क्या हैं चंद्रशेखर की रिहाई के राजनीतिक निहितार्थ?

ख़बरों के बीच , नई दिल्ली, शुक्रवार , 14-09-2018


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महेंद्र मिश्र

भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर की रिहाई का खुले दिल से स्वागत किया जाना चाहिए। उन्हें बेवजह, गलत मामले में और बेहद कड़ी और काली धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया था। और हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद भी जिस तरह से जबरन नई धाराएं लगाकर उन्हें जेल में बनाए रखा गया उसने योगी सरकार की चंद्रशेखर के प्रति कुत्सित मंशा को ही जाहिर किया था। 

दरअसल ये चंद्रशेखर के बहाने पूरे दलित समाज का उत्पीड़न था। ये बाबा साहेब अंबेडकर के उस सपने को गर्भ में ही खत्म करने की साजिश थी जिसको चंद्रशेखर शिक्षा के जरिये समाज में फैलाना चाहते थे। भीम आर्मी महज एक संगठन नहीं बल्कि दलितों के सम्मान की लाठी के तौर पर खड़ा हो रहा था। योगी सरकार ने चंद्रशेखर के उत्पीड़न के जरिये उसे तोड़ने की कोशिश की है।

इस मामले में किसी दूसरे के मुकाबले खुद अपने समुदाय के लोगों के हित, उनकी शिक्षा और उनके सम्मान का प्रश्न ज्यादा था। लेकिन सदियों से दलति समुदाय को पैर का अंगूठा समझने वाले सवर्ण तबके को भला ये सब कहां बर्दाश्त होने वाला था (यहां उसका चेहरा राजपूत समुदाय था।) उसने खुद तो पहल की ही उसके इस काम में सरकार ने उसकी भरपूर मदद की। और फिर सहारनपुर के शब्बीरपुर में राजपूतों ने प्रशासन की शह पर जो तांडव किया अब वो एक इतिहास है। उसके बाद बाकी का काम सरकार ने चंद्रशेखर के खिलाफ रासुका लगाकर उन्हें जेल में बंद करने के जरिये पूरा कर दिया। जिसमें उन्हें एक साल से भी ज्यादा जेल की सींखचों के पीछे काटने पड़े।

अब जब सरकार ने उन्हें छोड़ा है तो उसने महज अपना कर्तव्य पूरा किया है। और एक ऐसा काम किया है जिसे उसे बहुत पहले कर देना चाहिए था। या कहें एक निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ रासुका लगाकर उसने अपराध किया था। ऐसे में उसे कोई श्रेय दिए जाने की जगह उससे माफी मांगने के लिए कहा जाना चाहिए।

लेकिन चंद्रशेखर की रिहाई इतना सरल मामला नहीं है। इसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं। राजनीति में कोई शख्स किसी विरोधी की भलाई के लिए कोई काम नहीं करता है। बल्कि राजनेता के हर कदम में उसका अपना हित शामिल होता है। ये बात अलग है कि उससे किसी दूसरे को कोई फायदा हो जाए। वैसे भी देश में अब कोई भी राजनीतिक निर्णय 2019 को ध्यान में रखते हुए लिया जा रहा है।

और यूपी तो ऐसा सूबा है जिसके बारे में कहा जाता है कि जिसका यूपी उसका केंद्र। मौजूदा केंद्र सरकार पर ये बात 100 फीसदी लागू होती है। लेकिन 4 सालों के शासन का सत्ता विरोधी रुझान और सपा-बसपा के गठजोड़ ने बीजेपी के सामने नया संकट खड़ा कर दिया है। पिछले दिनों हुए तीन लोकसभा उपचुनावों ने भी खतरे की घंटी बजा दी है। सपा-बसपा गठजोड़ पूरी बीजेपी पर भारी पड़ रहा है। यहां तक कि लाज बचाने के लिए अब योगी को छात्रसंघों तक के चुनाव टलवाने पड़ रहे हैं (जैसा कि उन्होंने गोरखपुर में किया)।

