EXCLUSIVE :रविभवन के रजिस्टर से तब के एटॉमिक एनर्जी कमीशन के चेयरमैन का नाम हटाए जाने के पीछे आखिर क्या है रहस्य?

EXCLUSIVE , नागपुर/नई दिल्ली, मंगलवार , 20-11-2018


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महेंद्र मिश्र

नागपुर/नई दिल्ली। सीबीआई स्पेशल जज बीएच लोया की मौत के चार महीने बाद रवि भवन उस समय एक बार फिर बड़ी गतिविधियों का केंद्र बना जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह एवं सुप्रीम कोर्ट और बांबे हाईकोर्ट के जजों समेत कानून से जुड़ी कई शख्सियतों का वहां जमावड़ा हुआ। उसी समय एक और महत्वपूर्ण हस्ती का नागपुर में आना हुआ। हालांकि उसका नाम और गतिविधियां जिले के प्रोटोकाल रजिस्टर (जिलाधिकारी के पास हुआ करता है) में दर्ज हैं। और प्रोटोकॉल रजिस्टर में उसके नाम से रविभवन का एक रूम भी आवंटित है। लेकिन रविभवन के रजिस्टर से वो नाम गायब है।

ये घटना है 13 मार्च 2015 की। और वो शख्स कोई और नहीं बल्कि तब के एटॉमिक एनर्जी कमीशन के चेयरमैन और एटॉमिक एनर्जी विभाग के सचिव रतन कुमार सिन्हा यानी आर के सिन्हा थे। प्रोटोकॉल रजिस्टर के आगमन कॉलम में दिखाया गया है कि सिन्हा 13 मार्च 2015 को सुबह 7.10 बजे एयर इंडिया के (एआई-627) विमान से नागपुर पहुंचे। उसके बाद रजिस्टर के प्रस्थान कॉलम में दिखाया गया है कि 13 मार्च 2015 को ही सुबह 7.45 बजे वो कार से यवतमाल चले गए। उसके बाद आगमन के कॉलम में उसी दिन ही शाम को 5.00 बजे यवतमाल से उनकी वापसी दिखायी गयी है। और उसके बाद प्रस्थान कॉलम में 13 मार्च को ही रात में 8.45 बजे उनका एयर इंडिया के विमान एआई 630 से नागपुर से मुंबई के लिए प्रस्थान दिखाया गया है। प्रोटोकाल रजिस्टर में रविभवन में उनके लिए आवंटित कमरे का नंबर पहले 3 लिखा गया है और फिर उसे काटकर 4 कर दिया गया है। दोनों संख्या स्पष्ट रूप से रजिस्टर में देखी जा सकती हैं।

प्रोटोकाल रजिस्टर जिसमें आरके सिन्हा का नाम दर्ज है।

नागपुर के प्रोटोकॉल अफसर और नायब तहसीलदार के यहां से हासिल लॉगबुक यानी वो रजिस्टर जिसमें सरकारी गाड़ियों के आने-जाने का ब्योरा दर्ज होता है, में भी गाड़ी नंबर एमएच 31 सीवी 10 के लॉगबुक में 13 मार्च 2015 को आरके सिन्हा की यात्रा दिखायी गयी है। जिसमें गाड़ी के मीटर के सामने 211695 संख्या दर्ज है यानी गाड़ी 211695 किमी से शुरू होकर 212205 किमी पर खत्म हुई। अर्थात सिन्हा ने उस गाड़ी से कुल 510 किमी की यात्रा की। इस दौरान सिन्हा यवतमाल के अलावा रविभवन भी गए। 

लागबुक जिसमें आरके सिन्हा रविभवन कई बार आते जाते हैं।

लेकिन सिन्हा का नाम रविभवन के रजिस्टर में कहीं नहीं दर्ज है। उस रजिस्टर में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जो 12 मार्च 2015 को ही आ गए थे और 15 मार्च 2015 को वहां से प्रस्थान किए, के नाम के सामने कॉटेज 3 और 7 दर्ज है। और 13 मार्च की डेटलाइन में प्रोटोकॉल रजिस्टर में सिन्हा के नाम से दर्ज 4 नंबर के काटेज का रविभवन के रजिस्टर में कहीं कोई जिक्र ही नहीं है। रविभवन के रजिस्टर में सिन्हा का नाम लिखा ही नहीं गया है। 13 मार्च को कॉटेज नंबर 8 एडिशनल सालीसीटर जनरल अनिल सिंह के नाम से आवंटित था।

