आखिर क्यों नहीं है राहुल को देश के गैर सांप्रदायिक मिजाज पर भरोसा?

विश्लेषण , , शनिवार , 17-03-2018


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लोकमित्र गौतम

राष्ट्रीय कांग्रेस के 84वें अधिवेशन को संबोधित करते हुए इसके नये अध्यक्ष राहुल गांधी ने हालांकि सिर्फ 4 मिनट का भाषण दिया और यह कहा कि तमाम लोगों के बोलने के बाद वह उनके बोले गये को ध्यान में रखकर विस्तार से बोलेंगे। लेकिन आप क्या बोलना चाहते हैं या आप क्या बोलेंगे इसकी परख के लिए 4 मिनट भी कम नहीं होते। अपने 4 मिनट के पहले संबोधन में राहुल गांधी ने जो कुछ कहा है, उसमें नया कुछ भी नहीं है। यह वही सब कुछ है जो वह पिछले कई सालों से कहते और बोलते रहे हैं।

वही खस्ता हाल अर्थव्यवस्था की बातें, वही समाज को बांटने के आरोप और वही वायदा खिलाफी की बातें। ये तमाम बातें वह अकेले ही नहीं बल्कि विपक्ष का हर नेता कहता रहा है। यकीन मानिए देश का आम मतदाता इन रोज-रोज की सुनी गई बातों से रोमांचित होने वाला नहीं है। ये बातें या ये आरोप आम लोगों को झकझोर नहीं सकते। क्योंकि इन सभी आरोपों की गहराई में जाने पर भाजपा से ज्यादा खुद कांग्रेस फंसती है। 

इन घिसीपिटी और पारंपरिक बातों से कांग्रेस भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकती। यह बिना किसी भूमिका के साफ-साफ कहने का वक्त है कि आज भाजपा जिस राजनीतिक और वैचारिक धरातल पर खड़ी है, कांग्रेस उसे तभी टक्कर दे सकती है, जब वह अपने मौजूदा ढांचे का कायाकल्प करे। बिना अपने चाल, चरित्र और चेहरे में आमूलचूल परिवर्तन किये कांग्रेस भाजपा को उखाड़ फेंकने में सक्षम नहीं हो सकती। अगर किसी तरह का कोई समीकरण बन भी गया जिससे कांग्रेस ने सरकार बनाने लायक बहुमत हासिल कर लिया तो भी इससे भाजपा को पछाड़ा नहीं जा सकता। 

भाजपा को पछाड़ना तभी संभव है जब कांग्रेस ईमानदारी से आजादी के बाद के अब तक के अपने इतिहास पर गौर करे और अपनी उन गलतियों को स्वीकारे, जिनकी वजह से आज भाजपा उसके सामने इतनी ताकतवर बनकर खड़ी हो गई है। दरसअल कांग्रेस के अस्तित्व का सबसे बड़ा संकट यह है कि भाजपा अपने आपमें कोई मौलिक विचार ही नहीं है। वह कांग्रेस का ही एक ज्यादा स्पष्ट और कुछ मामलों में ज्यादा बेहतर संस्करण है। भाजपा पर हम जो-जो आरोप लगाते हैं, उन आरोपों का शुरुआती सिरा कांग्रेस से ही जाकर जुड़ता है। चाहे बात साम्प्रदायिकता की हो, चाहे हिंदुत्व की हो, चाहे अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव की हो या फिर चाहे दलितों और पिछड़ों की बदहाल स्थितियों की हो। 

आजादी के बाद महात्मा गांधी ने कांग्रेस को यूं ही खत्म करने के लिए नहीं कहा था, वह दूरदर्शी थे, वह देख रहे थे कि आजादी की लड़ाई के दौरान भी कांग्रेस के कई चेहरे थे। मगर चूंकि आजादी की लड़ाई एक इतना बड़ा मोर्चा था कि बाकी किसी विषयांतर के लिए तब सुविधा ही नहीं थी। इसलिए कांग्रेस के इस मूल चेहरे में बाकी चेहरे तब छिप जाते थे। लेकिन आजादी के बाद जैसे ही अपनी सत्ता का दौर शुरु हुआ तो वे तमाम छिपे या कम सक्रिय चेहरे उभरकर सामने आ गये। कांग्रेस कुछ भी कहे लेकिन सच्चाई तो यही है कि आजादी के बाद से वह हमेशा से बिना ढोल बजाये या दावा किये हिंदुत्व की राजनीति करती रही है। आज देश में जितनी साम्प्रदायिक समस्याएं हैं कहीं न कहीं उनकी बुनियाद में कांग्रेस की हरकतें, उसकी गलतियां या उसकी नासमझियां शामिल रही हैं। 

