खून के आंसू रो रहे हैं गुजरात के किसान,पढ़िए सूबे में जमीन अधिग्रहण की हकीकत

विशेष , अहमदाबाद , बुधवार , 06-12-2017


gujrat-land-acquisition-farmer-modi-adani-ambani-act

महेंद्र मिश्र

देश में गुजरात की छवि एक स्वर्ग सरीखी रही है। एक ऐसा सूबा जिसमें कारपोरेट फल-फूल रहा है। किसान भी खुश हैं। अधिग्रहण की स्थिति में जमीनों का उन्हें मनचाहा मुआवजा मिल रहा है। लेकिन जमीनी हालात इस हकीकत से बिल्कुल जुदा हैं। सरदार को सिर पर बैठाने वाला ये सूबा उनके सपनों के साथ विश्वासघात कर रहा है। जिन किसानों के लिए पटेल ने अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी वही आज सबसे ज्यादा प्रताड़ित हैं। आलम ये है कि सरकार मुआवजे के नाम पर किसानों को एक ढेला भी देने के लिए तैयार नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरे देश में जमीन अधिग्रहण की सफलता की जो कहानी बयान करते रहे हैं वो बिल्कुल झूठी है। सच ये है कि यहां के किसान खून के आंसू रो रहे हैं। 

विकसित प्लॉट देने के नाम पर किसानों से उनकी जमीन छीन ली जाती है और बदले में एक पैसा भी नहीं दिया जाता है। इस प्रक्रिया में उनकी जमीन का रकबा भी कम हो जाता है। वो चौथाई-आधी या कुछ प्लाटों तक सीमित हो जाता है। यहां भी मोदी जी सपनों के गुब्बारे से ही किसानों को संतुष्ट कर देना चाहते थे। और इस काम को तब की मोदी सरकार ने शातिराना तरीके से अंजाम दिया था। इसको करने के लिए सरकार ने दो कानूनों का सहारा लिया था। इसमें 2009 में विधानसभा में पारित स्पेशल इंडस्ट्रियल रीजन एक्ट  और दूसरा गुजरात अर्बन डेबलपमेंट एंड टॉउन प्लानिंग एक्ट 1976 शामिल हैं। वैसे 1976 का ये एक्ट केवल म्यूनिसिपल या फिर उनके विस्तारित क्षेत्रों पर लागू होता है। लेकिन सरकार इसे नये अधिग्रहीत इलाकों पर भी लागू कर मनचाहे और मनमाने तरीके से जमीन हासिल कर लेती है। 

एक उदाहरण के मुताबिक किसी भी इलाके के 10 से 15 गांवों समेत ग्राम सभाओं की जमीन को इस कानून के तहत नोटीफाई कर दिया जाता है। जिसे एसआईआर यानी स्पेशल इंडस्ट्रियल रीजन के तौर पर जाना जाता है। फिर उस इलाके के लिए एक टाउन प्लानिंग आफिसर (टीपीओ) तैनात कर दिया जाता है। जो पूरे इलाके की प्लानिंग करने के साथ ही उसके मुताबिक आधारभूत ढांचे का निर्माण करता है। जिसमें सड़क से लेकर बिजली और दूसरी बुनियादी व्यवस्थाएं शामिल होती हैं। इस प्रक्रिया में किसानों की जमीन का तकरीबन आधा हिस्सा सरकार अपने कब्जे में ले लेती है। और फिर आधा भाग ही उन्हें प्लाटिंग करके किसी हिस्से में दे दिया जाता है। इस कड़ी में न तो उन्हें एक पैसा मुआवजा दिया जाता है और न ही किसी तरह का कोई दूसरा लाभ। ये अहसान ऊपर से जताया जाता है कि किसानों को विकसित कर जमीनें दी गयी हैं। क्षेत्र में पड़ने वाले गांवों को उनसे 100 मीटर की दूरी बनाकर चारों तरफ से घेर दिया जाता है। इसमें मुआवजा केवल कुछ खास स्थितियों में ही मिलता है। पहला क्षेत्र में स्थित किसी के निर्मित ढांचे के टूटने पर। या फिर से बुनियादी ढांचे के संयोजन की स्थिति में रास्ते में पड़ने वाले खेतों पर। लेकिन सरकार की योजना किसानों को रास नहीं आयी। लिहाजा इसका हर स्तर पर विरोध शुरू हो गया। इसके तहत सरकार ने 4 एसआईआर बनाने की घोषणा की थी। जिसमें से किसी में भी काम नहीं शुरू हो पाया। और किसानों के विरोध के चलते ओलपैड, मंडल बैचराजी और हजीरा को सरकार को रद्द करना पड़ा। जबकि चौथे एसआईआर धोलेरा का मामला कोर्ट में चला गया और हाईकोर्ट ने उस पर स्थगनादेश दे दिया है।