हालांकि रजिस्टर में उनको जस्टिस और राज्य अतिथि बताया गया है। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस यूयू ललित भी उसी दिन रविभवन में रुके थे उन्हें काटेज नंबर-2 आवंटित था। हालांकि उनके सामने की क्रम संख्या को हाथ से एक और बढ़ाकर 926 ए कर दिया गया है। जस्टिस एनडब्ल्यू सांवरे भी 13 मार्च 2015 को ही रविभवन में रुके थे उनको काटेज नंबर-9 आवंटित था।

रविभवन का रजिस्टर जिसमें बाकी सब हैं आरके सिन्हा गायब हैं।

लेकिन रविभवन के रजिस्टर में कहीं भी एटॉमिक एनर्जी कमीशन के चेयरमैन आरके सिन्हा का नाम दर्ज नहीं है। ये सारी चीजें बताती हैं कि रजिस्टर में बड़े स्तर पर हेरफेर की गयी है। और उसमें सुप्रीम कोर्ट के जजों तक को नहीं बख्शा गया है। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस बोबडे के आगमन की तारीख 15 मार्च 2015 रविभवन के रजिस्टर में क्रम संख्या 932 पर दर्ज है। उसके नीचे भारत सरकार के सामाजिक न्याय मंत्रालय के ज्वाइंट सेक्रेटरी एके अवस्थी के नाम से रूम आवंटित है जिनके आगमन की भी तारीख 15 मार्च लिखी गयी है।

और उनकी क्रम संख्या 933 है। लेकिन इन दोनों से पहले 931 क्रम संख्या पर माननीय आयुक्त के आगमन की तारीख 16 मार्च बतायी गयी है। अब 15 से पहले 16 को कैसे कोई आ सकता है ये एक बड़ा यक्ष प्रश्न है। लेकिन रविभवन के रजिस्टर ने तो इसको संभव कर दिखाया है। ये बातें दिखाती हैं कि बड़े स्तर पर रजिस्टर में हेर-फेर की गयी है जिसकी वजह से बहुत सारी चीजें उलट-पलट गयी हैं।

जस्टिस बोबडे के नाम से छेड़छाड़।

प्रोटोकॉल रजिस्टर में भी इसी तरह का हेर-फेर किया गया है। उसमें सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस एसए बोबडे के दिल्ली से नागपुर का आगमन 13 मार्च की रात 9.15 बजे दिखाया गया है जबकि आरके सिन्हा जो उसी दिन सुबह 7.10 बजे नागपुर पहुंच गए थे, का नाम प्रोटोकॉल रजिस्टर में उसके बाद लिखा गया है। प्रोटोकाल रजिस्टर में कुटीर के कालम में बोबडे को स्वघरी यानी अपने घर पर ठहरना बताया गया है। लेकिन 15 मार्च को रविभवन के रजिस्टर में एक कमरा उनके नाम से आवंटित कर दिया गया है। और उससे भी ज्यादा विडंबनापूर्ण ये है कि 15 मार्च की ही सुबह प्रोटोकॉल रजिस्टर में इंडिगो विमान से उनका नागपुर से दिल्ली के लिए प्रस्थान दिखा दिया गया है।

प्रोटोकॉल रजिस्टर में लोगों के न तो आने के क्रम में नाम दर्ज हैं और न ही उनके सामने दर्ज ब्योरे का रविभवन के रजिस्टर से कोई तालमेल बैठता है। और इसमें भी आरके सिन्हा के नाम और उनसे संबंधित दर्ज ब्योरे में छेड़छाड़ को बिल्कुल साफ तरीके से देखा जा सकता है। जिसमें कुटीर का 3 बदलकर 4 किया जाना और सफेद इंक रिमूवर से साफ करके रीराइटिंग को बिल्कुल स्पष्ट तरीके से देखा जा सकता है। 

