भाजपा के लिए चुनौती बन गया है उत्तर प्रदेश

राजनीति , , शुक्रवार , 15-03-2019


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अंबरीश कुमार

लखनऊ। भाजपा के हाथ से उत्तर प्रदेश निकला तो केंद्र की सत्ता भी चली जाएगी। यह आकलन खुद भाजपा के कुछ शीर्ष रणनीतिकारों का है। पुलवामा के जवाब में बालाकोट हवाई हमले से बम-बम पार्टी के रणनीतिकार अब पसोपेश में हैं। दरअसल रोज जिस तरह राजनैतिक एजेंडा बदल रहा है वह पार्टी के लिए चिंता का विषय बन गया है। भाजपा के एक शीर्ष नेता ने कहा, पिछले लोकसभा चुनाव का एजेंडा हमने तय किया था और पूरा चुनाव उस पर चला। हम इस बार भी चुनाव का एजेंडा तय कर चुके थे पर यह एजेंडा कई वजहों से ज्यादा लंबा चला नहीं। अब सोशल मीडिया के चलते रोज एजेंडा बदल जा रहा है। ऐसे में चुनावी लड़ाई को पहले चरण से सातवें चरण तक एक ही एजेंडा पर ले जाना बहुत मुश्किल काम है। पार्टी के लिए यह बड़ी चुनौती है।' 

दरअसल राष्ट्रभक्ति के माहौल को सबसे पहले भाजपा के नेताओं ने खुद ध्वस्त कर दिया। संत कबीर नगर में भाजपा सांसद ने अपने ही विधायक पर जूता चलाकर राष्ट्रवाद का मुद्दा ही किनारे लगा दिया। पूर्वांचल वैसे भी जातीय गोलबंदी का इलाका है और आमतौर पर चुनाव इसी आधार पर होता भी है। जिसका भी टिकट कटा वह राष्ट्रवाद भूल कर पार्टी के खिलाफ खड़ा हो जाता है। यह सिर्फ भाजपा में हो ऐसा नहीं है, सभी दल इससे प्रभावित हैं। पर सत्तर से ज्यादा सांसद उत्तर प्रदेश से लाने वाली भाजपा के लिए यह ज्यादा बड़ी चुनौती है। दूसरे दलों के पास खोने के लिए ज्यादा कुछ है नहीं इसलिए वे बचे हुए हैं। जानकारों के मुताबिक भाजपा करीब पच्चीस तीस सांसदों का टिकट काटने की तैयारी में है। हो सकता है यह संख्या कुछ कम भी हो जाए। पर इसका असर ज्यादा पड़ेगा।

दरअसल उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार को लेकर जातीय गोलबंदी पहले से ही तेज है। संत कबीर नगर में जो कुछ हुआ वह इसी जातीय गोलबंदी का ही नतीजा था। जमीनी स्तर पर जातीय गोलबंदी तेज हो रही है। भाजपा इसे जानती भी है। वे चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही यह मान रहे हैं कि एक तिहाई से ज्यादा सीटें पार्टी हार सकती है। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर हुए कुछ सर्वे इसे और ज्यादा बता रहे हैं। भाजपा को बड़ी चुनौती समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन से ही मिल रही है।

इसमें लोकदल भी शामिल है जिससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी भाजपा को कड़ी चुनौती मिलने वाली है। भाजपा सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस से कुछ मदद की उम्मीद है। प्रियंका गांधी के प्रचार में उतरने के बाद मुस्लिम और दलित वोटों में बंटवारा हो सकता है जिसका लाभ भाजपा को मिलेगा। हालांकि वे इस बात को नहीं मानते हैं कि प्रियंका गांधी के चलते शहरी मध्य वर्ग की अगड़ी जातियों का एक हिस्सा खासकर नौजवान कांग्रेस में जाएगा और इसका नुकसान भाजपा को ही होगा। चुनावी विश्लेषक मानते हैं कि मुस्लिम वहीं पर कांग्रेस के साथ जाएंगे जहां वह भाजपा को सीधी चुनौती दे रही होगी। जैसे अमेठी और रायबरेली। अब तक चुनाव में यही रुझान रहा है। अगर सपा और बसपा अलग लड़ते तो कई जगह यह वोट बंट जाता।

वर्ष 2009 का चुनाव अपवाद था। कल्याण सिंह को मुलायम सिंह पिछड़ों का बड़ा गठबंधन बनाने के मकसद से लाए थे। पर इस फैसले से मुस्लिम नाराज हुए और कांग्रेस को इसका फायदा मिला। पर इस समय कांग्रेस सात आठ सीटों के अलावा कहीं पर भी बहुत मजबूत स्थिति में नहीं है। ऐसे में न तो मुस्लिम बंटने वाला है न ही दलित। उत्तर प्रदेश में वैसे भी कांग्रेस के पास कोई बहुत मजबूत दलित नेतृत्व है नहीं। ऐसे में राहुल और प्रियंका माहौल भले बनाएं पर लोकसभा की बहुत ज्यादा सीट जीत पाएंगे ऐसा लगता भी नहीं है। 

दूसरे कांग्रेस नेतृत्व कुछ ग़लतफ़हमी में भी है। उत्तर प्रदेश में वह चौथे नंबर की पार्टी है जबकि मध्य प्रदेश ,राजस्थान और छतीसगढ़ में वह दूसरे नंबर की पार्टी थी। ऐसे में इन राज्यों में उसका राजनैतिक अहंकार चल गया। यूपी, बिहार में कांग्रेस ने अपना रुख नहीं बदला तो बड़ा नुकसान तय है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने भी इसी सवाल को उठाया। अखिलेश यादव ने कहा , भाजपा नेतृत्व तो अपने गठबंधन के एक छोटे से नेता को मनाने के लिए अपनी जीती हुई सीट तक छोड़ सकता है तो कांग्रेस को भी इससे कुछ सीखना चाहिए। गठबंधन में बड़े दल की भूमिका भी बड़ी होती है और दिल भी।

(अंबरीश कुमार शुक्रवार के संपादक हैं आप 26 वर्षों तक एक्सप्रेस समूह से जुड़े रहे हैं।)








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