नहीं सधी “संत” से दो नावों की सवारी

विशेष , , बुधवार , 13-06-2018


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संदीप नाईक

समाज, राजनीति और अर्थशास्त्र में कब क्या हो जाये यह कहा नहीं जा सकता। खास करके इस समय में जब आस्थाएं, विश्वास और भरोसे डगमगा गए हों और एक अजीब सी वहशत के इस दौर में लोग अवसाद और तनाव ग्रस्त हैं। बुरी तरह से तो कोई खबर ना होना भी एक तरह से परेशान ही करता है। यह बार जून की दोपहरी है और अचानक काम करते हुए हाथ चैनल्स की भीड़ में समाचारों पर जा रुकता है और एक खबर से सनसनी मचती है। पहले खबर आती है मप्र के इंदौर के भैय्यु महाराज ने खुद को गोली मार ली है दोपहर एक बजकर सत्तावन मिनिट पर और उन्हें उनके घर के पास स्थित बोम्बे अस्पताल ले जाया रहा है और दूसरी खबर फ्लैश होती है- भैय्यु महाराज की गोली लगने से मौत और तीसरी खबर कि उन्होंने गोली खुद अपनी दाहिनी कनपटी पर मार ली थी। ये तीनों खबरे दो मिनिट के अंतराल पर उभरती हैं और एक पूरा मायाजाल भरभराकर गिर पड़ता है। एक तिलिस्म जो भैय्यु महाराज ने सालों की मेहनत के बाद बनाया था वह किसी ताश के पत्तों के महलों की तरह गिर पड़ता है। खबर आग की तरह फैलती है और देर रत तक चैनल्स और लोगों के जेहन में बनी रहती है कि आखिर क्यों? 

भैय्यु महाराज अर्थात मप्र के मालवा के एक छोटे से कस्बे शुजालपुर में 29 अप्रैल 1968 को जन्मे उदयसिंह देशमुख जो सुन्दर कद काठी के व्यक्तित्व थे, कारपोरेट में काम करते थे, फिर अपनी खूबसूरती के बल पर फिल्म उद्योग में गए और मॉडलिंग की मात्र 28 बरस की उम्र में उनका माया नगरी से मोह भंग हुआ और उन्होंने आध्यात्म को जीवन ध्येय बनाया। मुम्बई को छोड़कर इंदौर आये और सद्गुरु सेवा संस्थान की शुरुवात की। मप्र और महाराष्ट्र के दूरस्थ गाँवों में। गरीब बच्चों को शैक्षणिक सामग्री बांटना साथ ही पानी के लिए प्रबंधन करना– दो प्रमुख काम थे। बाद में किसानों को बीज एवं खाद बांटना भी इसमें शामिल हुआ। इसमें वे माहिर और पारंगत थे बहुत, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ के क्षेत्र पानी की समस्या से जूझते रहते थे लिहाजा उनका काम इन्ही क्षेत्रों में था। इंदौर में रहकर भी वे अक्सर महाराष्ट्र में पाए जाते थे और उनका राजनैतिक रसूख काफी बड़ा था।

शिवसेना से लेकर भाजपा, कांग्रेस, मनसे आदि के साथ सहज थे और बड़े उद्योग घराने उनके प्रभाव में थे। फ़िल्मी दुनिया से जुड़े उनके तार भी सेवा प्रकल्पों में सहायक सिद्ध होते थे। इसलिए उन्हें रूपये पैसों की कमी कभी खली नहीं और वे अपने शौक हमेशा पूरे करते रहे- चाहे वो महँगी घड़ी का हो या लक्ज़री गाड़ियों का हो, अकूत संपत्ति, शानदार बंगला, आश्रम और शानो शौकत के मालिक उदय सिंह देशमुख उर्फ़ भैय्यु महाराज के रूप में जाने जाने लगे थे। मप्र और महाराष्ट्र के साथ देश की केन्द्रीय राजनीति में भी उनका हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा था। उनके आश्रम में शायद ही कोई राजनेता ऐसा होगा जो ना आया हो या फ़िल्मी हस्ती, अन्ना आन्दोलन में उन्होंने सरकार और अन्ना के बीच जिस तरह से भूमिका निभाई थी वह एक बड़ा कदम था जिससे सारे देश का ध्यान उनकी तरफ गया था। इसके बाद तो वे लगभग संकट मोचन की तरह से अपनी भूमिका निभाने लगे थे।

पिछले शनिवार को ही ‘जी मराठी’ को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने हाल ही में संपन्न हुए महाराष्ट्र की एक लोकसभा सीट के चुनाव और भाजपा शिवसेना गठबंधन पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि “यह राजकाज की बात है और महाराष्ट्र के हित में दोनों दलों को एक साथ संयोजन कर चुनाव लड़ना चाहिए, और मै मध्यस्थता करके समस्या को सुलझाउँगा।” परन्तु अफसोस यह हो ना सका। 

