“कुछ लोगों को महसूस हुआ कि मैं सिर्फ एक कलम हूं जिसे भाड़े पर लिया जा सकता है”

विशेष , , रविवार , 19-05-2019


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अरुंधति रॉय

मैं वास्तव में PEN अमेरिका द्वारा इस वर्ष के “आर्थर मिलर फ्रीडम टू राइट” लेक्चर देने के लिए आमंत्रित किये जाने पर गौरवान्वित महसूस कर रही हूँ। साहित्य के बारे में बात करने के लिए हम एक जगह इकट्ठा हुए हैं इससे बेहतर समय क्या हो सकता है, इस क्षण जब हम सोचते हैं कि हम इस युग को समझते हैं - चाहे अस्पष्ट ही सही, अगर सब ठीक नहीं है - अपनी समाप्ति की ओर है। जैसे-जैसे बर्फ की चोटियां पिघल रही हैं, जैसे-जैसे महासागर गर्म होते जा रहे हैं, और धरती के अंदर पानी का स्तर घट रहा है, जैसे-जैसे हम अन्योन्याश्रय के नाजुक जाल से गुजरते हैं, जो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखती है,

क्योंकि हमारी दुर्जेय बुद्धि हमें मनुष्यों और मशीनों के बीच की सीमाओं को तोड़ने की ओर ले जाती है, वहीं दूसरी ओर और हमारे से कहीं अधिक दुर्जेय गर्व से भरी एक प्रजाति हमारे ग्रह के अस्तित्व को हमारे अस्तित्व से जोड़ने की हमारी क्षमता को कमज़ोर करता रहता है, ऐसे में हम कला क्षेत्र को एल्गोरिदम के साथ बदल देते हैं और एक ऐसे भविष्य में घूरते हैं जिसमें अधिकांश मनुष्यों को आर्थिक गतिविधि में भाग लेने (या पारिश्रमिक के लिए) की जरुरत ही महसूस नहीं होती। - ऐसे समय में हमारे पास व्हाइट हाउस में गोरी चमड़ी वाले वर्चस्ववादियों के स्थिर हाथ हैं, चीन में नए साम्राज्यवादी, नव-नाज़ियों का एक बार फिर यूरोप की सड़कों पर जुटान और भारत में हिंदू राष्ट्रवादियों और दूसरे कई देशों में बधिक-राजकुमारों और तानाशाहों द्वारा हमें अनिश्चित भविष्य की ओर धकेला जा रहा है।

जहां हममें से अधिकांश इस सपने को जी रहे हैं कि "एक और दुनिया संभव है", ये दूसरे लोग भी यही सपना देख रहे हैं। और उनके सपनों में- हमारा दुःस्वप्न छिपा है- जो कि खतरनाक स्तर पर पूर्ण होने के करीब है। पूंजीवाद प्रदत्त युद्धों की मेहरबानी और लालच को सर्व स्वीकृति ने इस गृह को संकट में डाल दिया है और दुनिया को शरणार्थियों से भर दिया है। ऐसी दुनिया बनाने में सबसे बड़ी दोषी संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार है। अफगानिस्तान पर हमले के सत्रह साल बाद, जिसे तालिबान से निपटने के एकमात्र उद्देश्य के नाम पर बमबारी द्वारा अफगानिस्तान को 'स्टोन ऐज' में पहुंचा देने के बाद, आज अमेरिकी सरकार उसी तालिबान के साथ बातचीत की मेज पर वापस आ गई है। इस बीच के अंतराल में इसने इराक, लीबिया और सीरिया को नष्ट कर दिया है। युद्ध और प्रतिबंधों में लाखों लाख लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, विश्व एक पूरा भूभाग भयानक भूचाल से गुजर रहा है, प्राचीन शहर-धूल धूसरित हो चुके हैं। इस वीरानी और मलबे के बीच, दाएश (आइसिस) नामक एक राक्षस को जन्म दिया गया है।