लाख बाबरी मस्जिद ध्वंस का सारा आरोप भाजपा और उसकी सहयोगी शाखाओं को जाये। लेकिन अगर कांग्रेस के भीतर हिंदुत्ववादी धड़ा मजबूत नहीं होता और अंदर से कांग्रेस खुद मस्जिद के विरोध की दबी छुपी आवाजें नहीं होतीं तो वह कभी नहीं टूटती। यह कांग्रेस का ढुलमुल रवैया ही था कि उसने आजादी के बाद लगातार इस साम्प्रदायिक मुद्दे को बना रहने दिया उसने इसे कभी हल ही नहीं होने दिया, बल्कि 1986 में राजीव गांधी ने ताला खुलवाने और इस समस्या के मजबूत शिलान्यास तक पहुंचे। इसके बाद बाबरी मस्जिद बच ही नहीं सकती थी, भले उसके ध्वंस की तोहमत किसके सिर आयी हो।

यह कांग्रेस ही थी जिसने आजादी के बाद से लगातार मुसलमानों को संघ का डर दिखाकर असुरक्षा की राजनीति करती रही है। अगर कांग्रेस अपने तथाकथित सेकुलर राजनीति के भरोसे पर मजबूती से खड़ी होती तो शाहबानों के मामलों में उसे कट्टरपंथी मुल्लाओं के सामने नहीं झुकना पड़ता। यह आरोप लगाने का भाजपा को यूं ही मौका नहीं मिला कि कांग्रेस हमेशा से मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करती रही है। दरअसल सारे लड्डू अपनी हथेली में रखे रहने के लिए संतुलन का खेल खेलती रही है। मुसलमानों को संघ का डर दिखाकर साधा तो हिंदुओं को यह संदेश देकर साधा कि सही मायनों में हिंदुत्व की पोषक वही है। 

आज की तारीख में अगर दलित बड़े पैमाने पर कांग्रेस से छिटक गये हैं तो आखिरकार इसमें कांग्रेस के अलावा और किसका दोष है? आजादी के बाद करीब 60 साल तक सत्ता में रहने के बाद भी कांग्रेस ने न तो देश में दलितों को वाजिब सम्मान सुनिश्चित किया और न ही उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति में किसी तरह का कोई मूलभूत बदलाव ही लायी। ..तो फिर दलित कांग्रेस को छोड़कर बसपा का दामन क्यों न थामें? या किसी दूसरी पार्टी के चंगुल में क्यों न फंसे? उसमें और बाकियों में फर्क ही क्या है? दरअसल सच्चाई यही है कि भाजपा का पितृ संगठन या कहें उसका वैचारिक आधार ‘संघ’ इस कदर मजबूत ही इसलिए हुआ है; क्योंकि कांग्रेस उसी का डुप्लीकेट संस्करण थी। आखिरकार बाजार में डुप्लीकेट विचार या उत्पाद कब तक लोगों को झासें में रख पाता। 

इसलिए अगर वाकई राहुल गांधी ईमानदारी से भाजपा का मुकाबला करना चाहते हैं तो उन्हें सबसे पहले कांग्रेस में आमूलचूल बदलाव करना होगा। पर्दे के पीछे से या लुक छिपकर भाजपा की एक्टिंग करने, मंदिर-मंदिर घूमने और खुद को जेनेऊधारी हिंदू साबित करने की कोशिश के साथ ही राहुल गांधी जी आप खुद को या कांग्रेस को सेकुलरवाद का चैंपियन नहीं साबित कर सकते। सवाल है आखिर कांग्रेस को देश के गैर साम्प्रदायिक मिजाज पर भरोसा क्यों नहीं है? कांग्रेस को यह बात क्यों याद नहीं आती कि आजादी की लंबी लड़ाई इस देश के गैर साम्प्रदायिक मिजाज ने लड़ी थी। जब तक राहुल जी आपको या कांग्रेस को देश के इस मिजाज पर भरोसा नहीं होता, तब तक आप लोग भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकते।

(लेखक विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में वरिष्ठ संपादक हैं)










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KIRAN12 :: - 03-17-2018
bilkul sahi vishleshan, aaj bhi desh me bjp jitni bhi badat bna kar ubhari hai usme congress ka hi haath hai, lekhak se 2 kadam aange ki bat or yeh hai ki congress or bjp dono ek sikke ke do pahlu hai,, congress is like green snake in green grass and bjp is black snake in green grass congress or bjp ke sadyantra ko ab is desh ke janta ko samjhna hoga, congress ne goa , uk, or annya rajyo me jo bjp ko walkover diya hai usko janta samjh rahi hai,ki congress boltii kya hai or karti kya haio. abn to desh ko congress or bjp dono ki grift se door hone ka samay aa gya h

ashok upadhyay :: - 03-17-2018
शानदार विशलेषण . जब सत्ता बिना कुछ किए आरक्षण जाति धर्म को लडवा कर ही मिल जाती है तो मूल विषयों को हाथ लगाने की क्या जरूरत है