मप्र शासन की शिवराज सरकार ने उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा दिया था अन्य चार संतों के संग जो शिवराज सरकार की लगातार नर्मदा यात्रा, पौधारोपण और नाजायज खर्चों के खिलाफ मोर्चा खोलकर जनता को इन यात्राओं का सच बताने वाले थे, भैय्यु महाराज भी इस तरह के खर्चों के काफी खिलाफ थे और इसलिए सरकार ने उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा देकर फांसने की कोशिश की थी परन्तु उन्होंने उसी दिन विनम्रता से सुविधाएं लेने से मना कर दिया था और संकल्प लिया था कि वे नर्मदा माई की सेवा करते रहेंगे और जिस तरह से महाराष्ट्र में किसानों के साथ काम कर रहे हैं मप्र में भी आरम्भ करेंगे ताकि किसान आत्महत्या को मजबूर ना हों। यह शायद शिवराज सरकार को रास नहीं आया था पर मामला इतना गंभीर नहीं था कि इस कारण से वे आत्महत्या कर लें जैसा कि कांग्रेस के मानक अग्रवाल ने आरोप लगाकर सीबीआई जांच की बेतुकी मांग की है। 

दरअसल उनकी मृत्यु का कारण पारिवारिक कलह है और बड़े स्तर पर कर्जदार हो जाना है जो अब सामने आ रहा है। उनका पहला विवाह औरंगाबाद की माधवी निम्बालकर से 21 मई 1991 को हुआ था परन्तु माधवी की रहस्मय मृत्यु नवंबर 2015 में हो गई– उससे उन्हें एक बेटी कुहू है जो वर्तमान में अठारह बरस की है और पुणे में अध्ययनरत है। भैय्यु महाराज ने माधवी की मृत्यु के डेढ़ साल बाद ही ग्वालियर की डाक्टर आयुषी से दूसरा विवाह 30 अप्रैल 2017 को कर लिया था जिससे उन्हें एक बेटी हुई जो इस समय मात्र चार माह की है। अपने सार्वजनिक जीवन में इस तरह से दो विवाह कर एशो आराम से रहने के कारण स्थानीय मीडिया ने उनकी काफी बेइज्जती की थी। साथ ही उन पर कई भद्र महिलाओं ने चरित्र हनन को लेकर आरोप लगाया था, लेखिका मल्लिका राजपूत ने भी भैय्यु महाराज के साथ अपनी नजदीकी के फोटो वाईरल किये थे जिससे उनकी बदनामी हुई थी।

इन दिनों वे आर्थिक रूप से कर्ज में दबे हुए थे, साथ ही उनकी बड़ी बेटी के दूसरी पत्नी के साथ सम्बन्ध ठीक नहीं थे और आये दिन लड़ाई झगड़े होते रहते थे, भैय्यु महाराज चाहते थे कि संपत्ति का बँटवारा बराबर हो जाए जबकि बेटी और दूसरी पत्नी को यह मंजूर नहीं था, आश्रम चलाने के लिए लाले पड़ रहे थे इसलिए उन्होंने कुछ दिन पूर्व ही सार्वजनिक जीवन से संन्यास की घोषणा भी कर दी थी। परन्तु तनाव, अवसाद और झगड़े निजी में बढ़ते ही जा रहे थे। अफसोस कि जिस आदमी ने बड़े से बड़ी समस्याएं हल कर देश के युवाओं, राजनीतिज्ञों और उद्योगपतियों को सलाह देकर जीवन के सही मार्ग पर लाया और दिशा दी- वह अपने जीवन की समस्या से हार गया और आत्महत्या जैसा विकल्प चुना। 

सवाल यह नहीं कि संतों को अवसाद तनाव नहीं होता। परन्तु उच्च महत्वकांक्षाएं, चमक दमक भरी जिन्दगी, महंगे शौक, आधुनिक गजेट्स के पीछे भागना और रसूख बनाए रखने के लिए तमाम तरह के गलत हथकंडे अपनाना उन्हें भारी पड़ा और अंत में वे जीवन से हार गए और लिखना पड़ा कि अब “वे तंग आ गए हैं और तनाव में जीना उन्हें भारी पड़ रहा है– लिहाजा अब कोई और आये और परिवार की देखरेख करे मैं विदा ले रहा हूँ।” देवास में एक मराठी परिवार में काले आई के यहाँ उनका आना जाना था जो नवरात्रि में देवी पूजा करती थीं और अघोरी किस्म की उपासक थीं, भैय्यु महाराज उनके शिष्य थे और प्रतिवर्ष नवरात्रि में आते थे।

उनके कई अच्छे कामों की महक आज है और हमेशा रहेगी। परन्तु राजनैतिक दलदल में रहकर जो भी समझौते उन्होंने राजनेताओं के और उद्योगपतियों के करवाए हैं वे बजबजाते रहेंगे। इससे यह सीख मिलती है कि सार्वजनिक जीवन में धर्म, आध्यात्म, संपत्ति और राजनीति का गठजोड़ आदमी को हमेशा मृत्यु की ओर ही ले जाता है या बड़ी सजा की ओर। आशाराम, राम रहीम और अब भैय्यु महाराज इसका ताजा और आँख देखा उदाहरण हैं। 

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)








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mohit :: - 06-13-2018
jis prkar se up me cm akhilesh yadav ko bjp and company ne badnam kiya gya hai bo ghtiya hai bjp ko ye sanskriti unke purvajo se mili hai, ye hai inka asli chaal charita. itni ghatiya soch inke purvajo ne ithihaas me kai baar ki hai ki jab inka singasshan or satta ko chunoti desh ke mulnivasiyo se mili hai inhone chaartik hanan karne ke liye ese ginone kaam kiye hai. ye hai ghatiyaa logo ki kunthit mansikta kitna bhi kuch kar lo bjp balo is bar tumahra boriya bistar samet lo

Vinayak Shukla :: - 06-13-2018
Perfect work

??????? :: - 06-13-2018
सटीक....