“शाह को बरी करने के लिए तब के चीफ जस्टिस ने दिया था 100 करोड़ के घूस का प्रस्ताव”

बड़ी ख़बर , नागपुर/मुंबई, मंगलवार , 21-11-2017


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निरंजन टाकले

नागपुर/मुंबई।नागपुर के दौरे के दौरान बृजगोपाल हरिकिशन लोया, जो मुंबई की सीबीआई की स्पेशल कोर्ट के जज थे, की मृत्यु 30 नवम्बर और 1 दिसम्बर की रात में होती है। अपनी मौत के समय वे सोहराबुद्दीन केस की सुनवाई कर रहे थे, जिसके मुख्य अभियुक्त बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह थे। उस दौरान मीडिया ने बताया था कि उनकी मौत हार्ट अटैक से हुई। पर मेरी जांच जो नवम्बर 2016 से नवम्बर 2017 तक चली, उसमे कई परेशान करने वाली परिस्थितियां लोया की मौत को लेकर सामने आईं, जिसमें किन-किन स्थितियों में उनका पार्थिव शरीर उनके परिवार को सौंपा गया, शामिल है।

जिन लोगों से इस सिलसिले में मेरी बातचीत हुई उनमें लोया की बहन अनुराधा बियानी धुले, महाराष्ट्र में मेडिकल डॉक्टर हैं। अनुराधा ने एक विस्फोटक दावा किया, “मेरे भाई लोया ने बताया था कि मोहित शाह जो उस समय बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे, फैसला अपने हिसाब से करने के लिए भाई लोया को 100 करोड़ रुपये देने का प्रस्ताव किया था”। यह बात अनुराधा को जज लोया ने अपनी मौत के कुछ हफ्ते पहले बताया था, जब सारा परिवार अपने पैतृक घर गाटेगांव में दीवाली के लिए इकट्ठा हुआ था। लोया के पिता हरकिशन ने भी इस बात की पुष्टि की कि उसे फेवर में फैसला सुनाने के बदले पैसा और मुंबई में घर का प्रस्ताव मिला है।

बृजगोपाल हरकिशन लोया को कुछ ही हफ्ते में आनन फानन में जे टी उतपत की जगह जून 2014 में सीबीआई कोर्ट का स्पेशल जज नियुक्त किया गया, जब उक्त जज ने अमित शाह की अपील पर कड़ी टिप्पणी की कि उन्हें इस केस में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित न होने की छूट कोर्ट को नहीं देनी चाहिए। फरवरी 2015 के आउटलुक की रिपोर्ट के अनुसार “सीबीआई कोर्ट की सुनवाई के दौरान उतपत इसकी अध्यक्षता करते रहे, यहां तक कि बाद में भी, कोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार अमित शाह एक बार भी कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए, अंतिम दिन भी जब वे इससे मुक्त हुए, उस दिन भी शाह के पक्षकार हर बार की तरह कोर्ट के सामने मौखिक साक्ष्य ही प्रस्तुत करते रहे, जिसमें अमित शाह के डायबिटीज से ग्रस्त मरीज होने से लेकर दिल्ली में व्यस्त होने के कारण गिनाए गए।” आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार, “ 6 जून, 2014 को जज उतपत ने अपनी नाराजगी शाह के वकील से जाहिर की और उस दिन अमित शाह की अनुपस्थिति को मंजूर करते हुए अमित शाह को 20 जून को कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया। लेकिन उस दिन भी शाह कोर्ट में नहीं पहुंचे। 

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस उत्पत ने शाह के वकील से कहा, “ हर बार बिना किसी ठोस कारण के अमित शाह की गैरहाजिरी को आप जस्टिफाई करते हैं। अगली सुनवाई 26 जून को निर्धारित की जाती है। लेकिन 25 जून को ही जज उत्पत का पुणे तबादला हो गया है।  यह सितम्बर 2012 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का खुला उल्लंघन है, जिसमें सोहराबुद्दीन केस के शुरू से अंत तक की सुनवाई एक ही ऑफिसर के अंतर्गत होने का निर्देश दिया था। आउटलुक के अनुसार, लोया ने शुरू-शुरू में में अमित शाह की ओर से व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में अनुपस्थिति की प्रार्थना पर कोई आपत्ति नहीं की। “ उत्पत के बाद नियुक्त जज लोया ने कई बार केस की तारीख पर अमित शाह की अनुपस्थिति को नजरअंदाज किया। पर यह हर बार की अनदेखी एक प्रक्रिया के तहत हुई होगी। आउटलुक की स्टोरी के अनुसार “ अपनी अंतिम नोटिंग में लोया ने साफ-साफ इंगित किया कि जब तक चार्ज फ्रेम नहीं किये जा सके, तब तक शाह को व्यक्तिगत रूप से न उपस्थित होने पर कोई आपत्ति नहीं की गई। लोया तब भी शाह के ऊपर लगे अभियोग को ख़ारिज नहीं कर रहे थे, जब वे उनकी व्यक्तिगत उपस्थिति के न होने पर भी सहृदय बने हुए थे।” 

