को राष्ट्रीय स्तर पर निभाने की यथा सामर्थ्य कोशिश कर रहें हैं। अपनी भूमिका को लेकर बहुत ख़ुश अथवा आश्वस्त  तो  नहीं हैं लेकिन मायूस और ना उम्मीद  भी नहीं हैं। अगले साल, यानी 2019 का लोक सभा चुनाव, युगांतकारी बदलाव देखेगा, ऐसा मेवानी का मानना है। और इसके लिए वो हर संभव कोशिश कर रहे हैं। जिन राज्यों में विधान सभा के चुनाव होने जा रहे हैं वहां एक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।लक्ष्य है भाजपा को हराना। या उन्हीं के शब्दों में कहें तो भाजपा का राजनीतिक जनाज़ा निकालाना।

अहमदाबाद से ऊना तक दलित अस्मिता यात्रा से मेवानी एक प्रखर युवा दलित चेहरे के रूप में एक ताज़ी हवा का झोंका बन कर आए। और फिर पूरे देश का इमैजिनेशन कैप्चर कर लिया। आज भी एक ऐक्टिविस्ट विधायक के तौर पर अपनी जूझारू आक्रामकता को खोए बिना वे दलित आंदोलन के लिए अपना सब कुछ  लुटाने का जज्बा रखते हैं- एक  सच्चे रोमांटिक क्रांतिकारी की तरह। 

भगत सिंह, कॉर्ल मार्क्स और अम्बेडकर के विचारों की तपिश मेवानी को तो चैन से बैठने देती है और ही आम विधायकों जैसे सुविधाभोगी  बनने  की इजाजत। हालांकि ऐसा कभी उनका मक़सद रहा भी नहीं सच पूछो तो वो बनना भी नहीं चाहते हैं आराम पसंद बनना या कहलाना उनके लिए एक राजनीतिक गाली जैसा है। 

तेज़ राजनीतिक सूझ-बूझ रखने वाले प्राणी के तौर पर वे सड़क और संसद में भेद नहीं करते। सड़क उनकी राजनीतिक प्रेमिका भी है और प्रयोगशाला भी। असल में सड़कें मेवानी को बहुत रोमांचित करती हैं संघर्ष के  लिए सड़कों में उतर आना उन्हें हमेशा बहुत अच्छा लगता है- ज़िंदगी का पहला प्यार जैसा। सड़कें सिर्फ़ उन्हें जीने का मक़सद देती हैं बल्कि उनकी राजनैतिक ज़िंदगी का मोरल कंपास हैं। क्योंकि जो कुछ पाया, सड़कों से ही पाया। सड़क, संघर्ष और मेवानी ये तीनों हमराही, हमजोली हैं। एक दूसरे के पर्याय। एक दूसरे के बग़ैर सदा अधूरे, रस हीन। 

पिछले दस महीनो में, जब से  कांग्रेस के समर्थन से विधायक निर्वाचित हुए, मेवानी जिसे अपनी सबसे बड़ी कामयाबी मानते हैं  वो है भूमिहीन दलित परिवारों को 2200 एकड़ ज़मीन का आवंटन करवाना और ये काम हुआ है कच्छ ज़िले की रापर तहसील में। पिछले आठ सालों में मेवानी के नेतृत्व में दलित अधिकार मंच लगभग 6000 एक़ ज़मीन भूमिहीन दलितों को दिलाने में कामयाब रहा है। आज इस आवंटित ज़मीन की क़ीमत कम से कम 500 करोड़ रुपया आंकी जाती है। ये अपने आप में एक बड़ी  कामयाबी है। लेकिन मेवानी  इसे एक शुरुआत भर मानते हैं। दलित आंदोलन के लिए एक अच्छी  शुरुआत।

जनचौक संवाददाता बसंत रावत ने मेवानी से एक लम्बी बातचीत की। यहां पेश है बातचीत के कुछ अंश।)

बसंत रावत: एक ऐक्टिविस्ट से विधायक बनने का सफ़र कैसा रहा?

जिग्नेश मेवानीएक विधायक का तमग़ा बड़े काम की चीज़ साबित हुआ। एक बुर्ज़्वा ग्लैमर के रूप में मैंने  इसे इस्तेमाल किया। निर्वाचित विधायक होने से काम आसान हुआ। ब्यूरोक्रैट अच्छी तरह बात करते हैं। सिर्फ़ ऐक्टिविस्ट बने रहने से कहीं ज़्यादा फ़ायदेमंद रहा विधायक बन कर लड़ाई लड़ना। विधायक बनने के बाद भूमि आवंटन में तेज़ी आयी। विधायक बनने के बाद मैं थोड़ा लचीला हुआ, प्रैक्टिकल हुआ हूं बिना सिद्धांतों के साथ समझौता किए।

बसंत रावत: अब आप न सिर्फ़ एक विधायक हैं बल्कि एक राष्ट्रीय नेता भी हैं। अपनी भूमिका को कैसे देखते हैं?

