गुजराती अस्मिता का नारा खतरनाक है

गुजरात की जंग , , सोमवार , 04-12-2017


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अनिल सिन्हा

गुजरात में भाजपा का अभियान पटरी से उतर चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस गुजराती अस्मिता का नारा दे रहे हैं वह यह देश की राजनीति को पीछे की ओर ले जाने वाला है। यही नहीं, यह देश के पिछड़े राज्यों, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के लिए निकट भविष्य में दुखदायी स्थिति पैदा करने वाला है। हिंदी पट्टी के लोग रोजगार के लिए बड़ी संख्या में गुजरात पलायन करते हैं। महाराष्ट्र में शिव सेना के अस्मिता आंदोलन के बाद जिन राज्यों में लोग जाना पसंद करते हैं उसमें यह भी एक राज्य है।

प्रधानमंत्री का अस्मितावाद शिव सेना वाली राजनीति को जन्म दे सकता है। मजहब के आधार पर पहले से बंटे गुजरात में अस्मिता का यह कार्ड क्षेत्रीयतावाद को लाने में मदद करेगा। वहां नौकरियों में आरक्षण का मुद्दा तो पहले से ही जोर पकड़े हैं। इस बारे में कहने की जरूरत नहीं है कि राहुल गांधी से चुनावी युद्ध लड़ने के लिए प्रधानमंत्री जिस भाषा का इस्तेमाल वह कर रहे हैं वह शोभनीय नहीं है।

साथ ही साथ, वह एक ऐसी कथा का निर्माण कर रहे हैं जो उत्तर प्रदेश के विकास में मदद करने के बदले वहां के लोगों के लिए दूसरे राज्यों का दरवाजा भी बंद कराएगा। 

क्या किसी राज्य के पिछड़ेपन को इस तरह की हल्की और तथ्यहीन भाषणबाजी के जरिए समझा और दूर किया जा सकता है? केंद्र में तीन साल से ज्यादा पुरानी हो चुकी उनकी सरकार ने उत्तर प्रदेश के विकास के लिए कौन सी रूपरेखा तैयार की है?

आठ महीने पुरानी योगी अदित्यनाथ की सरकार ने भी प्रगति की ओर ले जाने वाले कामों का कोई संकेत नहीं दिया है। मुख्यमंत्री के गृह नगर में बच्चों की लगातार मौत की घटना का उनकी सरकार पर कितना असर पड़ा यह बजट में स्वास्थ्य के लिए होने वाले खर्च पर किए गए प्रावधान से समझा जा सकता है।

उनकी प्राथमिकता क्या है इसका अंदाजा उप्र में चल रहे कार्यक्रमों से लगाया जा सकता है। इसमें रोजगार पैदा करने वाले या सामाजिक सुरक्षा पर कोई जोर नहीं है। जब केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारों का ही ऐसा रवैया है तो अस्मिता का सवाल उठाकर उप्र के लोगों को परेशानी में डालना कहां तक जायज है। 

बेशक, अस्मिता का सहारा लेने की राजनीति के पीछे का चुनाव की चुनौती है। लेकिन प्रधानमंत्री की ओर से इस नारें का आने का मतलब यह है कि राज्यों के पिछड़ेपन के बारे में केंद्र सरकार के पास कोई गंभीर दृष्टि नहीं है। अन्यथा, प्रधानमंत्री इसकी तह में जाने की कोशिश करते। सच पूछा जाय तो इन राज्यों के पिछड़ेपन के पीछे गहरे आर्थिक कारण हैं। असल में, यह उन आर्थिक नीतियों का परिणाम है जो आजादी के बाद हमने अपनाया। इसके लिए अकेली कांगे्रस जिम्मेदार नहीं है। आजादी के बीस साल बाद, 1967 से ही विपक्षी पाटियां राज्यों में सत्ता में आने लगी थीं, लेकिन उन्होंने वैकल्पिक अर्थनीति का कोई खाका देश के सामने नहीं रखा। नब्बे के दशक के बाद तो कांग्रेस की सत्ता पर पकड़ लगातार ढीली होती गई है। फिलहाल तो 

