“13 फीट ऊंची और 5 फीट चौड़ी दीवार के भीतर सुरक्षित है आधार”

बड़ी ख़बर , नई दिल्ली, बृहस्पतिवार , 22-03-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। आधार पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार ने बुधवार को एक ऐसा तर्क दिया जिसके बारे में ऑनलाइन सिस्टम की जानकारी रखने वाला कोई शख्स सोच भी नहीं सकता है। एक ऐसे दौर में जबकि किसी डाटा की सुरक्षा का पैमाना कोई घर और ढांचे की मजबूती नहीं हो सकता है। तब उसने ये कहकर कि आधार के सर्वर को 13 फीट ऊंची और 5 फीट चौड़ी दीवार के भीतर बिल्कुल सुरक्षित रखा गया है, लोगों के कान खड़े कर दिए हैं।   

केंद्र सरकार की तरफ से ये बातें एटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने रखीं। उन्होंने बहस की शुरुआत करते हुए आधार की रक्षा में निजता के खिलाफ न्यायपूर्ण आर्थिक वितरण के सिद्धांत को पेश किया। एटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि जीने के अधिकार में निजता के साथ भोजन और सम्मान का अधिकार भी शामिल है। इस तरह से तकरीबन 3 करोड़ वंचित लोगों के अधिकार को इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता है क्योंकि एक दूसरे वर्ग को अपनी निजता के जाने का खतरा है।

मामले की सुनवाई कर रही चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने वेणुगोपाल ने कहा कि जीवन का अधिकार न केवल पशुओं की तरह जीने से है बल्कि ये एक इंसान के सम्मान के साथ जीने की वकालत करता है। उन्होंने कहा कि आधार योजना एक इंसान को भोजन समेत उसकी दूसरी बुनियादी जरूरतों को मुहैया कराता है।

उन्होंने कहा कि अंगेजों के शासन के दौरान और आजादी के बाद देश में बड़े स्तर पर गरीबी और भ्रष्टाचार व्याप्त था और सरकार ने उसे कम करने के लिए बड़े स्तर पर प्रयास किया।

मामले पर बहस को आगे बढ़ाते हुए वेणुगोपाल ने कहा कि आधार डाटा 13 फीट ऊंची और पांच फीट चौड़ी दीवार के भीतर रखे गए सर्वरों में स्टोर किया गया है। सेंट्रल आईडेंटिटीज डाटा रिपोजिटरी (सीआईडीआर) जिसकी निगरानी करता है। डाटा सिक्योरिटी के टूटने के खतरे की आशंकाओं को दूर करने के लिए उस ढांचे का 4 मिनट का एक वीडियो तैयार किया गया है कोर्ट की इजाजत पर जिसे दिखाया जा सकता है।

जहां तक किसी व्यक्ति की निजता पर हमले का संबंध है तो आधार योजना का ढांचा इस तरह से डिजाइन किया गया है कि निजता के दायरे में किसी छोटे स्तर पर आक्रमण भी संभव नहीं होगा। उन्होंने कहा कि मुट्ठीभर याचिकाकर्ता निजता के आधार पर आधार को खत्म करने का दावा कर रहे हैं। जो जीवन के अधिकार समेत भोजन के अधिकार, पेंशन को हासिल करने का अधिकार और दूसरी सामाजिक कल्याण की योजनाओं को मुहैया कराने में मददगार साबित होता है।

एटार्नी जनरल के इस तर्क ने बेंच को उनसे कई सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया। जस्टिस चंद्रचूड ने कहा कि “राजनीतिक गारंटी और न्यायपूर्ण आर्थिक वितरण के बीच कोई अंतरविरोध नहीं है। ऐसा नहीं है कि निजता आबादी के केवल एक हिस्से के लिए है और दूसरों के लिए आर्थिक लाभ है।”

जस्टिस चंद्रचूड के साथ अपनी सहमति जताते हुए चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि “मतलब आपका ये कहना है कि न्यायपूर्ण आर्थिक वितरण के लिए निजता के अधिकार को सहूलियत के हिसाब से तिलांजलि दी जा सकती है?”

बेंच के सवालों का जवाब देते हुए एटार्नी जनरल ने कहा कि कोई भी व्यक्ति ये कहते हुए कोर्ट नहीं आया है कि उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है। उन्होंने कहा कि 2009-16 तक आधार योजना बिल्कुल स्वैच्छिक थी। इसलिए मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का सवाल ही नहीं उठता है।

जस्टिस चंद्रचूड ने कहा कि 2009-16 तक किसी को भी इस बात की जानकारी नहीं थी कि स्कीम की कोई सुरक्षा नहीं है। उन्होंने आगे इस बात को चिन्हित करते हुए कहा कि अपनी शख्सियत के एक हिस्से का कोई भी खुलासा नहीं करना चाहेगा। इस पर एजी ने कहा कि किसी भी व्यक्ति ने लाभ हासिल न कर पाने की कोई शिकायत नहीं की है।

जैसे ही सुनवाई आगे बढ़ी वेणुगोपाल ने वर्ल्ड बैंक समेत तमाम एजेंसियों और दूसरे देशों की रिपोर्टों को रखना शुरू कर दिया। जिन्होंने इसी तरह से पहचान के लिए कुछ सिस्टम बना रखे हैं। इसमें इकोनामिक सर्वे और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें भी शामिल थीं।

उन्होंने कहा कि आधार स्कीम और कानून के लाभों को सुचारू रूप से सुनिश्चित करने के लिए ही बनाया गया है। आधार के न होने के चलते लाभों और सब्सिडियों को न हासिल कर पाने के मसले पर उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि अगर आधार न हो तो वो किसी लाभ को पाने से वंचित रह जाएगा।  










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