मोदी के खिलाफ मुकदमा चलाने के पर्याप्त कारण: गुजरात दंगा मामले में एमिकस क्यूरी ने दी थी रिपोर्ट

ख़ास रपट , नई दिल्ली, बुधवार , 14-11-2018


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जनचौक ब्यूरो

(गुजरात दंगा मामले में पीएम मोदी के खिलाफ मुकदमा चलाने के मसले पर दायर जकिया जाफरी की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर ली है। उसके साथ ही मामले में एमिकस क्यूरी रहे राजू रामचंद्रन की रिपोर्ट एक बार फिर प्रासंगिक हो गयी है। उस रिपोर्ट की कुछ बुनियादी बातों को यहां दिया जा रहा है-संपादक)

नई दिल्ली। गुजरात दंगा मामले में गठित एसआईटी जांच में सुप्रीम कोर्ट के एमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि गुजरात के तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विभिन्न समूहों के बीच वैमनष्य बढ़ाने समेत कई मामलों में मुकदमा चलाया जा सकता है।

एसआईटी की रिपोर्टों के साथ एमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन की दो रिपोर्टें भी शामिल थीं। इन रिपोर्टों को उन्होंने जनवरी और जुलाई 2011 में सुप्रीम कोर्ट में पेश किया था। गौरतलब है कि एसआईटी का गठन गुजरात दंगों के दौरान सरकार द्वारा अपनी भूमिका न निभाए जाने की शिकायत की जांच के लिए किया गया था। इस दंगे में 1000 से ज्यादा लोगों की मौत हुयी थी।

अपनी रिपोर्ट में रामचंद्रन आरके राघवन के नेतृत्व वाली एसआईटी के इस निष्कर्ष से पूरी तरह से असहमत थे कि आईपीएस अफसर संजीव भट्ट 27 फरवरी, 2002 को गोधरा नरसंहार के बाद मुख्यमंत्री के निवास पर हुई गुजरात के पुलिस अधिकारियों की एक देर रात बैठक में नहीं शरीक हुए थे।

गौरतलब है कि भट्ट ने दावा किया था कि- सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट और एसआईटी और एमिकस क्यूरी को दिए बयान में- वो उस बैठक में मौजूद थे जहां मोदी ने कथित रुप से कहा था कि हिंदुओं को मुसलमानों से बदला लेने के लिए हिंसा करने की इजाजत दी जानी चाहिए।

रामचंद्रन ने कहा कि ट्रायल स्टेज से पहले भट्ट के दावे पर अविश्वास करने का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला। लिहाजा उनके दावे का केवल कोर्ट में ही परीक्षण किया जा सकता है। उनका कहना था कि “ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि इस चरण में श्री भट्ट पर अविश्वास किया जाना चाहिए और श्री मोदी के खिलाफ कोई कार्रवाई आगे नहीं बढ़ायी जानी चाहिए।”

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि एमिकस क्यूरी के मुताबिक मोदी का कथित बयान कानून के तहत अपने-आप में एक अपराध है और उनके खिलाफ आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि “मेरे विचार में इस प्राथमिक स्टेज पर मोदी के खिलाफ जो मामले बनाए जा सकते हैं उनमें 153 बी (1)(ए) और (बी)(समुदायों के बीच शत्रुता बढ़ाने वाले बयान), 153 बी (1) (सी) (राष्ट्रीय हितों के प्रति पूर्वाग्रह के दावे और इल्जाम), 166 (क्षति पहुंचाने की मंशा से कानून के निर्देशों की अवज्ञा करने वाला सरकारी नौकर) और 502 (2) (सार्वजनिक रूप से नुकसान पहुंचाने वाले बयान)  की धाराएं शामिल हैं।”

“दि हिंदू” की रिपोर्ट के मुताबिक अपनी रिपोर्ट में एसआईटी ने भट्ट को विभिन्न आधारों पर अविश्वसनीय गवाह बताकर खारिज कर दिया था। जिनमें वो 9 साल तक चुप रहे थे; उनके पास सरकार के खिलाफ जाने का एक स्वार्थ था; जिस बात को मोदी कहे थे भट्ट की ठीक वही भाषा नहीं थी; उन्होंने गवाहों को सिखाने-पढ़ाने की कोशिश की थी; और मोदी द्वारा 28 फरवरी, 2002 की सुबह 10.30 बजे बुलाई गयी बैठक में उनके शामिल होने का दावा उनके कॉल रिकार्ड्स से मेल नहीं खाता है जो दिखाता है कि वो उस समय अहमदाबाद में थे (बैठक गांधीनगर में हुई थी) आदि बातें शामिल थीं। (भट्ट ने “दि हिंदू” को बताया था कि 28 फरवरी, 2002 को दो बैठकें हुई थीं एक दोपहर से पहले और दूसरी दोपहर के बाद)।  

इसके साथ ही एसआईटी ने कहा था कि 27 फरवरी की बैठक में भट्ट की मौजूदगी की दूसरे शामिल होने वालों ने भी नहीं पुष्टि की।

अपनी आखिरी रिपोर्ट में एमिकस क्यूरी ने कहा कि “एक गवाह पर विश्वास करने या न करने का चरण मुकदमा शुरू होने के बाद आता है दूसरे शब्दों में इस पर विचार करने के लिए सारे सबूत कोर्ट के सामने पेश किए जाते हैं। इस चरण में जब तक कि कोई पुख्ता साक्ष्य नहीं मिल जाए तब तक श्री भट्ट पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है।”

एमिकस क्यूरी ने आगे कहा कि “श्री भट्ट बैठक में मौजूद थे या नहीं ये सवाल.....और श्री मोदी ने इस तरह का कोई एक बयान दिया था या नहीं....को केवल न्यायपालिका ही तय कर सकती है।”