यह दुनिया भर में फैल गया है, अंधाधुंध निर्दोष नागरिकों की हत्या कर रहा है, जिनका अमेरिकी युद्ध से कोई लेना-देना नहीं था। इन पिछले कुछ वर्षों में, इसके द्वारा छेड़े गए युद्धों को देखते हुए, अंतर्राष्ट्रीय संधियों को मनमाने ढंग से धता बताने की धूर्तता को देखते हुए, अमेरिकी सरकार पूरी तरह से एक दुष्ट राज्य की परिभाषा में फिट बैठती है। और अब वही पुरानी भयभीत करने वाली रणनीति, वही थके हुए झूठ और परमाणु हथियारों के बारे में वही पुरानी फर्जी खबरों का सहारा लेकर ईरान पर बम बरसाने को तैयार है। यह अब तक की उसकी सबसे बड़ी भूल साबित होने वाली होगी। इसलिए, जब हम भविष्य में लड़खड़ा कर बढ़ रहे हैं, मूर्खता के इस विजयोल्लास में, फेसबुक "लाइक्स," फासीवादी मार्च पास्ट, फेक न्यूज़ तख्ता पलट, और ऐसा लगता है जैसे हम विलुप्त होने की एक दौड़ में शामिल हैं - ऐसे में साहित्य का स्थान क्या है?

साहित्य के रूप में क्या मायने रखता है? कौन तय करता है? जाहिर है, इन सवालों का कोई एक, संपादित उत्तर नहीं है मेरे पास। इसलिए, अगर आप मुझे माफ़ करेंगे, तो मैं इन दिनों के दौरान लेखक होने के अपने अनुभव के बारे में बात करने जा रही हूँ — इस सवाल से जूझना कि इस समय के दौरान लेखक के रूप में कैसे बने रहा जाय , विशेष रूप से भारत जैसे देश में, एक ऐसा देश जो कई शताब्दियों को एक साथ जी रहा है। कुछ साल पहले, मैं एक रेलवे स्टेशन पर थी, अख़बार पढ़ते हुए जब मैं अपनी ट्रेन का इंतजार कर रही थी, अंदर के एक पृष्ठ पर, मैंने दो लोगों के बारे में एक छोटी सी खबर रिपोर्ट देखी, जिसमें दो लोगों की गिरफ्तारी की रिपोर्ट थी जिन्हें प्रतिबंधित और भूमिगत कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के लिए कूरियर होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। जब्त किये गए 'सामान' में, रिपोर्ट में कहा गया है, "अरुंधति रॉय द्वारा लिखी कुछ किताबें पकड़ी गई।" इस घटना के कुछ अंतराल बाद , मैं एक कॉलेज की महिला प्रोफेसर से मिली, जिन्होंने अपना अधिकांश समय जेल में बंद कार्यकर्ताओं के लिए कानूनी मदद के इंतजाम में लगा दिया था, जेलों में बंद अधिकतर युवा छात्र और ग्रामीण "देश विरोधी गतिविधियों" के अपराध में पकडे गए थे।

देश विरोधी गतिविधि का मतलब है कॉर्पोरेट द्वारा माइनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चरल प्रोजेक्ट्स का विरोध, जिसके चलते दसियों हजार लोगों को उनकी जमीन और घरों से विस्थापन था। उसने मुझे बताया कि कई कैदियों के "कबूलनामे" में - जिसे आमतौर पर दबाव के तहत स्वीकार किया जाता है - मेरे लेखन में अक्सर इस संदर्भ को एक कारक के रूप में ले जाता है और उन्हें विरोध में खड़ा करता है, जिसे पुलिस "गलत रास्ता" कहती है।