वकील मिहिर देसाई, जो सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन की ओर से केस लड़ रहे थे, के अनुसार- लोया पूरी चार्जशीट की गहन पड़ताल के लिए उत्सुक थे, जो 10000 पेज से ज्यादा की थी, और सारे गवाह और तथ्यों की पड़ताल सावधानी से करना चाहते थे। देसाई के शब्दों में “केस निहायत ही संवेदनशील और महत्वपूर्ण था, और लोया की जज के रूप में उनकी प्रतिष्ठा को निर्धारित करने वाला था, लेकिन दबाव निश्चित रूप से बढ़ता जा रहा था।”

लोया की भतीजी, नूपुर बालाप्रसाद बियानी जो अपने परिवार के साथ मुंबई में रहकर पढ़ती हैं ने मुझे बताया कि किस हद तक इस केस का दबाव वह अपने चाचा के चेहरे पर महसूस करती थीं, “जब वे कोर्ट से वापस लौटते थे, उनकी हालत “बहुत टेंशन है”, “तनाव, ये बहुत बड़ा केस है। इससे कैसे निपटा जाए? हर कोई इस केस में जुड़ा है”। नूपुर के मुताबिक वो कहते थे कि “ ये एक राजनैतिक मूल्यों का सवाल है।”

वकील देसाई ने बताया “ कोर्टरूम हमेशा तनावग्रस्त रहता था। अमित शाह के वकील हमेशा जोर देते थे कि अमित शाह को सभी आरोपों से तत्काल बरी किया जाए, जबकि हम फोन काल की अंग्रेजी में अनुवाद पर जोर देते थे, जिसे सीबीआई ने सबूतों के तौर पर प्रस्तुत किया था”। न तो हम और न जज लोया को टेप की गुजराती भाषा समझ में आती थी।

देसाई के अनुसार, लेकिन अमित शाह के वकील, हमारे अंग्रेजी में अनुवाद की मांग को बारबार ख़ारिज करते और मांग करते कि शाह को सभी आरोपों से मुक्त करने की पेटिशन को सुना जाए। देसाई आगे बताते हैं कि उनके जूनियर वकील ने अक्सर इस बात का नोटिस किया कि कुछ अनजाने और संदेहास्पद दिखने वाले लोग अक्सर कोर्टरूम में उपस्थित रहते थे और उनका लगातार आपस में फुसफुसाते रहना और विपक्ष के वकील को घूरना चालू रहता था।

वकील देसाई याद करते हैं 31 अक्टूबर की सुनवाई को और बताते हैं कि लोया ने शाह की अनुपस्थिति के बारे में पूछा। उनके वकीलों ने इशारा किया कि लोया ने उन्हें खुद अनुपस्थित रहने की अनुमति दी हुई है। लोया की टिप्पणी थी कि यह छूट सिर्फ तभी के लिए है जब अमित शाह राज्य में उपस्थित न हों। उस दिन, उन्होंने बताया कि अमित शाह बीजेपी की महाराष्ट्र सरकार के शपथ ग्रहण के चलते मुंबई में मौजूद थे, और कोर्ट से मात्र 1.5 किलोमीटर दूरी पर थे। उन्होंने शाह के वकील को आदेश दिया कि शाह जब भी राज्य में हों, उन्हें कोर्ट में उपस्थित होना होगा, और अगली सुनवाई 15 दिसम्बर को होगी। 

अनुराधा बियानी ने बताया कि लोया ने उन्हें बताया कि मोहित शाह, जो जून 2010 से सितंबर 2010 तक बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे, ने उन्हें 100 करोड़ की घूस का प्रस्ताव दिया था ताकि फैसला मनमाफिक हो। बियानी के अनुसार, “मोहित शाह ने देर रात फोन किया कि वह उनसे सादे लिबास में मिलें और दबाव बनाया कि फैसला जल्द से जल्द दे दें और वह भी पक्ष में होना चाहिए।” बियानी के अनुसार “ मेरे भाई को 100 करोड़ की घूस प्रस्तावित की गई, पक्ष में फैसला सुनाने के बदले। यह प्रस्ताव चीफ जस्टिस मोहित शाह ने खुद दी।”