रामचंद्रन के विचार में श्रीमती जाफरी की शिकायत में दो विशिष्ट किस्म की शिकायतें बहुत गंभीर थीं। पहली, 27 फरवरी 2002 की बैठक में पुलिस अधिकारियों को मोदी के निर्देश और दूसरी मुस्लिम विरोधी हिंसा के दौरान राज्य और अहमदाबाद सिटी पुलिस कंट्रोल रूम में दो कैबिनेट मंत्रियों की तैनाती शामिल थी।

भट्ट की गवाही को खारिज करने के एसआईटी के आधार का एमिकस ने विरोध किया। उन्होंने कहा कि “मेरे विचार में ऊपर दी गयी पृष्ठभूमि के बावजूद ऐसा नहीं लगता है कि एक सेवारत पुलिस अफसर बगैर किसी ठोस आधार के राज्य के मुख्यमंत्री मोदी के खिलाफ इतना गंभीर आरोप लगाएगा। इस तरह का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है जिससे ये स्थापित हो सके कि श्री भट्ट 27.02.2002 की बैठक में मौजूद नहीं थे।”

रामचंद्रन ने इस बात को चिन्हित किया कि एसआईटी ने वरिष्ठ अफसरों के शब्दों पर भरोसा किया जबकि अपनी प्राथमिक रिपोर्ट में उसने कहा था कि उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। एसआईटी के मुताबिक कुछ अफसर बहुत पहले रिटायर हो गए और वो याददाश्त खोने का दावा कर रहे थे जैसा कि वो किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते थे। कुछ दूसरों को रिटायरमेंट के बाद अच्छे खासे लाभ मिले। जिससे वो “मौजूदा मुख्यमंत्री के प्रति कृतज्ञ थे लिहाजा उनकी गवाही पर विश्वास नहीं किया जा सकता है।” 

उसके बाद रामचंद्रन इस बात पर आते हैं कि उनके विचार से भट्ट क्यों उस महत्वपूर्ण बैठक में भाग लिए रहे होंगे। उस समय के दो वरिष्ठ इंटेलिजेंस अफसर आईबी चीफ जीसी रैगर और डिप्टी कमिश्नर (पोलिटिकल एंड कम्यूनल) पीसी उपाध्याय दोनों 27 फरवरी 2002 को छुट्टी पर थे। रैगर ने कहा था कि मोदी द्वारा बुलायी गयी पिछली दो बैठकों में भट्ट उनके साथ थे। हालांकि वो फाइल लेकर बाहर खड़े थे। “इसलिए ये बिल्कुल संभव है कि चीफ मिनिस्टर के आवास पर 27.02.2002 को बुलाई गयी बैठक में भट्ट को शामिल होने का निर्देश दिया गया हो। एसआईटी को दिए गए भट्ट के बयान और उनके फोन कॉल रिकार्ड्स में कोई विरोधाभास नहीं है। बैठक के महत्व और इमरजेंसी को देखते हुए तुलनात्मक रूप से भट्ट का जूनियर होना बैठक में शामिल होने के रास्ते में बाधा नहीं बनता है....संदर्भ एक इमरजेंसी बैठक है जिसे एक खतरनाक स्थिति से निपटने के लिए एक छोटी नोटिस पर बुलाया गया है....” 

अपनी प्राथमिक रिपोर्ट में एसआईटी ने दो मंत्रियों आईके जडेजा और अशोक भट्ट की कंट्रोल रूम में तैनाती की बात को खारिज कर दिया था। उसके मुताबिक “इस बात की पूरी संभावना है कि उसको (उनकी मौजूदगी को) उनकी (मोदी की) मौन सहमति रही हो। फिर भी जांच टीम ने पाया कि श्री भट्ट (जिनका उस समय निधन हो गया था) की मौजूदगी को स्थापित नहीं किया जा सका। एसआईटी इस नतीजे पर भी पहुंची कि मंत्री/मंत्रीगण किसी भी रूप में पुलिस के कामों में दखलंदाजी नहीं किए थे।”

एमिकस ने मंत्री अशोक भट्ट की मौजूदगी को लेकर एसआईटी के बदले हुए वर्जन का विरोध किया और इस बात को चिन्हित किया कि एसआईटी की पहली रिपोर्ट खुद भट्ट के बयान पर आधारित थी जिसमें उन्होंने 28 फरवरी 2002 को कंट्रोल रूम का दौरा करने की बात को स्वीकार किया था।

साथ ही उन्होंने कहा कि मंत्री की कंट्रोल रुम में मौजूदगी ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को प्रभावित करने के लिए काफी है। और ट्रायल के दौरान इस पहलू से परीक्षण बहुत जरूरी है।

रामचंद्रन ने कहा था कि हालांकि इस बात के साक्ष्य मौजूद नहीं हैं कि दोनों मंत्री मोदी के 27 फरवरी 2002 के कथित मुस्लिम विरोधी निर्देशों पर काम किए थे। लेकिन “पुलिस कंट्रोल रूम में दो राजनीतिक शख्सियतों की मौजूदगी जिनका गृह विभाग से कोई रिश्ता नहीं है, इस बात का परिस्थिति जन्य प्रमाण है कि मुख्यमंत्री उन्हें निर्देश दे रहा है या फिर उसकी इजाजत दिए हुए है। जैसा कि पहले ही एसआईटी चीफ ने खुद ही इस बात को पाया है कि कंट्रोल रूप में उनकी मौजूदगी के पीछे कम से कम मुख्यमंत्री की मौन सहमति थी।”         

 








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