  • गुजरात समेत कई ऐसे राज्य हैं जहां भाजपा कई सालों से सत्ता में है। इन राज्यों में भी विकास की किसी नई नीति का दर्शन हमें नहीं हुआ है। 
  • इससे तो यही जाहिर होता है कि विकास के ढांचे में कोई बुनियादी खराबी है। इसने देश में हर तरह की असमानता लाई है जिसमें राज्यों के बीच की असमानता शामिल है।
  • आजादी के ठीक बाद की रिपोर्टो से पता चलता है उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे संपन्न और विकसित इलाके का जिस तरह शोषण किया कि वे सदियों के लिए विपन्न हो गए।

 

यहां की कृषि तथा कृषि से जुड़े धंधे नष्ट हो गए। इन इलाकों की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए विकास के अलग ढ़ाचे की जरूरत थी। विकास के जिस माडल को अपनाया गया वह इन पिछड़े राज्यों के लिए सही साबित नहीं हुआ। वे और भी पिछड़ गए। इस माडल ने उन राज्यों को ही आगे बढ़ने में मदद की जहां अंगे्रजी शासन के समय व्यापार और औधोगिक तरक्की हुई थी, गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्य उन्हीं राज्यों में से हैं। 

सच्चाई तो यही है कि गुजरात, महाराष्ट्र तथा दक्षिण के राज्यों में विकास का जो दंभ भाजपा सरकारें भर रही हैं वह भी कांग्रेस की ही देन है। भाजपा जब नब्बे के दशक में गुजरात में सत्ता में आई तो राज्य उद्योग और व्यापार में काफी आगे निकल चुका था। अगर महाराष्ट्र के तत्कालीन सरकारों के बयान पर गौर करें तो उनकी सबसे बड़ी चिंता यही नजर आती है कि उद्योग और व्यापार पड़ोसी राज्य गुजरात की ओर जा रहे हैं। यह दिलचस्प है कि महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों में आज उसी कांग्रेस को विकास का दुश्मन बताया जा रहा है। गुजरात के साथ सौतेलेपन का प्रधानमंत्री का नैरेटिव गलत है। यह तथ्यों पर आधारित नहीं है। 

कांग्रेस नेता राहुल गांधी

गुजराती अस्मिता के अपने नैरटिव को मजबूत करने के लिए प्रधानमंत्री कांग्रेस के अंदरूनी सत्ता- संघर्ष का सहारा ले रहे हैं। वह भी तथ्यों पर खरा नहीं उतरता है। कांग्रेस पर राजनीतिक अगर हम तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रम पर गौर करें तो यह साफ हो जाता है कि -

प्रधानमंत्री पद पर जवाहर लाल नेहरू को बिठाने में सबसे बड़ी भूमिका महात्मा गांधी की थी। उन्होंने ही सरदार वल्लमभाई पटेल को नेहरू को नेता मानने के लिए मनाया था और प्रधानमंत्री की दौड़ से बाहर निकलने के लिए राजी किया था। 

नेहरू को प्रधानमंत्री पद पर बिठाने का श्रेय या दोष किसी को जाता है तो यह गांधी जी को है, यह एक एतिहासिक तथ्य है। इसके लिए नेहरू को गाली देना निरर्थक है। नेहरू को गांधी जी ने क्यों चुना यह भी छिपी हुई बात नहीं है।गांधी जिस तरह का सेकुलर और सभी समुदायों को बराबरी का हक देने वाला देश बनाना चाहते थे उसके लिए सबसे सही आदमी नेहरू ही थे। नेहरू न केवल मुस्लिम लीग नेता मुहम्मद अली जिन्ना से लोहा ले रहे थे, बल्कि हिंदु राष्ट्रवादियों से भी। 

 

  • पटेल के जीवनीकार राजमोहन गांधी की राय में पटेल की उम्र और उनके स्वास्थ्य ने भी उन्हें प्रधानमंत्री पद से दूर किया। उनका कहना है कि नेहरू विश्व भर में   जाने-पहचाने जाते थे।  
  • मोदी नेहरू के प्रधानमंत्री पद पाने को उत्तर प्रदेश और गुजरात की लड़ाई में तब्दील करना चाहते हैं। लेकिन उन्हें ध्यान रखना चाहिए की बीच में गांधी खड़े हैं। 

 

