नॉर्थ-ईस्ट डायरी: कीड़े-मकोड़े की तरह क्यों मरते हैं चाय बागानों में मजदूर ?

नॉर्थ-ईस्ट डायरी , , बुधवार , 13-03-2019


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दिनकर कुमार

असम के चाय बागानों में जहरीली शराब पीकर डेढ़ सौ से ज्यादा मजदूरों की मौत हो चुकी है।आज़ादी के बाद भी बंधुआ मजदूरों से भी बदतर जीवन गुजार रहे चाय मजदूर कभी हैजे से मरते हैं तो कभी चाय बागान मालिकों की गोलियों से,कभी बोनस की मांग में प्रदर्शन करते वक़्त पुलिस की गोलियों से मारे जाते हैं। 

असम के गोलाघाट और जोरहाट जिले में 150 से अधिक चाय मजदूरों की मौत असल में मानव निर्मित त्रासदी है। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में जहरीली शराब से हुई 100 से अधिक लोगों की मौत के दो हफ्ते बाद ही वैसी ही त्रासदी की पुनरावृति असम में हुई। 9 फरवरी 2019 को आबकारी निदेशालय ने उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की त्रासदी को ध्यान में रखते हुए असम के सभी जिलों के आबकारी विभाग को सतर्कता संदेश भेजा था।लगता है जोरहाट और गोलाघाट जिले के आबकारी विभाग ने उस संदेश को कोई तवज्जो ही नहीं दिया।घटनाक्रम से साफ है कि राज्य सरकार और उसके विभिन्न विभागों की लापरवाही से इतनी बड़ी त्रासदी की बुनियाद तैयार हुई। 

असम में जहरीली शराब पीकर पहले भी गरीब मरते रहे हैं।लेकिन मृतकों की इतनी बड़ी तादाद पहली बार सामने आई है ।पिछले साल गोलाघाट जिले में सात चाय मजदूर जहरीली शराब पीकर मर गए थे।हाल के कुछ वर्षों में सैकड़ों चाय मजदूर जहरीली शराब पीकर काल कवलित हो चुके हैं।इस तरह की मौतों को प्रशासन कभी गंभीरता से नहीं लेता और अवैध शराब व्यापारियों को मौत का व्यापार करने की खुली छूट दी जाती है।

असम में 800 से ज्यादा चाय बागान हैं और इन बागानों में काम करने वाले मजदूर कठोर मेहनत करने के बाद नियमित रूप से देशी शराब का सेवन करते हैं।राज्य में विदेशी और देशी शराब की बिक्री होती है। विभिन्न जनजातियां परंपरागत रूप से चावल और जड़ी-बूटियों के मिश्रण से जो देशी शराब बनाती हैं,उनके सेवन से किसी तरह जान का खतरा नहीं होता। ऐसी शराब को बनाने और बेचने के लिए किसी लाइसेन्स की जरूरत नहीं होती। चावल, गुड़ और रासायनिक पदार्थों की मदद से भी देशी शराब बनाकर लाइसेन्स लेकर बेची जाती है।इस शराब को ‘चुलाई’ कहकर पुकारा जाता है।कुछ लोग लाइसेन्स के बगैर इसका उत्पादन करते हैं और बेचते हैं। इस शराब को प्लास्टिक पाउच में भरकर 10-15 रुपए में बेचा जाता है।चाय मजदूरों को दो सौ रुपए से भी कम मजदूरी मिलती है और वे विदेशी शराब खरीदने की हैसियत नहीं रखते।इसीलिए वे सस्ती ‘चुलाई’ शराब का सेवन करते हैं।

परंपरागत तरीके से बनाई गई जनजातियों की शराब सुरक्षित होती है और उसके सेवन से कभी भी लोगों के मरने की नौबत नहीं आती।दूसरी तरफ चुलाई का उत्पादन करते वक़्त किसी निश्चित मानक का पालन करने की जगह केवल मुनाफे को ध्यान में रखा जाता है।