मोहित ने मेरे भाई को कहा कि “ अगर फैसला 30 दिसम्बर के पहले आ जाता है तो इस पर फोकस ज्यादा नहीं पड़ेगा, क्योंकि उसी समय एक दूसरी विस्फोटक स्टोरी पर लोगों का ध्यान होगा और वे इस फैसले पर नोटिस नहीं कर पायेंगे’।

लोया के पिता हरकिशन ने भी मुझे बताया कि उनके बेटे ने भी इस घूस के बारे में मुझे बताया था। “ हां, उसे घूस का प्रस्ताव दिया गया था। क्या तुम्हे मुंबई में घर चाहिए, कितनी जमीन तुम्हे चाहिए, कितना पैसा तुम्हे चाहिए, वह हमें बताया करता था कि यह प्रस्ताव मेरे सामने आया है”। वे आगे कहते हैं कि “ लेकिन, उनके बेटे ने इस प्रस्ताव के सामने खुद को नहीं झुकने दिया। उसने मुझसे बोला, वो या तो इस्तीफ़ा दे देगा या ट्रान्सफर ले लेगा। वो गांव चला जाएगा और खेती बाड़ी कर लेगा।”

मैंने इस सम्बन्ध में मोहित शाह और अमित शाह से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया, ताकि उनका दावा जाना जा सके। इस खबर के प्रकाशित होने तक उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। यह स्टोरी अपडेट होगी, तब कभी वो जवाब देंगे।

लोया की मृत्यु के बाद, एमबी गोसावी सोहराबुद्दीन केस के जज बने। गोसावी ने 15 दिसम्बर 2014 से केस की सुनवाई आरम्भ की। सोहराबुद्दीन के वकील मिहिर देसाई के अनुसार “ उन्होंने डिफेन्स के वकील को तीन दिन सुना और अमित शाह को सभी केस से दोषमुक्त कर दिया, लेकिन अभियोजनकर्ता सीबीआई को सिर्फ 15 मिनट सुना।” “17 दिसम्बर तक सुनवाई चली और उन्होंने फैसला रिज़र्व रख लिया”। 

लोया की मौत के करीब एक महीने बाद, 30 दिसम्बर को जज गोसावी ने पक्ष के वकील के तर्क को सही ठहराया और सीबीआई के पक्ष को राजनीति से प्रेरित अमित शाह को फंसाने का दुश्चक्र घोषित कर दिया। इस प्रकार, गोसावी ने अमित शाह को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

उसी दिन देश भर के न्यूज़ चैनल में महेंद्र सिंह धोनी के टेस्ट क्रिकेट से सन्यास की खबर देश भर में छाई रही। बियानी याद करती हैं, “ चैनल में नीचे पट्टी में उस दिन सिर्फ चलती फिरती खबर चली, ‘अमित शाह दोषी नहीं पाए गए, अमित शाह दोषी नहीं पाए गए”।

मोहित शाह ढाई महीने बाद पीड़ित परिवार से मिलने और शोक संवेदना व्यक्त करने पहुंचे। लोया परिवार से मैंने मुख्य न्यायाधीश को लिखे एक पत्र की कॉपी प्राप्त की जो 18 फ़रवरी 2015 को लिखी गई थी, जब लोया की मौत को 80 दिन हो चुके थे। लोया के बेटे अनुज ने वह चिट्ठी लिखी थी जिसमें मोहित शाह को सम्बोधित किया गया था, “ मैंने उनसे अपने पापा की मौत पर एक जांच कमीशन बैठाने के लिए कहा था। मुझे डर था कि उनके खिलाफ कोई भी कदम अगर हम उठाते तो वे हमारे परिवार के किसी भी सदस्य के खिलाफ कुछ कर सकते थे। हमारी जिंदगी को खतरा था”।

अनुज ने अपने पत्र में दो जगह लिखा है “ अगर मुझे या मेरे परिवार को कुछ भी होता है, तो इसके दोषी मुख्य न्यायाधीश मोहित शाह और अन्य होंगे जो इस षड्यंत्र में शामिल थे।”

जब मैं उनसे नवम्बर 22016 में मिला, तो लोया के पिता हरकिशन ने मुझे बताया कि “ मैं अब 85 साल का हूं और अब मौत से नहीं डरता। मुझे न्याय भी चाहिए, पर मैं अपनी बेटियों और नाती पोतों की जिन्दगी के लिए हमेशा चिंतित रहता हूं।” जब वे यह बोल रहे थे, उनकी आँखों में आंसू थे, और उनकी नजरें अक्सर उनके पैतृक निवास की दीवार पर टंगे लोया के फूल माला से ढंकी तस्वीर पर चली जा रही थीं।

दि कारवां में छपे निरंजन टाकले के लेख का हिंदी में अनुवाद।

                                   साभार

अनुवाद: व्योमकेश बक्शी

 






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