उपचुनाव: दूर तक जाएगी यूपी-बिहार के नतीजों की आवाज

बड़ी ख़बर , नई दिल्ली, बुधवार , 14-03-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। यूपी के दो लोकसभा उपचुनावों में सपा-बसपा गठबंधन की एक पर जीत और दूसरे पर निर्णायक बढ़त ने तीन दशक पहले की एक तस्वीर को ताजा कर दिया है। बाबरी मस्जिद गिरने के बाद जब माना जा रहा था कि सूबे में बीजेपी को कोई परास्त नहीं कर सकता तब सपा-बसपा ने गठबंधन कर बीजेपी की महत्वाकांक्षी संभावनाओं पर पानी फेर दिया था। और फिर नारा लगा था “मिले मुलायम-कांशीराम हवा हो गए जै-श्रीराम”। एक बार फिर दोनों पार्टियां एक साथ आकर बुआ और भतीजे की अगुआई में भाजपा को उसकी जमीन दिखा दी हैं। 

बीजेपी के लिए ये किसी बड़े झटके से कम नहीं है। जिस पार्टी ने अभी एक साल पहले 402 में 324 सीटें हासिल की हों उसके मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को अपने ही घरों में करारी हार का सामना करना पड़े उसके लिए इससे बड़ी चिंता की बात कोई दूसरी नहीं हो सकती है। इससे भी ज्यादा गंभीर बात बीजेपी और संघ के लिए है। वो जिस चेहरे पर भविष्य का दांव लगाए बैठे थे और जिसके सहारे दूसरे सूबों की चुनावी वैतरणियां पार करने की कोशिश कर रहे थे। अपने ही सूबे में उसकी नाव डूब गयी। योगी इस समय जब अपने राजनीतिक जीवन के शीर्ष पर बैठे हैं तब उनके घर ने ही उनका साथ छोड़ दिया। ये योगी के साथ-साथ गोरखनाथ पीठ के लिए भी किसी सदमे से कम नहीं है।

सपा-बसपा के मिलने के बाद बीजेपी की इस हालत के संकेत तो पहले ही मिलने शुरू हो गये थे। और बीजेपी ने इस शर्मनाक स्थिति से बचने के लिए कई दूसरे उपाय भी किए थे। मसलन फूलपुर में उसने कभी अपने धुर विरोधी रहे माफिया अतीक अहमद से अंदरूनी साठगांठ की। और उन्हें देवरिया की जेल से इलाहाबाद लाकर चुनाव मैदान में उतार दिया जिससे सपा के पक्ष में जाने वाले अल्पसंख्यक वोटों का बंटवारा किया जा सके। लेकिन पार्टी की ये तरकीब भी काम नहीं आयी। 

गोरखुपर में गोरखनाथ पीठ से बाहर का प्रत्याशी दिया जाना भी हार की एक वजह मानी जा रही है। लेकिन प्रमुख वजह कतई नहीं है। वहां भी हालात के संकेत योगी आदित्यनाथ को मिलने लगे थे लिहाजा उससे पार पाने के लिए उन्होंने कोई कसर नहीं बाकी रखी। उन्होंने जिले में एक ऐसा डीएम नियुक्त किया जिसके निलंबन का इलाहाबाद हाईकोर्ट निर्देश दे चुका था।

लेकिन उसके आदेशों को दरकिनार करते हुए योगी ने अपने खासम खास राजीव रौतेला को वहां का जिलाधिकारी नियुक्त किया। बताया जा रहा है कि रौतेला ने भी उनके भरोसे को नहीं तोड़ा। आखिरी मौके तक बीजेपी के पक्ष में रास्ता बनाने की कोशिश की। वोटों के प्रतिशत का विवाद उसका एक पक्ष है। लेकिन जब उससे भी सफलता मिलती नहीं दिखी तो मतगणना के दौरान उसने अपने सारे घोड़े छोड़ दिए। 

गोरखपुर न्यूज लाइन के संपादक मनोज सिंह ने बताया कि 10 चक्र की मतगणना हो जाने के बावजूद डीएम ने केवल तीन चक्रों के ही मतों की घोषणा की। उसके बाद हाथ से निकलते मामले को अपने काबू में करने के लिए उसने मतगणना स्थल से मीडिया और दूसरे मतगणना एजेंटों को हटाना शुरू कर दिया। जो नियम के बिल्कुल विरुद्ध था। यहां तक कि वो वहां पर केवल प्रत्याशी के रहने देने के पक्ष में था।

पर्यवेक्षक को भी रहने की इजाजत देने के लिए तैयार नहीं था। पहले ही इस आशंका से प्रेरित सपा ने हंगामा शुरू कर दिया और मामला लखनऊ विधानसभा तक में गूंजने लगा। नतीजतन दबाव में चुनाव आयोग को हस्तक्षेप करना प़ड़ा और फिर डीएम को भी चुनाव आयोग के दबाव में अपने कदम पीछे खींचने पड़े।

यूपी ही नहीं बीजेपी के लिए बुरी खबर बिहार से भी है। अररिया सीट पर उसे मुंह की खानी पड़ रही है। ऐसा माना जा रहा है कि जनता के जनादेश को बदलने का नतीजा बीजेपी और जेडीयू गठबंधन को भुगतना पड़ रहा है। साथ ही आरजेडी मुखिया लालू के प्रति लोगों के भावनात्मक लगाव ने उसको औऱ मजबूती दे दी है।

ऊपर से तेजस्वी यादव सूबे में आरजेडी के एक परिपक्व चेहरे के तौर पर उभरे हैं। इसका पूरा फायदा पार्टी को मिल रहा है। और इन बातों और समीकरणों से आगे कुल मिलाकर सूबे की सरकारों और केंद्र के कामकाज को लेकर जमीनी स्तर पर लोगों में घोर निराशा है। जो वोटों के रूप में बीजेपी के खिलाफ सामने आ रहा है। 

ये मामला अब सिर्फ यूपी, बिहार तक सीमित नहीं है बल्कि पूरा उत्तर भारत इसकी चपेट में है। पिछले दिनों राजस्थान में दो लोकसभा और एक विधानसभा सीट के उप चुनाव के नतीजों ने भी यही संकेत दिया था। मध्य प्रदेश में विधानसभा सीट पर बीजेपी की हार के जरिये वही कहानी दोहराई गयी। 2019 के आम चुनावों की दहलीज पर खड़ी बीजेपी के लिए ये किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। 

 






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