सवाल उठता है कि प्रधानमंत्री इस स्तर पर क्यों उतर आए हैं? निश्चित तौर पर, इसका एकमात्र कारण राहुल गांधी की राजनीति है। उन्होंने गुजरात माडल के विकास की पोल खोल दी। इस सच्चाई को उजागर किया है कि राज्य का आर्थिक विकास सिर्फ एक छोटे वर्ग को लाभ पहुंचाने वाला है। इसने समाज में विषमता पैदा की है। मोदी इस तथ्यात्मक सच्चाई का जबाब नहीं दे सकते। राज्य की बड़ी आबादी कुपोषण, भुखमरी, और बेरोजगारी की मार झेल रही है। 

गुजरात की जनता अगर विकास के मिथक को तोड़ देती है तो यह देश की राजनीति को नया मोड़ दे सकती है। सच्चाई यही है कि राहुल गांधी ने नब्बे की दशक की शुरूआत या उसके भी पहले राजीव गांधी के समय में शुरू हुई नीतियों से अलग आर्थिक नीतियों की वकालत शुरू की है। उन्होंने आर्थिक नीतियों को चुनौती देना शुरू किया है। वह अब विकास-दर को केंद्र में रखकर अपनी बात नहीं कह रहे हैं। वह विश्व बैंक और अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष प्रेरित आर्थिक सुधारों की बात नहीं कर रहे हैं। वह निजी क्षेत्र की जगह सरकारी क्षेत्र के विकास की बात कर रहे हैं। उदारीकरण की नीति के करीब तीन दशकों के इतिहास में कांग्रेस में यह विचारधारात्मक बदलाव पहली बार दिखाई दे रहा है।गुजरात के कांग्रेस नेता अब वहां के खस्ताहाल सरकारी अस्पताल तथा सरकारी स्कूल-कालेजों को ताकत देने की बात कर रहे हैं।राहुल एक तरह से इंदिरा गांधी तथा जवाहरलाल नेहरू की नीतियों की ओर लौट रहे है। हालांकि राहुल गांधी के लिए यह आसान नहीं है क्योंकि उनकी ही पार्टी में ऐसे लोग हैं जो उदारीकरण की नीतियों के प्रबल समर्थक हैं। इसलिए-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की बेचैनी समझ में आती है। उदारीकरण के हथियार को फेंकने के बाद कांग्रेस अब अलग हथियार से लैस है। भाजपा के लिए इस हथियार का मुकाबला करना आसान नहीं है।

यह भी ध्यान में रखने लायक है कि नेहरू और इंदिरा गांधी पर आक्रमण वंशवाद पर आक्रमण नहीं है। यह उन विचारों पर आक्रमण है जो समाजवाद से जुड़े हैं। भारतीय जनता पार्टी और उसकी पूर्ववती जनसंघ पार्टी शुरू से उन विचारों के खिलाफ रही है। कांग्रेस के आर्थिक उदारीकरण नीति अपना लेने के बाद आर्थिक विचारों में उनके आपस के मतभेद मिट गए थे। राहुल ने इस भेद को फिर से गहरा किया है। इसलिए लड़ाई दिलचस्प हो गई है। 

लेकिन इस लड़ाई को लड़ने का प्रधानमंत्री का तरीका में लोगों को क्षेत्रीय स्तर पर बांटने का काम करेगा। गुजरात को अपने हाथ से निकलने नहीं देने की कोशिश में वह उत्तर प्रदेश के गरीब पिछड़ों का रास्ता रोक ही रहे हैं। गुजरात अपने पड़ोसी महाराष्ट्र से इस मायने में जरूर अलग था कि वहां कोई क्षेत्रीयतावादी राजनीति नहीं चल रही थी। धार्मिक आधार पर बंटे गुजरातियों के हाथ में कट्टरता का एक और हथियार थमा देना मुनासिब नहीं है। उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए गुजरात का दरवाजा बंद कराना तो प्रधानमंत्री के लिए और भी गैर-मुनासिब है क्योंकि वहां के लोगों ने उन्हें न केवल संसद में भेजा है, बल्कि लोक सभा और विधानसभा विधानसभा चुनावों में भी भारी जीत दी है।                                                                              (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)     

 






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??????? :: - 12-06-2017
बहुत सुंदर और वस्तुनिष्ठ द्रष्टि से लिखा गया आलेख। साधुवाद।