प्रोटोकॉल रजिस्टर में सिन्हा को कमरा आवंटित होने के बावजूद रविभवन के रजिस्टर में रूम आवंटित होने की बात तो दूर वहां उनका कोई नामो-निशान तक नहीं है। जबकि गाड़ी के लॉगबुक में सिन्हा के आवागमन कॉलम में रविभवन का कई बार जिक्र है। इसमें आफिस से रविभवन, रविभवन से विमानतल, विमानतल से रविभवन, रविभवन से वर्धा यवतमाल, यवतमाल से आर्वी और फिर यवतमाल लोकल से नागपुर रविभवन दर्ज है। यानी उस दौरान रविभवन उनकी गतिविधियों का केंद्र रहा। और बार-बार वो यहां आते जाते रहे। बावजूद इसके रविभवन के रजिस्टर में उनका नाम नहीं दर्ज है।

सामान्य तौर पर किसी भी गेस्ट हाउस में अतिथियों का आना-जाना लगा रहता है। और इस बात की भी पूरी संभावना रहती है कि किसी खास मौके पर या फिर स्थिति में एक साथ संयोग से बहुत सारे महत्वपूर्ण लोग आ जायें और कोई जरूरी नहीं है कि वो एक दूसरे से मिलने ही आएं हों या फिर उनके आने के पीछे कोई साझा उद्देश्य हो। उस पर सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता है। लेकिन संदेह तब पैदा हो जाता है जब मामले को छुपाया जाने लगे। अगर कोई साझा उद्देश्य नहीं था और उस दौरान रविभवन में रुके हुए बाकी लोगों से कुछ लेना-देना नहीं था तब फिर आखिर क्या वजह थी कि सिन्हा का नाम रजिस्टर से गायब कर दिया गया। और ये कौन लोग थे जिन्होंने इस काम को अंजाम दिया। और वो किसके इशारे पर हुआ। ये एक बड़ा सवाल बन जाता है।

क्योंकि सिन्हा कोई सामान्य शख्स नहीं थे। वो एटामिक एनर्जी कमीशन के उस समय चेयरमैन थे। न्यूक्लियर एनर्जी मतलब देश का सबसे संवेदनशील क्षेत्र। और अगर नागपुर की उनकी यात्रा को छुपाया जा रहा है और उसके पीछे कोई अज्ञात उद्देश्य है तो देश को उसकी जानकारी हासिल करने का हक बन जाता है।   

नागपुर के एडवोकेट और सामाजिक कार्यकर्ता सतीश यूके ने इस सिलसिले में बांबे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच में एक याचिका दायर की है। जिसमें उन्होंने इन्हीं सब जानकारियों के होने के चलते खुद के जान के खतरे की आशंका जताई है साथ ही इनसे जुड़े सभी कागजातों/दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए कोर्ट से निर्देश जारी करने की अपील की है।

सतीश यूके की याचिका।

सतीश ने अपनी इस याचिका में इसके दो तरह से इस्तेमाल होने का आरोप लगाया है। एक रेडियोएक्टिव आइसोटोप (एक जहर, जिसकी आसानी से पहचान नहीं की जा सकती है) के तौर पर। जिसके बारे में उनको इस बात की गहरी आशंका है कि लोया की हत्या उसी पदार्थ का इस्तेमाल करके की गयी थी। सतीश का कहना है कि उन्हें इस बात को संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए गए श्रीकांत खांडेलकर और रिटायर्ड जज थोंब्रे ने बताया था। इसके अलावा सतीश ने एक दूसरी आशंका भी जाहिर की है। जिसमें उन्होंने इस पूरी टेक्नालाजी को बीजेपी के एक चहेते उद्योगपति को सौंपे जाने की तरफ भी इशारा किया है। 

