राज्य सरकार के आश्वासन के बावजूद नहीं हटे बैलाडीला में आंदोलनकारी, आदिवासी चाहते हैं ठोस कार्यवाही

ग्राउंड रिपोर्ट , दंतेवाड़ा, बृहस्पतिवार , 13-06-2019


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तामेश्वर सिन्हा

दन्तेवाड़ा (छत्तीसगढ़)। पहाड़ बचाने के लिए शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे आदिवासियों को प्रशासन ने नोटिस जारी कर धरना स्थल खाली करने को कहा है। 7 दिनों से  जारी आदिवासियों इस आंदोलन को दन्तेवाड़ा अनुविभागीय दंडाधिकारी (एसडीएम) ने नोटिस जारी कर बीती रात 12 बजे से पूर्व धरना स्थल खाली करने का निर्देश दिया है। नोटिस में आगे कहा गया है कि अगर धरना स्थल खाली नहीं किया जाता है तो धरने में बैठे लोगों पर कार्रवाई की जाएगी। 

नोटिस में यह भी उल्लेख है कि शासन ने आपकी मांगों को माना है बावजूद इसके धरना स्थल पर बैठे हैं। 

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में आदिवासियों ने खदान विरोधी संघर्ष छेड़ दिया है। दंतेवाड़ा जिले के बैलाडीला पर्वत श्रृंखला के नंदाराज पहाड़ पर स्थित एनएमडीसी के 13 नंबर की लैह अस्यक खदान को अडानी की कंपनी को दिए जाने के विरोध में आदिवासियों का 7 वे दिन भी प्रदर्शन जारी रहा। 

दरअसल 11 जून को बस्तर सांसद दीपक बैज और पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरविंद नेताम के नेतृत्व में प्रतिनिधि मंडल ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकात की थी। 

मुख्यमंत्री ने प्रतिनिधि मंडल से मुलाकात के बाद इस बात का भरोसा दिलाया कि वनों की कटाई पर तुरंत रोक लगाई जाएगी। वर्ष 2014 के फर्जी ग्राम सभा के आरोपों की जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। और क्षेत्र में संचालित कार्यों पर तत्काल रोक लगाई जाएगी। इस सिलसिले में राज्य सरकार की ओर से भारत सरकार को पत्र लिख कर जन भावनाओं की जानकारी दे दी जाएगी।

मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया लिखित आश्वासन।

हालांकि 6 दिनों से आंदोलनरत आदिवासियों ने सरकार के बात-चीत के फैसले का स्वागत किया है लेकिन उनका कहना है कि  जब तक वो इस मसले पर हम पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हो जाते हैं, तब तक उनका प्रदर्शन जारी रहेगा। संयुक्त पंचायत संघर्ष समिति की तरफ से चर्चा में सुरेश कर्मा, बल्लू भावनी, नंदाराम, राजू भास्कर, भीमसेन मण्डावी सहित आंदोलन में पहुंचे सरपंचों ने हिस्सा लिया।

पहले दौर में आधे घंटे तक बातचीत में दीपक बैज ने मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए आदेश की कॉपी दिखाई। समिति के सदस्य पेड़ कटाई पर रोक और फर्जी ग्रामसभा की जांच के आदेश में कानूनी धाराओं का उल्लेख न होने का हवाला देकर उसे मानने के लिए तैयार नहीं हुए। उसके बाद पेंच ठेका रद्द करने पर फंस गया। आंदोलनकारियों ने उनसे दो टूक शब्दों में कहा कि जब तक ठोस फैसला नहीं होता है तब तक वे यहीं बैठे रहेंगे। बैज उन्हें बार-बार यह समझाते रहे कि सीएम ने सारी मांगें मान ली है।

प्रदर्शनकारी।

आंदोलनकारियों का तर्क था कि वन भूमि अधिनियम 1980 की कंडिका दो के तहत डायवर्सन व कटाई का आदेश केंद्र सरकार ने जारी किया है। इसी धारा का इस्तेमाल कर राज्य सरकार ने वन विभाग को आदेशित किया है लेकिन राज्य सरकार के आज के आदेश में इस धारा का कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया है। नाराज लोगों का कहना था कि हवा में ही कटाई रोकने की बात की जा रही है।