ऐसे में बीजेपी अब उस तैयारी में जुट गयी है जब सपा और बसपा दोनों मिलकर चुनाव लड़ें फिर भी उसे बहुत ज्यादा का नुकसान न होने पाए। इस लिहाज से सपा-बसपा की अलग-अलग घेरेबंदी (उनके खिलाफ लगे आरोपों के मामलों पर सीबीआई के जरिये दबाव) एक पक्ष है। जिस पर वो लगातार दबाव बनाए हुए है और एक हद तक कामयाब भी है। केंद्र सरकार के खिलाफ किसी भी आंदोलन में दोनों दलों की गैरमौजूदगी इस बात को साफ करती है। और अभी 10 सितंबर को महंगाई और पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के खिलाफ भारत बंद पर मायावती के बयान ने लोगों के कान खड़े कर दिए।

जब उन्होंने बीजेपी के साथ ही कांग्रेस को भी जमकर कोसा। इसे केंद्र के दबाव का ही नतीजा माना जा रहा है। लेकिन इन दबावों को दरकिनार करते हुए अगर आखिरी तौर पर दोनों दल साथ आ गए तब की स्थितियों की रणनीति पर बीजेपी काम कर रही है। लिहाजा बाहर के साथ-साथ इन दोनों दलों की अंदर से भी घेरेबंदी शुरू कर दी गयी है।

चंद्रशेखर रावण की रिहाई के फैसले को इसी रोशनी में देखा जाना चाहिए। दरअसल बीजेपी को लग रहा है कि अगर चंद्रशेखर राजनीतिक तौर पर बीएसपी के खिलाफ चले जाते हैं जैसा कि अनुमान लगाया जा रहा है, तो उसका काम बन सकता है। वैसे भी अभी तक चंद्रशेखर की गिरफ्तारी या फिर उनके उत्पीड़न को लेकर बीएसपी सुप्रीमो की निंदा की बात तो दूर कोई बयान तक नहीं आया है। माना जा रहा है कि मायावती चंद्रशेखर को भविष्य में अपने लिए एक बड़े खतरे के तौर पर देखती हैं। अब उसी खतरे को बीजेपी ने उनके सामने लाकर खड़ा कर दिया है। चंद्रेशखर के चुनाव लड़ने या न लड़ने को लेकर किसी नतीजे पर पहुंचना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन इससे बीएसपी के खिलाफ माहौल जरूर बनाया जा सकता है। जो इस समय बीजेपी की जरूरत है।

ये ठीक उसी तरह का मामला है जिस तरह से बीजेपी सपा के शिवपाल सिंह यादव के जरिये कर रही है। बताया जा रहा है कि शिवपाल को ही अखिलेश यादव से लड़ाकर सपा को अंदर से कमजोर करने की कवायद तेज कर दी गयी है। इसके लिए जरूरत पड़ने पर बेहिसाब पैसा बहाने तक से बीजेपी परहेज नहीं करेगी। बताया तो यहां तक जा रहा है कि शिवपाल यादव प्रोजेक्ट के लिए बीजेपी ने 500 से लेकर 700 करोड़ तक की राशि मुकर्रर कर रखा है।

बीजेपी की रणनीति बिल्कुल साफ है। उसे हर तरफ से विपक्षियों को कमजोर करना है और सवर्ण कंसालिडेशन के साथ दलित और पिछड़ों के बड़े हिस्से को जीतना है। अनायास नहीं बीजेपी इस समय सामाजिक न्याय की बात कर रही है। और उसे कर्पूरी ठाकुर और राम मनोहर लोहिया याद आ रहे हैं। साथ ही एससी-एसटी एक्ट की बहाली कर और पिछड़ा आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर वो सवर्णों को नाराज करने के हद तक गयी है।

इसके साथ ही राफेल, माल्या और रघुराम राजन से जुड़े मुद्दों पर चौतरफा घिर चुकी केंद्र सरकार को एक ऐसे बड़े मुद्दे की जरूरत थी जिससे इन सबको दरकिनार किया जा सके। और उसके जरिये एक दूसरी नई बहस खड़ी की जा सके। तात्कालिक तौर पर चंद्रशेखर की रिहाई उसकी इसी जरूरत को पूरी करती है। और ये उसके लिए मददगार भी साबित हो सकती है। अगर पालतूू मीडिया इसको लेकर उड़ पड़े तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए। 








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