याचिका में सतीश ने कहा है कि “उच्च प्रभावशाली राजनीतिक शख्सियतों के निर्देश पर काम करने वाले श्री सूरज गजानन लोलगे ने याचिकाकर्ता से इन सभी मामलों को हल करने के लिए कहा था। ऐसा न होने पर उसने धमकी दी थी कि देवेंद्र फडनवीस के पुलिस अफसर याचिकाकर्ता को गिरफ्तार कर लेंगे। लोलगे ने जज लोया, एडवोकेट श्रीकांत खांडेलकर और एडवोकेट श्री थोंब्रे की मौत के साथ ही दूसरे गंभीर मामलों के दस्तावेजों को उसके हवाले करने के एवज में 200 करोड़ रुपये देने का प्रस्ताव दिया था। इसमें खांडेलकर और थोंब्रे द्वारा याचिकाकर्ता को मुहैया कराए गए जज लोया की मौत का कारण बनने वाले रेडियो एक्टिव आइसोटेप और भारत सरकार के नाभिकीय रिसर्च से संबंधित आर एंड डी को बिजनेस के उद्देश्य से भारत के बड़े कारपोरेट हाउस को मुहैया कराए जाने वाले दस्तावेज भी शामिल थे।”

याचिका में सतीश यूके ने कहा है कि “जीवित रहने के दौरान एडवोकेट श्री खांडेलकर और एडवोकेट श्री थोंब्रे ने नागपुर के रविभवन में 12.03.2015 से 15.03.2015 के बीच बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में एटामिक एनर्जी कमीशन के चेयरमैन और एटामिक एनर्जी विभाग के सचिव माननीय रतन कुमार सिन्हा द्वारा भारत सरकार के नाभिकीय रिसर्च और आर एंड डी के गोपनीय दस्तावेज प्रसिद्ध कारपोरेट समूह के अधिकारियों को मुहैया करने की बात याचिकाकर्ता को बतायी थी। श्री खांडेलकर और श्री थोंब्रे ने उन नामों को भी बताया था जिन्होंने उस बैठक के सरकारी दस्तावेजों को नष्ट करने की जिम्मेदारी संभाली थी।”

याचिकाकर्ता ने जिस प्रसिद्ध कारपोरेट घराने की तरफ इशारा किया है वो अनिल अंबानी हैं। इकोनामिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक नवंबर 2017 में अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर ने भारत सरकार के सार्वजनिक उपक्रम न्यूक्लियर पावर कारपोरेशन आफ इंडिया के एक टेंडर में भाग लिया था और उसमें शामिल कंपनियों में सबसे ज्यादा बोली लगाने के चलते वो टेंडर उसे हासिल भी हो गया था। कुडाकुलम प्लांट के लिए निकाले गए इस टेंडर की लागत 1000 करोड़ रुपये थी। वैसे अभी तक न्यूक्लियर का क्षेत्र बेहद संवेदनशील क्षेत्र माना जाता रहा है और किसी निजी कंपनी का इसमें कोई बड़ा हस्तक्षेप नहीं है। ये क्षेत्र पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में रहा है।

इस बीच एक नया घटनाक्रम सामने आया जिसके तहत सूरज गजानन लोलगे और योगेश नागपुरे ने लोया मामले में दायर अपनी याचिका को वापस ले लिया। लेकिन सतीश यूके का आरोप है कि इसके पीछे एक सौदा हुआ है जिसके तहत योगेश नागपुरे के भाई नीलेश नागपुरे को मुकेश अंबानी की रिलायंस कंपनी में बड़ा ओहदा दिया गया है। एक आडियो टेप में नीलेश नागपुरे अपने पद की तारीफ करते हुए सुना जा सकता है। जिसमें उसका कहना है कि कंपनी में उसका जनरल मैनेजर का पद होने के साथ ही उसे 25-26 लाख रुपये सालाना वेतन मिलेगा। और महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक की उसे जिम्मेदारी मिली है।

प्रवीन पोटे और नीलेश नागपुरे।

एक दिलचस्प बात ये है कि नीलेश नागपुरे का महाराष्ट्र के पीडब्ल्यूडी राज्य मंत्री प्रवीन पोटे से भी गहरा रिश्ता है। गौरतलब है कि रविभवन भी पीडब्ल्यूडी के तहत ही आता है। अनिल अंबानी की सिस्टर कंपनी में नीलेश नागपुरे को नौकरी मिलना एक बड़े गठजोड़ की तरफ इशारा करता है। जिसमें नेता, कारपोरेट और नौकरशाही सब शामिल हैं।










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