जिग्नेश मेवानी: किसी भी ऐक्टिविस्ट की तरह मेरी भी वही भूमिका है- हर हाल में भाजपा को हराना। जिन प्रदेशों में चुनाव हो रहे हैं, वहां भाजपा के ख़िलाफ़ धुआंधार प्रचार करना। इस वक्त यही काम सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। क्योंकि इस बार यदि फिर भाजपा जीतती है तो संविधान की धज्जियां ही नहीं उड़ाएंगी, सामाजिक ताना-बाना टूट कर बिखर जाएगा। हमारे जैसे ऐक्टिविस्ट या तो मारे जाएंगे या जेलों में यातना भुगतेंगे। आज के हालात पहले ही बहुत अच्छे नही हैं।स्थिति और भी बिगड़ सकती है। भाजपा को रोकना मेरी पहली राजनीतिक जिम्मेदारी है। इसके अलावा, दलित-मुस्लिम एकता को मजबूत करना और युवाओं को लामबन्द करना।

बसंत रावत: विधायक बनने के बाद क्या करते रहे हैं अभी तक?

जिग्नेश मेवानी: पूरे देश में घूम कर जनांदोलनों को अपना समर्थन देते आया हूं। अपनी कांस्टिट्यूएंसी में काम करने के अलावा, दलित आंदोलन को मज़बूत करना, कमज़ोर तबक़ों के लिए आवाज़ उठना, और भाजपा के ख़िलाफ़ प्रचार करना।

बसंत रावत: भाजपा को कैसे हराएंगे ? 

जिग्नेश मेवानी: मेरे प्रचार के दौरान अब तक 23000 दलितों ने भाजपा को  कभी वोट देने की शपथ ली है। मैं अब राजस्थान के बाद मध्य प्रदेश में प्रचार करने वाला हूं वहां में रीयल असली मुद्दे वाला हूं मसलन दो करोड़ रोज़गार, जीएसटी, नोटबंदी, किसानों की आत्महत्या।

बसंत रावत: भाजपा को लेकर क्या आंकलन है ?

जिग्नेश मेवानी : 2014 में भाजपा को  सिर्फ़ 31 प्रतिशत वोट मिले थे। 69 प्रतिशत लोगों ने वोट नहीं दिया। पिछले चार सालों में नोटबंदी और जीएसटी के चलते भाजपा का वोट बैंक घटा है। बहुत से युवा नेता भाजपा के सामने खड़े हुए हैं। भाजपा राम मंदिर की बात उठाने लगी है इसका अर्थ है उसे ख़तरा लगने लगा है।

बसंत रावत: क्या महा गठबंधन कामयाब होते दिख रहा है? 

जिग्नेश मेवानी: दुर्भाग्य से नहीं। एजेंडा सेट नहीं कर पाए। दल अपना वजूद बचाने की ज़्यादा कोशिश कर रहे हैं। किलर इन्स्टिंक्ट नहीं दिख रही है।

बसंत रावत: क्या लोकसभा का चुनाव लड़ने की तैयारी है? 

जिग्नेश मेवानी: अभी तक मन नहीं बनाया है। यदि कोई अच्छी सीट का ऑफ़र आता है तो सोच सकता हूं।कहीं से भी। गुजरात के बाहर किसी दूसरे राज्य से लड़ने के लिए ओपन हूं।

बसंत रावत: राष्ट्रीय नेता के तौर पर उभरने के बाद दलित आंदोलन की क्या स्थिति है?

जिग्नेश मेवानी: आज दलित आंदोलन ज़्यादा मुखर, आक्रामक हुआ है। मुस्लिम के साथ मिलकर लड़ना संभव हुआ है। नए दलित संगठन पैदा हो गए हैं

बसंत रावत: यदि मेवानी प्रधानमंत्री बनता है तो पहला काम क्या होगा? 

जिग्नेश मेवानी: 100 दिन का नरेगा का काम 300 दिन का करूंगा। 16 लाख टीचर की ख़ाली जगह भरूंगा, पांच लाख रेलवे की भर्ती शुरू कराऊंगा, 6 लाख डॉक्टरों की ख़ाली पोस्ट के लिए तुरंत भर्ती शुरू कर दूंगा। ये काम एक महीने में किए जा सकते हैं।

(बसंत रावत दि टेलीग्राफ के अहमदाबाद ब्यूरोचीफ रहे हैं और आजकल जनचौक के साथ जुड़े हुए हैं।)

 

 








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