उन्होंने बताया, "वे लोग आपके खिलाफ केस तैयार कर रहे हैं"। जिन किताबों पर आपत्ति थी वे मेरे उपन्यास नहीं थे (उस समय तक मैंने केवल एक ही किताब लिखी थी - द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स)। ये नॉनफिक्शन पुस्तकें थीं - हालांकि एक मायने में वे कहानियां भी थीं, तरह-तरह की कहानियाँ थीं, लेकिन कहानियाँ थीं। कहानियां थीं जंगलों, नदियों, फसलों, बीजों, भूमि पर, किसानों, श्रम कानूनों, नीति निर्माण पर बड़े पैमाने पर कॉर्पोरेट हमले के बारे में।  और हां, 9/11 की घटना के बाद अमेरिका और नाटो द्वारा एक देश के बाद दूसरे देश पर हमले की कहानियाँ थीं। ज्यादातर कहानियाँ ऐसे लोगों के बारे में थीं जो इन हमलों के खिलाफ लड़े थे - विशिष्ट कहानियां, विशिष्ट नदियों, विशिष्ट पहाड़ों, विशिष्ट कॉर्पोरेशंस और विशिष्ट लोगों के आंदोलनों के बारे में, इन सभी को विशेष रूप से विशिष्ट तरीकों से कुचला गया था। ये लोग वास्तविक अर्थों में जलवायु संकट से लड़ने वाले योद्धा थे, एक वैश्विक संदेश वाले स्थानीय लोग, जिन्होंने जलवायु संकट को विश्व द्वारा एक मान्यता के रूप में समझे जाने से पहले ही समझ लिया था।

लेकिन फिर भी, उन्हें लगातार खलनायक के रूप में चित्रित किया गया - प्रगति और विकास के लिए राष्ट्र-द्रोही बाधाएं कहकर। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री, फ्री-मार्केट के प्रचारक ने इन स्थानीय निवासियों को गुरिल्ला के ख़िताब से नवाज़ा, उन आदिवासियों को जो मध्य भारत के जंगलों में कॉर्पोरेट खनन परियोजनाओं के खिलाफ लड़ रहे हैं, को "देश की आतंरिक सुरक्षा के सबसे बड़ी चुनौती" बताई। उन पर "ऑपरेशन ग्रीन हंट" नामक युद्ध घोषित किया गया था। जंगलों में सैनिकों की भरमार थी जिनके दुश्मन दुनिया के सबसे गरीब लोग थे। अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, लैटिन अमेरिका भी इसका अपवाद नहीं हैं। और अब, विडंबनाओं की विडंबना देखिये, इस पर एक आम सहमति बन रही है कि जलवायु परिवर्तन दुनिया की एकमात्र सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती है। ग्लोबल वार्मिंग के इर्द-गिर्द की शब्दावली का सैन्यीकरण किया जा रहा है। और कोई संदेह नहीं है कि बहुत जल्द इसके शिकार ही इस नए युद्ध में अंतहीन 'दुश्मन' बन जाएंगे। जलवायु को लेकर यह 'आपात स्थिति' एक तरह से शुभ संकेत हैं, उस प्रक्रिया को तेज कर सकता है जो पहले ही शुरू हो चुकी है।

अभी से दबाव पड़ना शुरू हो गया है कि इस मुद्दे को UNFCC (संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज) से हटाकर यूनाइटेड नेशंस सिक्यूरिटी कॉउन्सिल को सुपुर्द कर दिया जाए, दूसरे शब्दों में, दुनिया के अधिकांश हिस्से को इस निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर कर उन्हीं पुराने पापियों के अड्डे पर पहुंचा दिया जाय जो वास्तव में इस आपदा के लिए जिम्मेदार हैं। एक बार फिर, इस समस्या के निर्माता पश्चिमी देशों के हाथों में इस आपदा से निपटने की बागडोर सौंपी जा रही है, जिससे कि इस वैश्विक संकट के समाधान में भी वे अपना आर्थिक लाभ ढूंढ सकें। एक ऐसा समाधान जिसकी प्रतिभा में कोई संदेह नहीं है, जिसके दिल की गहराई में सिर्फ नया 'मार्केट' से स्थित है, जिसमें ज्यादा से ज्यादा बेचना और खरीदना, और अधिक उपभोग और कम से कम लोगों को इससे अधिक से अधिक लाभ अर्जित हो सके। दूसरे शब्दों में कहें , और अधिक पूंजीवाद का विस्तार। जब शुरू-शुरू में मेरे लेख छपे (पहले मास-सर्कुलेशन पत्रिकाओं में, फिर इंटरनेट पर और अंत में पुस्तकों के रूप में), तो कुछ हलकों में उसे भयावह संदेह के साथ देखा गया, अक्सर उन लोगों द्वारा जो जरुरी नहीं कि राजनीति से असहमत हों। लेखन पारंपरिक रूप से साहित्य के रूप में माना जाता है।

