विपक्षी खेमे के लिए खतरे की घंटी है राज्यसभा उपसभापति चुनाव में एनडीए की जीत

राजनीति , , बृहस्पतिवार , 09-08-2018


harivansh-rajyasabha-election-nda-upa-aap-bjd-modi-congress

जनचौक ब्यूरो

राज्यसभा के उपसभापति का चुनाव जीतने के साथ ही पीएम मोदी ने दिल्ली का आखिरी किला भी जीत लिया। सत्ता में आने के बाद से ही राज्यसभा मोदी के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा बनी हुई थी। उच्च सदन विपक्ष का सदन बन गया था। जहां उसकी सत्ता कायम थी। जिस भी किसी मामले में वो निचले सदन यानी लोकसभा में हारता था उसकी भरपाई वो राज्यसभा से कर लेता था। लिहाजा सत्ता पक्ष कभी चाहकर भी अपनी मनमानी नहीं कर सका। हालांकि कई विधेयक उसने मनी बिल के चोर दरवाजे से जरूर पास कराए। लेकिन किसी ऐसे बड़े विधेयक को सदन में लाने की उसकी हिम्मत नहीं पड़ी जिससे लोकतंत्र, देश और संविधान का बड़ा नुकसान हो सकता था। कहा तो यहां तक जा रहा है कि बीजेपी संविधान को बदलने के मंसूबे पाले हुए है। और ये बात किसी से छुपी भी नहीं है। खुद उसके मंत्री से लेकर संघ के आला नेता इस पर खुलकर बोलते रहे हैं। लेकिन इस रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा राज्यसभा का संख्या बल ही बना हुआ था।

आज का दिन सत्ता पक्ष के लिए किसी ऐतिहासिक दिन से कम नहीं है। जब उसने विपक्ष के जबड़े से जीत को छीन लिया है। 2019 के आम चुनाव से पहले मिली इस जीत ने उसके आत्मविश्वास को नई ऊंंचाई दे दी है। हालांकि परंपरा के मुताबिक उपसभापति का पद विपक्ष को जाता है। और सत्ता पक्ष उसमें कोई रोड़ा भी नहीं अटकाता था। लेकिन ये मोदी सरकार है जो एक इंच जमीन भी विपक्ष को देने के लिए राजी नहीं दिखती है। और उसके लिए वो हमेशा किसी भी महाभारत के लिए तैयार रहती है।

इस चुनाव के कई दूरगामी संकेत हैं। जिन्हें राजनीतिक पंडितों और खासकर विपक्ष के साथ हमदर्दी रखने वालों को जरूर समझना चाहिए। क्योंकि अगर कोई अपनी कमजोरी नहीं समझ पाता है तो फिर उसको दूर करने का सवाल ही नहीं खड़ा हो पाएगा। वैसे ये चुनाव विपक्ष जीत सकता था लेकिन उसका अपना आलस्य कहिए या फिर रणनीति की नाकामी एक जीती बाजी उसके हाथ से चली गयी।

इसमें कई कमियां बिल्कुल स्पष्ट थीं। जैसे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अगर विपक्षी एकता के लिए प्रतिबद्ध हैं तो वो 'आप' मुखिया अरविंद केजरीवाल से क्यों नहीं बात कर सकते थे। और इसी के उलट अगर 'आप' सचमुच में बीजेपी को बड़ा खतरा मानती है तो वो कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में क्यों नहीं वोट कर सकती थी? उसके लिए अपना व्यक्तिगत अहम प्राथमिक था या फिर देश और जनता की राजनीतिक जरूरत? राजनीति किसी के अहम की तुष्टि के लिए होती है या फिर जनता के हितों को पूरा करने के लिए? इसके साथ ही बीजडी से लेकर टीआरएस तक के साथ क्यों नहीं बातचीत की जा सकती थी? ये बात इसलिए यहां कहना जरूरी है क्योंकि बीजेडी के नेता नवीन पटनायक का कहना था कि सबसे पहले नीतीश ने उनसे संपर्क किया लिहाजा उन्होंने उसी समय वचन दे दिया था।

हालांकि राजनीति में इस तरह की कोई बात होती नहीं। लोग अंतत: अपने राजनीतिक हितों और जरूरतों के हिसाब से ही फैसले लेते हैं। बावजूद इसके अगर विपक्ष उनसे संपर्क में तेजी दिखाता तो कम से कम उन्हें ये कहने का मौका तो नहीं मिल पाता। इसके अलावा विपक्ष के कई सदस्यों का गैरहाजिर होना भी इसी लापरवाही को बताता है। और एक दूर की ही संभावना सही कांग्रेस से इतर अगर किसी दूसरे विपक्षी या सहयोगी दल और नाम पर सहमति बन जाती तो तस्वीर शायद बदल सकती थी। ऐसे में उसके लिए क्यों नहीं कोशिश की गयी? ये तमाम सवाल हैं जिन्हें इस चुनाव ने बहस के लिए छोड़ दिया है।

इस मामले में सत्ता पक्ष की रणनीति बेहद कामयाब रही। उसने सीधे बीजेपी से किसी को उतारने की जगह सहयोगी जेडीयू के सदस्य को अपना प्रत्याशी बनाया। जिसकी तुलनात्मक रूप से एक सेकुलर छवि है। एक ऐसे शख्स को प्रत्याशी बनाया जो न केवल पेशे से पत्रकार था बल्कि उसने सरोकारी पत्रकारिता की है। लिहाजा विपक्षी खेमे के लोगों को उसके पक्ष में सहमत करना सत्ता पक्ष के लिए बहुत आसान हो गया था।

और इन सबसे आगे जो एक बात विपक्ष को समझने और देखने की जरूरत है वो ये कि 2019 में अगर बीजेपी सीटों के मामले में बहुत ज्यादा नहीं घटती है तो तमाम दूसरे दल उसके लिए पलक-पांवड़े बिछाए बैठे होंगे। क्योंकि ऐसे समय पर जबकि सरकार हर मोर्चे पर फेल नजर आ रही है। ऊपर से उसके नेता और कार्यकर्ता मॉब लिंचिंग से लेकर महिला उत्पीड़न तक की घटनाओं की न केवल अगुवाई कर रहे हैं। बल्कि पूरे गर्व के साथ उसकी कहानियां सुना रहे हैं। इन सबके बावजूद अगर विपक्षी खेमे से उसे समर्थन मिल जा रहा है तो आम चुनाव के बाद ऐसा नहीं होगा इसका कोई कारण नजर नहीं आता है।   

 








Tagharivansh rajyasabha election nda congress

Leave your comment