जोरहाट और गोलाघाट में जहरीली चुलाई का सेवन कर डेढ़ सौ से ज्यादा चाय मजदूर मारे गए हैं।हादसे के तुरंत बाद संदेह व्यक्त किया गया था कि चुलाई उत्पादकों ने हड़बड़ी में अधिक मात्रा में चुलाई बनाने के चक्कर में स्वच्छता का ध्यान नहीं रखा होगा और गुड़,खाद,बैटरी कार्बन,कीटनाशक और तंबाकू के पत्ते के प्रयोग की वजह से चुलाई जहरीली हो गई होगी।अब जांच से स्पष्ट हुआ है कि चुलाई में जहरीला मिथाइल अल्कोहल(मेथानोल)मिलाया गया था। मेथानोल का इस्तेमाल केवल औद्योगिक उद्देश्यों से किया जाता है।इसका सेवन मानव शरीर के सभी अंगों के लिए खतरनाक होता है और मनुष्य अंधेपन का शिकार हो सकता है।असम के जो चाय मजदूर चुलाई हादसे में बच गए हैं, उनमें से नौ लोग पूरी तरह अंधे हो चुके हैं।

कुछ मरणासन्न चाय मजदूरों के बयान से यह भी पता चला है कि स्पिरिट में पानी मिलाकर चुलाई के रूप में बेचा जा रहा था,जिसका सेवन करने की वजह से इतने सारे मजदूर मारे गए।इस तरह से चुलाई बनाना सबसे लाभदायक माना जाता है। इस तरीके को अपनाकर शराब व्यापारी कम खर्च कर अधिक मुनाफा कमा सकते हैं।चुलाई में मेथानोल का मिश्रण करना कानूनी रूप से वर्जित है और ऐसा करने पर दंड का भी प्रावधान है। 

मौत का यह खेल आबकारी विभाग,पुलिस और जिला प्रशासन की नाक के नीचे चलता रहा और मौत के सौदागरों को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया गया।मीडिया रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि चाय बगानों में देशी शराब बेचने के लिए पहले जो ‘महलदारी’ की प्रथा प्रचलित थी, उसे खत्म करते हुए संशोधित असम आबकारी अधिनियम के तहत नई व्यवस्था लागू करने की वजह से इतना बड़ा हादसा हुआ है।राज्य में अभी भी गैर कानूनी तरीके से रिटेल इकाइयों में चुलाई का उत्पादन किया जाता है और बेचा जाता है।आबकारी विभाग,पुलिस और जिला प्रशासन के साथ सांठगांठ कर चुलाई व्यापारी राज्य भर में चुलाई के अड्डे धड़ल्ले से चला रहे हैं।हर साल चाय बागानों में जहरीली शराब के सेवन से मजदूरों की मौत होती रही है,लेकिन प्रशासन की तरफ से कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है। चुलाई की बिक्री और गुणवत्ता को नियंत्रित करने का कोई तंत्र विकसित नहीं किया जा सका है।

राज्य में चाय मजदूरों के कई संगठन हैं।इन संगठनों ने कभी भी अवैध तरीके से चुलाई बनाकर बेचे जाने के मुद्दे पर कोई आवाज़ बुलंद नहीं की है,न ही उनकी तरफ से चाय मजदूरों के बीच कोई जागरूकता अभियान चलाया गया है। चाय बागान के आसपास ऐसे अनगिनत अड्डे गैर कानूनी तरीके से चलाये जा रहे हैं,जिनको सीधे-सीधे मौत की दुकान कहकर पुकारा जा सकता है।लाइसेन्स लेकर नौ कारखानों में देशी शराब का उत्पादन किया जाता है और 200 बिक्री केन्द्रों के जरिये बेचा जाता है।लेकिन चाय बगानों में कोई बिक्री केंद्र नहीं है। इससे साफ संकेत मिलता है कि शराब माफिया के प्रभाव के चलते चाय बागानों में सुरक्षित शराब की बिक्री नहीं हो रही है और चुलाई के नाम पर उनको मौत बेची जा रही है।चाय बागानों में सड़क किनारे छोटे बच्चों और महिलाओं को भी चुलाई बेचते हुए देखा जा सकता है।बागान मालिकों को भी इन मजदूरों के जीवन की सुरक्षा से कोई मतलब नहीं है।वैसे भी इस देश में गरीब आदमी के मरने से सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 

 








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