इसके अलावा सरकार ने 57 सेज घोषित किए थे जिनमें ये प्रावधान था कि 70 फीसदी जमीन कारपोरेट खरीदेगा और उसमें 30 फीसदी हिस्सा सरकार उन्हें मुहैया कराएगी। लेकिन इसके तहत भी सरकार जमीनें अधिग्रहीत करने में नाकाम रही है। क्योंकि कारपोरेट अपना पैसा लगाने के लिए तैयार नहीं है। उसे मुफ्त जमीनें हासिल करने की लत जो पड़ गयी है। या फिर वो चाहता है कि सरकार उसे औने-पौने दामों पर जमीन मुहैया करा दे। इसी सोच और दिशा के तहत सरकार ने एक दूसरा रास्ता निकाल लिया है जिसमें वह चारागाह और बेकार पड़ी जमीनों को कारपोरेट के हवाले कर देती है। इस तरह से उनकी जरूरत के एक बड़े हिस्से की पूर्ति हो जाती है बाकी वो उन्हें किसानों से सौदेबाजी कर खरीदने की सलाह देता है।

अभी तक ज्यादातर जमीनों का इसी तरीके से अधिग्रहण किया जा रहा है। इस रास्ते का सबसे ज्यादा फायदा सरकार के चहेते उद्योगपति उठा रहे हैं। उनमें सूबे में अडानी, रिलायंस और एस्सार का नाम सबसे आगे है। जमीन के मामले में अडानी की पांचों अंगुलियां घी में और सिर कड़ाही में है। कच्छ में समुद्र के किनारे की तकरीबन 15 हजार एकड़ जमीन उनके हवाले कर दी गयी है। साथ ही उसी इलाके के 14 गांवों के चारागाह की जमीन भी 1 से लेकर 25 रुपये प्रति एकड़ की कीमत पर उनके नाम कर दी गयी है। हालांकि इलाके के किसान इसका विरोध कर रहे हैं और यही वजह है कि अडानी को अभी चारागाह की जमीनों पर कब्जा नहीं मिल पाया है। इसके अलावा रिलायंस और एस्सार को भावनगर में इसी तरह से भारी पैमाने पर जमीन दी गयी है। विरोध का ही नतीजा है कि सरकार को निरमा प्लांट के जमीन अधिग्रहण को रद्द करना पड़ा और अमेरिका के सहयोग से मिठी विरदी में प्रस्तावित नाभिकीय संयंत्र नहीं लग सका और हारकर अब अमेरिकी कंपनी को आंध्र प्रदेश का रुख करना पड़ा है।

इस बीच सरकार ने केंद्र से यूपीए के शासन के दौरान पारित जमीन अधिग्रहण के कानून में परिवर्तन कर उसे नखदंत विहीन बना दिया है। इसमें से सहमति के क्लाज को हटाने के साथ ही सामाजिक मूल्यांकन के अनुच्छेद को भी कानून से अलग कर दिया गया है। नये कानून सरकार भले पास कर दे रही है लेकिन उन्हें लागू करने में उसे पसीने छूट जा रहे हैं। ऐसे में अगर उसे किसी तरह की जमीन की अर्जेंसी है तो वो जीआईडीसी के तहत अधिग्रहण कर रही है जिसमें किसानों के साथ सौदा कर जमीन को अधिग्रहीत करने का मामला प्रभावी होता है। 






Leave your comment