नोटबंदी-जीएसटी के बाद अर्थव्यवस्था के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी रिटेल में 100%एफडीआई

ख़ास रपट , , शुक्रवार , 12-01-2018


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लोकमित्र गौतम

केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार यानी 10 जनवरी 2018 को सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 फीसदी एफडीआई को मंजूरी दे दी है। अभी तक सिर्फ 49 फीसदी विदेशी निवेश को ही इस क्षेत्र में मंज़ूरी थी। ये निवेश ऑटोमेटिक रुट के जरिए होगा यानी इसके लिए सरकार से अलग से कोई अनुमति लेने की जरुरत नहीं होगी। ये फैसला कैबिनेट की इकोनॉमिक अफेयर्स कमेटी ने लिया है। इस खबर के बाद रिटेल सेक्टर की कंपनियों के शेयरों में तेजी दिखना स्वाभाविक ही था। लेकिन सवाल है कि जिस भाजपा ने साल 2012 में, जब मनमोहन सिंह की सरकार थी, इस क्षेत्र में 49 फीसदी विदेशी निवेश की इजाजत पर ही आसमान सिर पर उठा लिया था, उसके लिए आखिर 100 फीसदी स्वीकार्य कैसे हो गया? तब 49% की इजाजत पर रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि सरकार देश के किसानों और खुदरा व्यापारियों के प्रति जरा भी संवेदनशील नहीं है। क्या इन पांच सालों में वही करना संवेदनशीलता की निशानी हो गयी? 

रिटेल का क्षेत्र अपने देश के लिए ही नहीं पूरी दुनिया के लिए कारोबार का सबसे बड़ा क्षेत्र है। सच तो यह है कि रिटेल ही दुनिया की अर्थव्यवस्था का आधार है। तभी तो इस क्षेत्र की विशालकाय बहुराष्ट्रीय कंपनी वालमार्ट की आर्थिक हैसियत भारत जैसे देश यानी दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के सालाना बजट के करीब-करीब है। भारत का खुद रिटेल क्षेत्र का कारोबार उसके सालाना बजट से करीब दो गुने के बराबर है। हिन्दुस्तान में रिटेल कारोबार करीब दो साल पहले 50 लाख करोड़ रुपये का था, जिसके साल 2020 तक बढ़कर 68 लाख करोड़ रूपये तक हो जाने की उम्मीद है। यह अनुमान डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड (डीआईटी) द्वारा भारत के रिटेल कारोबार को लेकर बनाई गयी एक रिपोर्ट में लगाया गया है। गौरतलब है कि डीआईटी इंग्लैंड सरकार की एक एजेंसी है,जो अंर्तराष्ट्रीय बाजार के क्षेत्र में काम करती है। डीआईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में ई-कॉमर्स तेजी पकड़ रहा है शायद इसीलिये भी विदेशी रिटेलर कम्पनियां भारत सरकार पर इस क्षेत्र में विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए दबाव डाल रही थीं। माना जा रहा है कि साल 2020 तक भारत में ई-कॉमर्स का बाजार करीब दो लाख करोड़ रुपये हो जाएगा। आज जबकि यूरोप के ज्यादातर देशों में ई-कॉमर्स 5% की रफ़्तार से भी नहीं बढ़ रहा वहीँ भारत में यह 40%की रफ़्तार से बढ़ रहा है। इसे देखते हुए यह अनुमान गलत नहीं है कि आने वाले वर्षों में भारत दुनिया का सबसे तेजी से विकसित होता ई-कॉमर्स बाजार हो जाएगा। 

भारत सचमुच विचित्रताओं का देश है। दिसंबर 2012 में जब मनमोहन सरकार रिटेल के क्षेत्र में 49 फीसदी एफडीआई के मुद्दे पर हुई अपनी जीत से उत्साहित थी तभी यह खबर भी आयी थी कि अपने लिए रिटेल क्षेत्र का दरवाजा खुलवाने हेतु दुनिया की इस क्षेत्र की सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी वॉलमार्ट ने करीब सवा सौ करोड़ रुपये अमरीकी सांसदों की लॉबिंग में खर्च किया था ताकि वह भारत सरकार पर दबाव डाल सकें कि भारत सरकार रिटेल के क्षेत्र में निवेश की अनुमति दे सके। क्या इस खुलासे के बाद भी अनुमान लगाने की जरूरत है कि अब जबकि इस क्षेत्र में सिंगल ब्रांड के लिए सीधे 100% विदेशी निवेश की इजाजत दे दी गयी है तो इससे किसको फायदा होगा?

