मोदी जी, हत्यारे को नहीं होता है श्रद्धांजलि देने का हक!

ख़बरों के बीच , , शुक्रवार , 12-10-2018


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महेंद्र मिश्र

क्या एक हत्यारे को उस शख्स को श्रद्धांजलि देने का हक होता है जिसकी उसने हत्या की हो? अगर इस सवाल का उत्तर हां है तब कोई बात नहीं। लेकिन अगर नहीं है तो पीएम मोदी द्वारा मृत प्रोफेसर जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी सानंद को दी गयी श्रद्धांजलि बेमानी होने के साथ ही सवालों के घेरे में आ जाती है। प्रोफेसर अग्रवाल की मौत कुदरती नहीं बल्कि एक विशुद्ध हत्या है। और उसके लिए सीधे तौर पर केंद्र की मोदी सरकार और स्थानीय पुलिस-प्रशासन जिम्मेदार है। 

अग्रवाल ने तीन-तीन पत्र पीएम मोदी को लिखे थे। लेकिन उन्होंने किसी एक पत्र का भी जवाब देना जरूरी नहीं समझा। रोजाना अंट-शंट लोगों को जन्मदिन की बधाइयां देने वाले मोदी को ये जरूर बताना चाहिए कि एक 87 साल का बुजुर्ग जो 111 दिनों से अनशन पर बैठा था उसके पत्रों का उन्होंने जवाब क्यों नहीं दिया। अनशन से पूर्व पहला पत्र उन्होंने 24 फरवरी 2018 को लिखा था। दूसरा 13 जून 2018 को। और तीसरा 23 जून को अनशन पर बैठने के दूसरे दिन लिखा। लेकिन इनमें से किसी भी पत्र का मोदी ने संज्ञान नहीं लिया।

विडंबना देखिए 2012 में जब प्रोफेसर अग्रवाल अनशन पर बैठे थे तो गुजरात के मुख्यमंत्री रहते मोदी ने उनके पक्ष में ट्वीट किया था और केंद्र सरकार से उनकी मांगों पर गौर करने की अपील की थी। लेकिन अब जब वो खुद पीएम बन गए और उन सभी मांगों पर विचार करने में सक्षम थे तब उन्होंने पूरे मामले की आपराधिक अनदेखी की। और अब प्रो. अग्रवाल का निधन होने पर ट्वीट के जरिये श्रद्धांजलि देकर वो अपनी जवाबदेही पूरी कर लेना चाहते हैं। शायद जवाब के लिए वो उनकी मौत का ही इंतजार कर रहे थे।  

ये कोई ऐसा मामला नहीं था जिससे पीएम का या फिर केंद्र सरकार का कोई लेना-देना नहीं हो। कहने के लिए ही सही उनकी मांगें केंद्र की “प्राथमिकता सूची” में भी शामिल रही हैं। जिस गंगा की सफाई के लिए प्रो. अग्रवाल आंदोलनरत थे उसके लिए केंद्र ने बाकायदा अलग से मंत्रालय बना रखा है। लेकिन तीन सालों के बाद संबंधित मंत्री का इस्तीफा और उस मद में आवंटित बजट का हुआ न्यूनतम खर्च बता देता है कि सरकार को गंगा की सफाई से कुछ लेना-देना नहीं है। दरअसल सफाई, अलग से मंत्रालय और गंगापुत्र का तमगा सब कुछ जुमला था।

आखिर क्या मांग कर रहे थे प्रोफेसर अग्रवाल। उनका कहना था कि गंगा के लिए प्रस्तावित तमाम हाईड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्टों पर रोक लगाई जाए। अग्रवाल गंगा के किनारे बालू खनन पर पूरी तरह से प्रतिबंध चाहते थे। और गंगा की सफाई पर निगरानी के लिए एक कौंसिल का गठन उनकी मांगों में शामिल था। आखिर इसमें कौन ऐसी मांग थी जिसको मानने से पहाड़ टूट पड़ता। या फिर केंद्र सरकार की कुर्सी के पाये हिलने लगते। वैसे भी समझौता वार्ताओं में दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर विचार कर झुकते हैं।

अगर कोई सरकार सचमुच में गंगा की सफाई के प्रति प्रतिबद्ध है तो उसे इन बुनियादी मांगों को पूरा करना ही होगा। ऐसे में अगर मोदी खुद को गंगा पुत्र कहते हैं और अलग से उसकी सफाई के लिए मंत्रालय बना रखे हैं। बावजूद इसके इन मांगों से सहमत नहीं हैं तो इसका मतलब है कि वो न केवल गंगा के साथ विश्वासघात कर रहे हैं बल्कि देश की भोली-भाली जनता को भी छलने का काम कर रहे हैं। मोदी के इस रास्ते से गंगा सफाई का प्रोजेक्ट गंगा से कुछ कूड़े-कचरे निकालने और मंत्रियों के फोटो सेशन के सालाना आयोजन से आगे नहीं बढ़ सकेगा।

दरअसल गंगा की सफाई का कार्यक्रम एक साइंटिफिक प्रोजेक्ट है। आस्था के इस केंद्र में भी विज्ञान और मस्तिष्क का इस्तेमाल उसकी सफलता की बुनियादी शर्त है। लेकिन यहां एक भगवाधारी को मंत्रालय देकर सारी जिम्मेदारियों से इतिश्री समझ ली गयी थी। उसके नतीजे वही निकले जिसकी आशंका थी। तीन साल और टांय-टांय फिस्स। और अब मंत्रालय एक ऐसे मंत्री के हवाले कर दिया गया है जो गंगा को कारपोरेट के मुनाफे के हिस्से के तौर पर देखता है। और तमाम किस्म के वाटर प्रोजेक्ट उसकी पाइपलाइन में हैं। अनायास नहीं 111 दिन के अनशन के दौरान निर्मल और अविरल गंगा के अगुआ मंत्री नितिन गडकरी एक बार भी प्रो. अग्रवाल से मिलना जरूरी नहीं समझे।

प्रोफेसर अग्रवाल पहली बार कोई अनशन पर नहीं बैठे थे इसके पहले वो 2008, 2009, 2010, 2012 और 2013 यानी पांच बार अनशन कर चुके थे। तब कभी स्वामी की जान नहीं गयी। यहां तक कि 111 दिनों तक अस्पताल से बाहर रहने के दौरान भी वो जिंदा रहे। लेकिन जैसे ही पुलिस ने उन्हें जबरन अस्पताल में डाला अगले ही दिन उनकी मौत हो गयी। ये शुद्ध रूप से राज्य प्रायोजित हत्या है। और इसके लिए राज्य, केंद्र और स्थानीय पुलिस प्रशासन सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। 








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