सांसद ने समझाया कि ग्राम सभा के आदेश के फर्जी होने के आरोप की जांच कराई जाएगी, तब तक आप आंदोलन वापस लेकर सहयोग करें। लेकिन उनकी बात का कोई असर नहीं दिखा। आंदोलनकारियों ने कहा कि जब तक ग्राम सभा फर्जी होने की जांच प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती वे धरना देते रहेंगे। उनका कहना है कि सरकार दो-तीन दिन के भीतर अपनी जांच करा ले। समाचार लिखे जाने तक दोनों पक्षों के बीच चर्चा जारी थी। 

इधर पांचवें दिन भी किरंदुल में खनन ठप रहा। मंगलवार को बचेली परियोजना में भी काम प्रभावित हुआ। इन दोनों परियोजनाओं में काम प्रभावित होने से एनएमडीसी व रेलवे को अब तक लगभग दो सौ करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है।

सामाजिक कार्यकर्ता आलोक शुक्ला 11 जून को प्रदर्शन स्थल पर अपना समर्थन देने पहुंचे थे। बात करने पर उन्होंने कहा कि कटाई का आदेश, जांच का आदेश और जांच करने वाले एक ही विभाग। इससे कुछ निकलेगा नहीं?

प्रदर्शनकारी।

जांच इस बात की होनी चाहिए कि आदिवसियों के देवता का स्थान नंदराज पहाड़ पर लोहा उत्खनन के लिए वन स्वीकृति किस आधार पर दी गई।  जबकि प्रभावित ग्राम सभाओं ने कभी भी नियमानुसार प्रक्रिया के तहत ग्रामसभा में सहमति नहीं दी बल्कि विरोध में सात प्रस्ताव दिए और वनाधिकर मान्यता कानून 2006 की धारा 5 ग्रामसभा को अपने जंगल जमीन , जैवविविधता संस्कृति के संरक्षण का अधिकार सौंपता है। MOEF का वर्ष 30 जुलाई 2009 के आदेश के तहत किसी भी वन भूमि का डायवर्जन नहीं हो सकता जब तक वनाधिकारों की मान्यता की समाप्ति और ग्रामसभा की लिखित सहमति नहीं होती। 

आलोक आगे कहते हैं कि वन भूमि के डायवर्जन की प्रक्रिया वन विभाग के द्वारा चलाई जाती है और वनाधिकार मान्यता कानून के कंप्लाइन्स की जिम्मेदारी जिला कलेक्टर की होती है । इन दोनों प्रतिवेदन के बाद राज्य सरकार की अनुशंसा के बाद केंद्रीय वन मंत्रालय द्वारा स्टेज 1 और स्टेज 2 अर्थात अंतिम स्वीकृति मिली। इस स्वीकृति के बाद राज्य सरकार  ने वन भूमि (डायवर्जन) अधिनियम 1980 की धारा 2 के तहत अंतिम आदेश जारी किया है और फिर वन विभाग ने पेड़ कटाई का आदेश जनवरी 2018 में जारी किया। (ये सारी प्रक्रिया राज्य में रमन सरकार और केंद्र में मोदी सरकार के समय हुई थी।) 

प्रदर्शनकारी।

इस प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए और गलत पाए जाने पर राज्य सरकार के पास पूरा अधिकार है कि वह धारा 2 के अंतिम आदेश को वापस ले सकती है। 

आलोक आगे बताते हैं कि डिपॉजिट 13 की वन स्वीकृति के प्रस्ताव को  केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति ने वर्ष 2011 में इस आधार पर खारिज कर दिया था कि यह वन क्षेत्र दखलरहित और उच्च जैव विविधता वाला है, परंतु इसी क्षेत्र में 22 -23 सितंबर 2014 को वन सलाहकार समिति इसे स्टेज 1 की स्वीकृति प्रदान कर देती है। पहाड़ पर वन और जैव विविधता में कोई परिवर्तन नहीं आया फिर राज्य सरकार द्वारा 2014 में ऐसे कौन से दस्तावेज भेजे गए कि समिति ने स्वीकृति जारी कर दी। इसे कहा जाता है अस्वीकृतियों को स्वीकृतियों में बदल देना  । वर्ष 2014 से ऐसी कोन सी ताकत काम कर रही थी जिसने इतने महत्वपूर्ण वन क्षेत्र में स्वीकृति हासिल कर ली?

(दंतेवाड़ा के घेराव स्थल से जनचौक संवाददाता तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट।)

 










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