दुश्मनी का भाव एक समझ में आने वाली प्रतिक्रिया थी, क्योंकि एक वर्गीकृत दृष्टि के चलते वे तय नहीं कर पा रहे थे कि यह क्या था- पैम्फलेट या पोलिमिक, अकादमिक या पत्रकारीय लेखन, यात्रा-वृतांत, या मात्र साहित्यिक जोखिम? कुछ के लिए, इसे लिखने में गिनने लायक ही नहीं लगा: "ओह, आपने लिखना क्यों बंद कर दिया है?" हम आपकी अगली पुस्तक की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ” कुछ दूसरों को महसूस हुआ कि मैं सिर्फ एक कलम हूं जिसे भाड़े पर लिया जा सकता है। सभी तरह की पेशकशें मेरे रास्ते में आईं: "डार्लिंग मुझे वह टुकड़ा बहुत पसंद आया, जो आपने बांधों पर लिखा था, क्या आप बाल शोषण पर मेरे लिए लिख देंगी?" (ऐसा वास्तव में मेरे साथ हुआ) मुझे सख्ती से लेक्चर पिलाये गए, (अधिकतर सवर्ण पुरुषों द्वारा) कि कैसे लिखना चाहिए, किन विषयों पर मुझे लिखना चाहिए, और किस लहजे में लिखना चाहिए तक। लेकिन वहीं दूसरी और अन्य स्थानों में, चलिए हम इसे राजमार्ग से सुदूर कह सकते हैं, यही निबंध बड़ी तेजी से विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद किये गए, पर्चों के रूप में छापे जाने लगे, उन जंगलों, नदी की घाटियों में मुफ्त में बाँटे जाने लगे जो इस आक्रमण के शिकार थे, विश्वविद्यालय के परिसरों में जहाँ छात्र झूठ से पक चुके थे। क्योंकि ये पाठक, जो पहले से ही फैली आग से झुलसे हुए थे और लड़ाई की अग्रिम पंक्ति में पहले से खड़े थे, उनके मष्तिष्क में साहित्य के बारे में बिल्कुल अलहदा विचार थे कि साहित्य क्या और किसलिए होना चाहिए। मैंने इसका उल्लेख इसलिए किया क्योंकि इसने मुझे सिखाया कि साहित्य का निर्माण लेखकों और पाठकों द्वारा निर्मित होता है।

कुछ मायनों में यह एक नाजुक जगह है, लेकिन इसे नष्ट नहीं किया जा सकता है। जब यह रिश्ता टूट जाता है तो हम इसका पुनर्निर्माण करते हैं। क्योंकि हमें आश्रय की आवश्यकता है। मुझे साहित्य के विचार बहुत पसंद हैं जिनकी जरूरत है। साहित्य जो आश्रय प्रदान करता है। सभी प्रकार का आश्रय। कुछ समय के बाद, मेरे बारे में एक अलिखित समझौता सा हो गया था। मुझे "लेखक-कार्यकर्ता" कहा जाने लगा। इस वर्गीकरण में यह अन्तर्निहित था कि फिक्शन राजनीतिक नहीं था और निबंध साहित्यिक नहीं थे। मुझे याद है कि हैदराबाद के एक कॉलेज में पांच या छह सौ छात्रों की दर्शक दीर्घा के सामने एक लेक्चर हॉल में बैठना। इस आयोजन की अध्यक्षता करने वाले मेरे बाईं ओर विश्वविद्यालय के कुलपति थे। मेरी दाईं तरफ, साहित्य के एक प्रोफेसर। कुलपति मेरे कान में फुसफुसाये, '' आपको फिक्शन साहित्य पर अधिक समय नहीं देना चाहिए। राजनीतिक लेखन पर ध्यान केंद्रित करना महत्वपूर्ण है। ”साहित्य के प्रोफेसर ने फुसफुसाते हुए कहा,“ आप फ़िक्शन लिखना दोबारा कब शुरू कर रही हैं? वही आपकी सच्ची जगह है।

