आप विधायक मामला: चुनाव आयोग बना मोदी की राजनीतिक लड़ाई का मोहरा

राजनीति , नई दिल्ली, शनिवार , 20-01-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। चुनाव आयोग को अगर आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष पीएम मोदी का लेटर बाक्स कह रहे हैं तो ये कोई अतिश्योक्ति नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त एके जोति के कार्यकाल के दौरान उनके फैसलों को देखने के बाद किसी के लिए भी इसे खारिज करना मुश्किल होगा। इस दौरान उन्होंने हर तरीके से मौजूदा सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी को मदद पहुंचाने की कोशिश की। जिसमें गुजरात चुनाव को हिमाचल से अलग कराने से लेकर इलेक्टोरल बांड तक के कई विवादित फैसले शामिल हैं। 

अब जबकि दो दिन बाद उनका रिटायरमेंट है तो जाते-जाते उन्होंने सत्तारूढ़ दल को फायदा पहुंचाने वाला एक और फैसला सुना दिया। जिसमें लाभ के पद मामले में आप के 20 विधायकों की सदस्यता के खात्मे की सिफारिश है। जिसे उन्होंने राष्ट्रपति को भेज दी है। और संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति चुनाव आयोग के फैसले को मानने के लिए बाध्य है। ऐसे में राष्ट्रपति की सहमति भी अब औपचारिकता भर है। हालांकि पीड़ित विधायक कोर्ट जरूर गए हैं लेकिन देखने की बात होगी कि उनको वहां से कितनी राहत मिल पाती है।

लेकिन इस मामले में जो बात सामने आ रही है वो बेहद चौंकाने वाली है। और उसको किसी और ने नहीं बल्कि चुनाव आयोग के पूर्व पदाधिकारियों ने चिन्हित किया है। देश के संविधान, परंपरा और पूरी कानूनी प्रक्रिया को ताक पर रखकर किस तरह से मनमाने फैसले लिए जा रहे हैं ये घटना उसकी ताजा नजीर है। ये मामला इसलिए गंभीर हो जाता है क्योंकि इसमें एक संवैधानिक संस्था शामिल है। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में आयोग के कुछ पूर्व पदाधिकारियों ने बताया कि इस मामले की बगैर कोई सुनवाई किए ही आयोग ने ये फैसला सुना दिया। एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया कि आयोग का 23 जून 2017 का आदेश ही सब कुछ साफ कर देता है। उन्होंने कहा कि “ ये आदेश बिल्कुल साफ-साफ कहता है कि संसदीय सचिव के तौर पर विधायकों की नियुक्ति को हाईकोर्ट द्वारा रद्द किए जाने के आदेश के बावजूद लाभ के पद के मामले की सुनवाई चुनाव आयोग जारी रखेगा। फिर उसके बाद क्या हुआ?”

लेकिन चुनाव आयोग ने 23 जून 2017 के बाद एक भी सुनवाई नहीं की। उस आदेश में ये बात बिल्कुल साफ तौर पर दर्ज थी कि “मौजूदा प्रक्रिया के तहत आयोग सभी संबंधित पक्षों को अगली सुनवाई की तारीख की जानकारी देगा।” 

नसीम जैदी जो जून 2017 में मुख्य चुनाव आयुक्त थे उन्होंने एक्सप्रेस से इस मसले पर कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया। चुनाव आयोग के एक दूसरे पूर्व अधिकारी ने कहा कि लाभ के पद की शिकायत पर फैसला तभी हो सकता है जब आयोग आगे दिए गए तीन सवालों का जवाब दे पाएगा। पहला: क्या विधायक किसी पद पर थे? दूसरा: क्या पद किसी सरकार के तहत आता था? और तीसरा: क्या उस पद से किसी तरह का लाभ होता था?

उन्होंने कहा कि अगर आयोग के 23 जून के आदेश को पढ़ा जाए तो उसमें केवल पहले सवाल का उत्तर मिलेगा। चुनाव आयोग का ये मत था कि 20 विधायकों ने गलत तरीके से नियुक्तियों के जरिये लाभ के पद को हासिल किया था।

पूर्व अफसर ने कहा कि “आदेश साफ-साफ इस बात को कहता है कि ये फैसला केस की मेरिट के प्रति किसी तरह के पूर्वाग्रह के बगैर लिया गया है। इसका मतलब है कि केस की मेरिट पर चुनाव आयोग को सुनवाई करनी चाहिए थी। जिसको उसने नहीं किया।”

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग एक प्रकिया के तहत अपने नतीजे पर नहीं पहुंचा है। और इसलिए उसे कानून की निगाह में जायज नहीं ठहराया जा सकता है। 

इस बात से किसी को क्या एतराज हो सकता है कि अगर कोई काम गैरसंवैधानिक है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए। लेकिन उसको करने की लिए जो प्रक्रिया है उसका जरूर पालन किया जाना चाहिए। और उन सारे सवालों के वाजिब उत्तर आने चाहिए जो उसके रास्ते में खड़े होते हैं। क्योंकि मौजूदा चुनाव आयुक्त से जब इस बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने मामले को अर्द्ध न्यायिक करार देते हुए कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया। 

लिहाजा मुख्य चुनाव आयुक्त अगर इसे किसी भी रूप में न्यायिक बता रहे हैं तो उसकी तमाम प्रक्रियाओं और मर्यादाओं का भी उन्हें पालन करना चाहिए था। लेकिन ऐसा लगता है कि सत्ता के दबावों के बीच उन्होंने इसको जरूरी नहीं समझा। ऐसे में पूरे फैसले पर सवाल उठना स्वाभाविक है।   






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