भाजपा का बढ़ता खजाना और उसके राजनीतिक मायने

माहेश्वरी का मत , , बुधवार , 13-06-2018


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अरुण माहेश्वरी

मोदी-शाह ने भाजपा के खजाने में हजारों करोड़ रुपये जमा कर लिये । लोग इसके स्रोतों की संदिग्धता पर सही सवाल उठा रहे हैं । नीरव मोदी, मेहुल चोकसी ही नहीं, बैंकों के रुपये मार कर विदेश भागने वाले हर शख्स को देश छोड़ कर भागने का छोड़-पत्र पाने के लिये भाजपा को अपनी लूट का कितना प्रतिशत देना पड़ता है, अंदर ही अंदर लोगों में इस बात की भी चर्चा है । लेकिन भाजपा के नेतृत्व का एक तबका इसे मोदी-शाह की एक बड़ी उपलब्धि जरूर मानता है जिसकी बदौलत चार साल के अंदर ही दिल्ली में भाजपा का अपना पांच सितारा दफ्तर खड़ा हो गया है । हमारा सवाल है कि क्या किसी भी राजनीतिक दल के लिये उसके खजाने में करोड़ों रुपये जमा होने मात्र को उसकी कोई उपलब्धि माना जा सकता है ? राजनीतिक पार्टी क्या कोई व्यापारिक घराना है जिसकी उपलब्धि का कोई भी मानदंड उसकी कमाई हो सकती है ?

राजनीति पराजित हो जाए पर किसी भी उपाय से अरबों रुपये आपके खजाने में आ जाएं तो इसका क्या हश्र होता है, इसे जानने के लिये सबसे बड़ा उदाहरण है झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा जो हजारों करोड़ का घूस खाने के बाद पिछले दिनों एक तस्वीर में खेत में हल के पीछे बैल की तरह जुता हुआ दिखाई दे रहे थे । दरअसल सिर्फ रुपये जमा करना न किसी राजसत्ता की और न राजनीति की कभी कोई उपलब्धि कहला सकता है । अगर जमा रुपया ही इनकी समस्याओं का कोई अंतिम समाधान होता तो कम से कम कोई भी राजसत्ता अपनी मुद्रा को छाप कर ही सारी समस्याओं से मुक्त हो सकती थी । और किसी भी राजनीति का केंद्रीय बिंदु है राजसत्ता क्योंकि उसी के प्रयोग से वह समाज में अपनी भूमिका निभाने का सपना देखती है । इस अर्थ में राजसत्ता का अंत राजनीति का अंत है ।

यही वजह है कि किसी भी राजनीति की मुख्य समस्या राजसत्ता की भी समस्या होती है और किसी भी राजसत्ता की समस्या हर राजनीति की समस्या है । अगर राजसत्ता की किसी समस्या का स्थायी समाधान महज नोट छाप कर संभव नहीं है, तो सिर्फ नोट जमा करना किसी राजनीति की समस्याओं का भी समाधान नहीं है । मोदी-शाह कंपनी का भाजपा के खजाने में हजारों करोड़ रुपये भरने का उन्माद ही इस बात का भी प्रमाण है कि वे राजनीति की केंद्रीय धुरी से ही हट चुके हैं । इन्होंने भाजपा को लगभग एक व्यापारिक घराना, कॉरपोरेट बना कर उसके तर्कों पर चलाना शुरू कर दिया है । इसीलिये अभी जिन कार्यकर्ताओं को ‘उत्साहित’ करने के लिये अमित शाह शहर-दर-शहर घूम रहे हैं, वह सारा कर्मकांड कोरे छल के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता है ।

अमित शाह अपने मन में यह अच्छी तरह जानते हैं कि कार्यकर्ता तो अब असल में उनके जमा रुपये से पैदा होता है, जैसे पगार पर काम करने वाला कंपनियों का कर्मचारी होता है । इसी तर्ज पर तो उनके आईटी सेल का गठन किया गया है जिसे आज की भाजपा के कार्यकर्ताओं में सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है । वे सीधे मोदी की कमांड पर काम करते हैं और इन पर हर साल अरबों रुपये पानी की तरह बहाये जाते हैं । पार्टी के खजाने को भरने के प्रति मोदी-शाह की ललक का इसके अलावा और कोई अर्थ नहीं हो सकता है कि अब भाजपा एक कॉरपोरेट घराना है जो अभी सत्ता से पैसा कमाता है और जब सत्ता पर नहीं रहेगी तो दूसरे गैर-कानूनी तरीकों से लोगों से रुपये ऐंठेगी, जब तक वह कानून के शिकंजे से मुक्त रहेगी । और यही तमाम बातें, हमारे अनुसार, भाजपा की राजनीति के अंत की भी घोषणा करती हैं।




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