बाकी जो भी आप लिख रही हों, यह सब टाइम पास है.” मैंने कभी महसूस नहीं किया कि मेरे फिक्शन और नॉन फिक्शन लेखन के बीच कोई युद्ध है द्वंद्व है जो एक दूसरे से अपनी श्रेष्ठता साबित करने जंग लड़ रहे हों। वे निश्चित रूप से समान नहीं हैं, लेकिन उनके बीच के अंतर को कम करने की कोशिश करना वास्तव में जितना मैंने कल्पना की उतना सरल नहीं है। तथ्य और फिक्शन को सिर्फ कह कर नहीं साबित किया जा सकता। जरूरी नहीं कि एक चीज दूसरे से ज्यादा सच्ची हो, दूसरे से ज्यादा तथ्यात्मक हो या दूसरे से ज्यादा वास्तविक हो। या यहां तक कि, मेरे मामले में, दूसरे की तुलना में अधिक व्यापक रूप से पढ़ा जाता हो। मैं केवल इतना कह सकती हूं कि जब मैं लिख रही होती हूं तो मुझे अपने शरीर में अंतर महसूस होता है।

दो प्रोफेसरों के बीच बैठकर, मैंने उनकी विरोधाभासी सलाह का आनंद लिया। मैं वहां मुस्कुराती हुई बैठी रही और सोच रही थी जॉन बेगर से मिले पहले संदेश के बारे में, यह एक सुंदर हस्तलिखित पत्र था, एक लेखक के लिए जो वर्षों से मेरे आदर्श थे: "तुम्हारे फिक्शन और नॉन फिक्शन- वे तुम्हारी दो टांगों की तरह हैं जो तुम्हें दुनिया भर में ले जाते हैं।" जो भी मामला मेरे खिलाफ बनाया जा रहा था, वह नहीं बना - या कम से कम अभी तक नहीं आया है - घटित होने के लिए। मैं अभी भी यहीं मौजूद हूँ, अपने दो लेखकीय पैरों पर खड़े होकर, आपसे बात कर रही हूँ।

लेकिन मेरे लेक्चरर दोस्त जेल में हैं, उन पर देश विरोधी गतिविधि में भाग लेने का आरोप है। भारत की जेलें राजनीतिक कैदियों से भरी पड़ी हैं - इनमें से ज्यादातर के ऊपर माओवादी या इस्लामिक आतंकवादी होने का आरोप है। इन कानूनों को इतने व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है कि इसमें लगभग किसी को भी शामिल किया जा सकता है भी जो सरकारी नीति से असहमत हों। चुनाव पूर्व गिरफ्तारियों के नवीनतम श्रृंखला में, शिक्षकों, वकीलों, कार्यकर्ताओं और लेखकों को जेल में ठूंस दिया गया है, इन पर प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया गया है। यह प्लॉट इतना भयावह है कि छह साल का बच्चा भी इससे बेहतर लिख सकता है। फासीवादियों को कुछ अच्छे फिक्शन-लेखन पाठ्यक्रम का कोर्स करने की जरूरत है।

(अरुंधति रॉय का ये लेख “दि गार्जियन” से लिया गया है। इसका हिंदी में अनुवाद स्वतंत्र टिप्पणीकार रविंद्र सिंह पटवाल ने किया है।)

                                                                                              रविंद्र सिंह पटवाल।

                                                                                                                                  जारी...

 








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