एक्टिविस्ट केस: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- बाज की नजर से देखेंगे पूरा मामला

बड़ी ख़बर , , बुधवार , 19-09-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। भीमा कोरेगांव मामले में नजरबंद पांच एक्टिविस्टों के मामले की सुनवाई करते हुए आज सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से कहा कि वो पुलिस के दस्तावेजों को बाज की निगाह से देखेगा। इसके साथ ही उसने महाराष्ट्र पुलिस को अपने सबसे उम्दा दस्तावेज पेश करने को कहा। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के नेतृत्व में गठित जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड की बेंच का कहना था कि केवल अनुमान के आधार पर स्वतंत्रता की बलि नहीं दी जा सकती है।

आज जब राज्य सरकार की ओर से एएसजी तुषार मेहता ने सीलबंद केस डायरी बेंच के सामने पेश की और कहा कि इसमें सब कुछ स्वत: व्याख्यायित है। तो इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि पुलिस अपना सबसे बेहतरीन दस्तावेज पेश करे। इस मामले की सुनवाई बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी। इस बीच सभी एक्टिविस्टों की नजरबंदी की स्थिति बनी रहेगी।

आज कोर्ट में तकरीबन तीन घंटे सुनवाई चली। इस दौरान सरकारी वकील ने सरकार के पक्ष में और एक्टिविस्टों के खिलाफ हर तरह की दलील पेश करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि एक्टविस्टों की गिरफ्तारी पुख्ता सुबूतों के आधार पर की गयी है। उन्होंने इस सिलसिले में फोन, लैपटाप और इलेक्ट्रानिक यंत्रों से मिले सुबूतों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इन सब को जांच के लिए फोरेंसिक विभाग के पास भेज दिया गया है। उनका कहना था कि ऐसी कोई वजह नहीं है जिससे ये कहा जाए कि सरकार उन्हें फंसा रही है।

इस पर जस्टिस चंद्रचूड ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा कि कोर्ट पूरे मामले पर बाज की तरह से निगाह रखेगी। उनका कहना था कि जब मामला इतना आगे बढ़ गया है तब याचिका सुनवाई के योग्य नहीं है ये कहना ही अपने आप में बेमानी है। उन्होंने कहा कि वो चाहते हैं कि कोर्ट के कंधे और मजबूत हों साथ ही किसी पर किसी तरह का प्रतिबंध न हो। उनका कहना था कि कानून व्यवस्था को बिगाड़ने, सरकार को उखाड़ फेंकने और असहमति में बहुत अंतर होता है।

इस पर पुलिस में शिकायत करने वाले पक्ष की तरफ से पेश होते हुए वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा कि आपराधिक कृत्य और असहमति में भी अंतर होता है। और इस मामले में पुलिस की जांच को आगे बढ़ाने की इजाजत दी जानी चाहिए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अपना पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि दोनों एफआईआर में आरोपियों के नाम नहीं हैं। और इसमें से कोई भी यलगार परिषद की बैठक में मौजूद नहीं था। और सबसे खास बात ये है कि जिस बैठक पर सवाल उठाए जा रहे हैं उसकी अगुवाई सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज कर रहे थे।

उनका कहना था कि वरवर राव पर अब तक 25 मामले दर्ज हुए थे और वो उन सभी में बरी हो चुके हैं। गोंजाल्विस पर दर्ज 18 मामलों में वो 17 में बरी हो चुके हैं। आज पूर्व कानून मंत्री अश्वनी कुमार भी एक्टिविस्टों के पक्ष में उतरे। उन्होंने कहा कि मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। इस मौके पर याचिकार्ताओं की तरफ से आनंद ग्रोवर, राजीव धवन और प्रशांत भूषण भी मौजूद थे। और उन्होंने भी अपने-अपने पक्ष पेश किए।

आपको बता दें कि पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वो दस्तावेजों की जांच के बाद ही मामले पर कोई फैसला करेगा। उसका कहना था कि अगर उसे केस फर्जी लगा तो वो पूरे मामले को ही रद्द कर देगा।

मामले में केंद्र की ओर से पेश एएसजी मनिंदर सिंह ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के दखल का विरोध किया। उन्होंने कहा कि मामला नक्सलवाद से जुड़ा है जो देश के लिए एक घातक समस्या बन चुका है। और इस मामले की सुनवाई निचली अदालत में होनी चाहिए थी न कि सुप्रीम कोर्ट में। उनका कहना था कि इससे कानून के इतिहास में एक गलत नजीर बनेगी।

गौरतलब है कि याचिका सुविख्यात इतिहासकार रोमिला थापर, अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक, सामाजिक कार्यकर्ता सतीश देशपांडे और माया दारूवाला की तरफ से दायर की गयी है। गिरफ्तार सुधा भारद्वाज, वरवर राव, गौतम नवलखा, अरुण फरेरा और गोंजाल्विस फैसला आने तक अपने घरों में नजरबंद बने रहेंगे।  








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