काऊबेल्ट में कमल को झटका, पंजे ने कसी कमर

राजनीति , नई दिल्ली, मंगलवार , 11-12-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के रूझान सामने आ गए हैं। और उसके साथ ही तस्वीर भी बिल्कुल साफ हो गयी है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बन रही है। तेलंगाना में टीआरएस ने एक बार फिर बाजी मार ली है। और मिजोरम की सत्ता से कांग्रेस को हाथ धोना पड़ा है। और मध्य प्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी के बीच कांटे की टक्कर जारी है।

हालांकि कांग्रेस थोड़ी बढ़त जरूर बनाए हुए है। बीजेपी शासित राजस्थान, एमपी और छत्तीसगढ़ में अकेले शिवराज शिव चौहान हैं जो मोर्चे पर आखिरी दम तक टिके हुए हैं और किले को बचाने का हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। बाकी छत्तीसगढ़ में बीजेपी का सूपड़ा साफ हो गया है। और राजस्थान में भी कांग्रेस ने अच्छी बढ़त ले ली है। हालांकि उसके पक्ष में वैसा बंपर नतीजा नहीं आया जिसकी राजनीतिक पंडित उम्मीद कर रहे थे।


राजस्थान में वसुंधरा विरोधी माहौल पहले से ही बन गया था। उसमें उनकी राजनीतिक कार्यशैली का मसला हो या फिर किसानों से लेकर तमाम तबकों की अनदेखी हर चीज उनके खिलाफ गयी। जिसका नतीजा ये रहा कि खुद उन्हीं की पार्टी में उनके खिलाफ बगावत हुई और कभी गृहमंत्री रहे गुलाब चंद कटारिया पार्टी से अलग होकर चुनाव लड़े। ये बात अलग है कि वो मतगणना में पीछे रहे। सरकार की उपेक्षा का ही नतीजा था कि सूबे में सीपीएम नेता अमराराम के नेतृत्व में सबसे बड़ा किसान आंदोलन खड़ा हुआ। बावजूद इसके सरकार नें उनकी मांगों को तवज्जो देना जरूरी नहीं समझा। लिहाजा किसानों की वो टीस वसुंधरा के खिलाफ वोट के तौर पर सामने आयी। अलवर से लेकर उदयपुर तक संघ संरक्षित हिंदू संगठनों ने पहलू खान और रैगर की हत्या के जरिये हिंदुत्व का माहौल बनाने की हर संभव कोशिश की लेकिन मुद्दा परवान नहीं चढ़ सका।

न तो सूबे में कोई उसका नेता बन सका और न ही वसुंधरा उसकी कोई स्वाभाविक प्रतिनिधि थीं। उसके इतर कांग्रेस के सचिन पायलट की चार सालों की मेहनत इन सब पर भारी पड़ी। साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की जमीनी पक़ड़ ने उसको और मजबूत करने का काम किया। यहां सामाजिक समीकरण के लिहाज से भी कांग्रेस भारी पड़ी। गहलोत का माली समुदाय से आना और सचिन पायलट का पिछड़े गूर्जर हिस्से से होना कांग्रेस के पक्ष में रहा। और इस तरह से सवर्ण से लेकर पिछड़े और दलित-मुसलमान तक एक बड़ा सामाजिक मोर्चा उसका आधार बना। जबकि वसुंधरा का रानी होना और क्षत्रिय समुदाय से आना कांग्रेस की सोशल इंजीनियरिंग के सामने कमजोर पड़ गया। वैसे भी राजस्थान में हर पांच साल पर सरकार बदलने की परंपरा रही है।

अशोक गहलोत उसके अपवाद थे। हालांकि बावजूद इसके दोनों दलों के वोटों में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। कांग्रेस को 39.10 फीसदी वोट मिले हैं और बीजेपी को 38.6 फीसदी लोगों ने अपना मत दिया है। इसके साथ ही रुझानों में कांग्रेस को 103 और बीजेपी को 70 सीटें मिलती दिख रही हैं। तीसरे नंबर पर निर्दलीय रहे हैं जिन्हें 9.6 फीसदी मतदाताओं ने वोट दिया है। और 12 सीटों पर बढ़त बनाए हुए हैं। तीसरे दल के रूप में बीएसपी रही है जिसे 4.1 फीसदी वोट मिले हैं। और खबर लिखे जाने तक 3 सीटों पर बढ़त बनायी हुई थी।