गौरतलब है कि तब अमरीकी सीनेट में वॉलमार्ट ने यह जानकारी दी थी। इसके बाद भारत में तब का विपक्ष, तब की सरकार पर हमलावर हो गया था तो क्या आज यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वालमार्ट के पास नए सिरे से बताने के लिए बहुत कुछ हो सकता है जो बिलकुल ताजा हो? तब अमरीकी सीनेट में दाखिल अपनी रिपोर्ट में वॉलमार्ट ने कहा था कि उसने भारत में अपने लिए दरवाजे खुलवाने हेतु साल 2008 के बाद से तब तक यानी 2012 तक अमेरिकी कानून निर्माताओं [पढ़ें सासदों] की लॉबिंग पर 25 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी करीब सवा सौ करोड़ रुपये खर्च किए थे। 

इस खबर पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सधी हुई प्रतिक्रिया करते हुए इसे एफडीआई के खिलाफ हो रहे दुष्प्रचार का हिस्सा बताया था और तब का विपक्ष इसे सरकार का सबसे बड़ा झूठ माना था। सवाल है आज वही विपक्ष जो सत्तापक्ष बन गया है इसे क्या मानेगा? वॉलमार्ट दुनिया की सबसे बड़ी रिटेल कंपनी है, जिसके दुनिया भर में 8500 से ज्यादा स्टोर हैं। कंपनी सालाना कारोबार 22 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का करती है। उसे भारत में सिंगल ब्रांड के तौर पर 100% के साथ आना था क्योंकि उसे मालूम है कि भारत दुनिया का वह देश है जहां दुनिया में दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा व्यवस्थित या कहें क्रयशक्ति से भरपूर उपभोक्ता है, जिनकी संख्या समूचे यूरोप के साझे उपभोक्ताओं से भी ज्यादा है।

इसीलिए वालमार्ट की अगुवाई में दुनिया की तमाम विदेशी रिटेल कम्पनियां कई सालों से विदेशी निवेश को 100% करवाने के लिए लामबंद थीं। वैसे वॉलमार्ट पर जब लाबिंग के आरोप लगे थे तो यह कोई पहला मौका नहीं था। अमरीका में इस खुलासे के 20 दिन पहले ही भारत में भी मीडिया में ऐसी खबरें सामने आयी थीं कि वॉलमार्ट ने भारत में स्टोर खोलने के लिए जमकर पैसे बांटे हैं। यहाँ तक कि तब  मामला सामने आने के बाद भारत में कारोबार कर रही भारती-वॉलमार्ट ने अपने सीएफओ और लीगल टीम को सस्पेंड कर उन पर जांच भी बिठाई थी। क्योंकि  आरोप था कि यहाँ भी सीएफओ और लीगल टीम ने भारत में कारोबार के लिए सरकारी अफसरों को रिश्वत दी थी। लेकिन यह खबर मीडिया में सवाल के रूप में आयी तो थी लेकिन फिर जवाब लाये बिना ही गायब क्यों हो गयी पता नहीं। 

बहरहाल देखने वाली बात यह भी होगी कि तब रिटेलिंग के क्षेत्र में विदेशी निवेश को लेकर मायावती और मुलायम ने सड़कों पर उतरने की खूब बातें की थीं और ममता बनर्जी ने तो अपनी आक्रामकता और सरकार से तुरंत समर्थन वापस ले लेने की धमकी से ही 100% ऍफ़डीआई रुकवाई थी। डी राजा जैसे वामपंथियों ने भी तब सब कुछ भूलकर ममता बनर्जी के साथ एकजुटता दिखाई थी। सवाल है क्या अब भी ये सब मानते हैं कि रिटेलिंग के क्षेत्र में विदेशी कम्पनियों के आने से नुक्कड़ के अपने देशी दुकानदार परेशानी में आयेंगे ? क्या अब भी ये मानेंगे कि खेती के बाद दुकान जो देश का सबसे बड़ा रोजगार क्षेत्र है उसे विदेशी कम्पनियों की दैत्याकार पूँजी हड़प जायेगी ?

https://www.youtube.com/watch?v=4UfN0TS_niI&feature=youtu.be

(लेखक मीडिया एवं शोध संस्थान इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में वरिष्ठ संपादक हैं।)






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