छत्तीसगढ़ में बीजेपी को मुंह की खानी पड़ी है। पिछले 15 सालों से यहां राज कर रही बीजेपी को जनता ने उतना ही करारा धक्का दिया है। सत्ता विरोधी रुझान यहां का प्रमुख फैक्टर रहा है। बस्तर के आदिवासी इलाके ने एक बार फिर रमन के साथ जाने से इंकार कर दिया। यहां की 12 सीटों में ज्यादातर कांग्रेस के पक्ष में जाती दिख रही हैं। शहरी इलाकों में पार्टी उतना अच्छा नहीं कर पायी। दरअसल इसके कई कारण हैं। सबसे पहला तो 15 सालों की एंटी इंकम्बेंसी थी। दूसरा नक्सल विरोधी अभियान के नाम पर सुरक्षा बलों की ज्यादती ने पूरे आदिवासी समुदाय को नाराज कर दिया था। और उस मामले में सब कुछ जानते हुए भी सरकार ने कभी कोई ढील नहीं दी। युवाओं के रोजगार का सवाल हो या फिर किसानों की उपज का मूल्य इन दोनों मामलों में सरकार बुरी तरीके से नाकाम रही। ऐसे में मोबाइल बांटने और कुछ घर बनवाने जैसी लोकप्रिय योजनाओं से भला क्या होना था। अंत में चुनाव के समय सामने आया अजीत जोगी और बीएसपी का गठजोड़ भी बताया जा रहा है कि बीजेपी पर भारी पड़ा।


ऊपर से रमन सिंह का खुद का बाहरी और सवर्ण समुदाय का होना किसी भी रूप में अग्रगामी सामाजिक शक्तियों के खिलाफ जाता था। लिहाजा जब उनके खिलाफ आंधी की शुरुआत हुई तो पकड़ कर खड़े रहने के लिए उनके पास कुछ नहीं था। और अंत में वो तिनका साबित हुए। जिसका नतीजा ये रहा कि न केवल कांग्रेस और बीजेपी के वोटों में अंतर है बल्कि दोनों की सीटों में भी बहुत बड़ा गैप है। कांग्रेस को यहां 42.9 फीसदी वोट मिले हैं और बीजेपी को महज 33 फीसदी से संतोष करना पड़ा है। अजीत जोगी और बीएसपी को क्रमश: 7.7 और 3.1 फीसदी मत मिले हैं। सीटों के रुझानों में कांग्रेस 62 और बीजेपी 18 पर थी।


इस चुनाव और उसके नतीजों के लिहाज से एमपी बेहद दिलचस्प सूबा हो गया है। तकरीबन 12 साल राज करने के बाद भी शिवराज सिंह चौहान सत्ता के रास्ते में अपना पैर अड़ाए हुए हैं। हालांकि आखिरी बाजी हारते दिख रहे हैं। आखिर इसकी क्या वजह है ये एक यक्ष प्रश्न बन गया है। जबकि सच्चाई ये है कि व्यापम से लेकर नर्मदा तक घोटालों की लंबी फेहरिस्त है। एमपी ऐसा सूबा रहा जहां किसानों के आंदोलन पर सरकार ने गोली चलवायी और मंदसौर में पांच किसानों की मौत हो गयी। और नौजवानों को रोजगार मिलने की जगह उसमें भ्रष्टाचार का घुन लग गया।

यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सत्ता में आने के बाद किसानों का कर्जा 10 दिनों के भीतर माफ करने का वादा किया था। हालांकि इस बात में कोई शक नहीं कि इन वादों ने काम किया और जमीन से कट चुके पार्टी के स्थानीय नेताओं को वोट की जमीन देने में बेहद मददगार साबित हुए।
फिर भी एक तथ्य सामने आया है जो कई तरह के सवाल खड़े करता है और उम्मीद की जानी चाहिए कि समय के साथ उसका जवाब भी आएगा। किसान आंदोलन के केंद्र मंदसौर में बीजेपी जीत रही है। और वहां कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी है। गौरतलब है कि पुलिस की गोली से यहां पांच किसानों की मौत हो गयी थी।


दरअसल मध्य प्रदेश में शिवराज के अपने पैर पर टिके रहने के पीछे उनका पिछड़े समुदाय से होना प्रमुख कारण है। भारतीय राजनीति में दलित और पिछड़े समुदायों के राजनीतिक सशक्तिकरण का जो दौर चला है उसमें एमपी में किसी तीसरी पार्टी के न होने के चलते उसका पूरा फायदा शिवराज सिंह के माध्यम से बीजेपी को गया है। और मुसलमानों की संख्या ज्यादा न होने के चलते न तो हिंदुत्व का जोर चला और न ही मंदिर का मुद्दा बना। ऐसे में शांतिपूर्ण माहौल में भी सामाजिक शक्तियों को अपने लोगों की पहचान कर उनके साथ खड़े होने का पूरा मौका दिया। इस मामले में शिवराज कांग्रेस से बाजी मारते दिखे। जिसके पास नेता के नाम पर ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह तीन चहरे थे। सचाई ये है कि ज्योतिरादित्य के सामने विधायक और एमपी भी खुद को प्रजा समझने लगते हैं ऐसे में जनता उनके साथ कितना जुड़ पायी होगी उसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।

ये बात अलग है कि ग्वालियर से सटे गुना आदि इलाकों में उनका अच्छा खासा प्रभाव है। लेकिन इसे राज्य स्तरीय विस्तार नहीं दिया जा सकता है। कमलनाथ की छवि ही कारपोरेट पक्षधर की रही है और एक ऐसे नेता के तौर पर उन्हें जाना जाता है जो सामान्य दिनों में भी चार्टर्ड फ्लाइट से चलता है। और जिसका इतिहास दून से शुरू होकर कोलकाता होते हुए छिंदवाड़ा तक पहुंचता हो उससे जमीन से एक हद से ज्यादा जुड़ने की उम्मीद करना खुद उसके प्रति अन्याय होगा। तीसरे नेता दिग्विजय सिंह हैं। 10 सालों तक सूबे में राज करने और जमीन से जुड़े होने के बावजूद एक राजा और सवर्ण होने के चलते उनकी सीमाएं हैं। ऊपर से पिछले कुछ सालों की उनकी राजनीति ऐसी रही कि कांग्रेस को जानबूझ कर उन्हें पर्दे के पीछे रखना पड़ा।


कांग्रेस के रणनीतिकारों की इससे बड़ी भूल क्या होगी कि जब देश में मंडल और सामाजिक न्याय का एजेंडा पूरे जोर-शोर से हावी हो तो उसने ऐसे एक चेहरे को भी आगे करना जरूरी नहीं समझा। जिससे उस सामाजिक हिस्से को अपनी तरफ आकर्षित किया जा सके। ऐसा नहीं है कि उसके पास चेहरे नहीं थे या फिर उनका टोटा पड़ा हुआ था। सुभाष यादव के बेटे अरुण यादव को अगर उन चार नेताओं में शामिल कर लिया जाता तो शायद आज एमपी की तस्वीर कुछ और होती। इसके साथ ही कांग्रेस का बीएसपी समेत दूसरे दलों के साथ गठजोड़ न कर पाना भी उसकी नाकामी को ही दर्शाता है। यहां कांग्रेस को 41.4 फीसदी वोट मिले हैं जबकि बीजेपी को 41.3 फीसदी। सीटों के रुझान में खबर लिखे जाने तक कांग्रेस 117 और बीजेपी 103 पर बढ़त बनाई हुई थी। बीएसपी 4.6 फीसदी मत पाकर दो सीटों पर बढ़त बनाए हुए थी।


अब बात दक्षिण में तेलंगाना की। यहां टीआरएस ने एक बार फिर धमाकेदार तरीके से वापसी की है। ये नतीजा बताता है कि चंद्रशेखर राव का समय से पहले चुनाव कराने का फैसला बिल्कुल सही था। इस नतीजे में सबसे प्रमुख संदेश ये है कि तेलंगाना का क्षेत्रीय सेंटीमेंट अभी बना हुआ है और उसके सबसे विश्वसनीय प्रतिनिधि चंद्रशेखर राव हैं। इस चीज को पढ़ने में कांग्रेस बिल्कुल नाकाम रही। और उसने उस टीडीपी से समझौता कर लिया जो तेलंगाना के गठन की विरोधी थी। कांग्रेस के इस कदम को सेल्फ गोल की संज्ञा दी जा रही है। बहरहाल दक्षिण में घुसने की फिराक में लगी बीजेपी को यहां करारा झटका लगा है। और वो 4 सीटों से घटकर 1 पर आ गयी है। सबसे विडंबनापूर्ण बात एआईएमआईएम को लेकर है।

पूरे देश में ओवैसी की ये पार्टी इस तरह से धूम मचाती है जैसे दक्षिण और खासकर तेलंगाना में इसका सिक्का चलता हो। लेकिन सारी सीटों की बात तो दूर यहां ये केवल हैदराबाद शहर तक खुद को सीमित किए हुए है। वोटों के हिसाब से टीआरएस को 47 फीसदी वोट मिले हैं। जबकि कांग्रेस को महज 28.7 फीसदी से संतोष करना पड़ा है। बीजेपी को 7 फीसदी मिले हैं और टीडीपी ने केवल 3.1 फीसदी मत हासिल किए हैं। टीआरएस 87 सीटों और कांग्रेस 19 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। जिसमें टीआरएस 27 सीट जीत गयी है और कांग्रेस के खाते में 6 सीटें गयी हैं।


मिजोरम ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ा है। यहां मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) ने बाजी मारी है। यहां के सारे नतीजे आ गए हैं। जिनमें एमएनएफ को 26 सीटें मिली हैं और कांग्रेस को महज 5 सीटों पर संतोष करना पड़ा है। जबकि बीजेपी के खाते में एक सीट गयी है। एमएनएफ को 37.6 फीसदी मत मिले हैं और कांग्रेस को 30.2 फीसदी। बीजेपी के मतों का आंकड़ा 8 फीसदी का है।








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