सिर्फ सरकार ही नहीं भारत के अवाम से भी रिश्ता बनाना चाहता है ईरान

देश-दुनिया , , बृहस्पतिवार , 06-12-2018


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रामशरण जोशी

भारत-ईरान सम्बन्ध शताब्दियों पुराने हैं। दोनों देश प्राचीन सभ्यता से जुड़े हुए हैं। लेकिन,आधुनिक परिप्रेक्ष्य में संबंधों की प्रासंगिकता व परख देशों की वर्तमान भू-राजनैतिक-आर्थिक-तकनीकि-रणनीतिक उपयोगिता पर अधिक आधारित हैं, न की प्राचीन विरासत और धार्मिक भावनात्मकता पर। उपयोगिता-आवश्यकता के फ्रेम में संबंधों के समीकरण निर्धारित किये जाते हैं और इनमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। भारत और ईरान भी इसके अपवाद नहीं हैं।दोनों राष्ट्र इस नियम-प्रक्रिया से बंधे हुए हैं। कश्मीर मुद्दे पर ईरान का स्टैंड ज़रूर साफ़ है। वह चाहता है कि भारत और पाकिस्तान, दोनों देश मिल कर इस समस्या का हल निकालें। कश्मीरी अवाम का पक्ष इसमें शामिल किया जा सकता है। लेकिन, वह किसी तीसरे देश की मध्यस्थता के पक्ष में नहीं है। अगर सभी पक्ष चाहेंगे तो वह इसमें अपना सहयोग दे सकता है।

बीते नवम्बर का अंतिम सप्ताह मैंने ईरान की राजधानी तेहरान में एक मीडिया प्रतिनिधि मंडल के सदस्य के रूप में बिताया था। तेहरान प्रवास के दौरान हम लोगों की मुलाक़ात समाज के विभिन्न वर्गों से हुईं, जिनमें शामिल थे नेता, राजनयिक-अधिकारी, बुद्धिजीवी, डाक्यूमेंट्री निर्माता,शिक्षक, व्यापारी और सामान्य नागरिक।

सभी क्षेत्रों ने खुले दिल से हम लोगों का स्वागत किया।भारत की एक चमकदार छवि उनकी आंखों में देखी। दोनों देशों की प्राचीन सभ्यताएं उनके होठों पर थीं; जवाहरलाल नेहरु की पुस्तक ‘भारत की खोज’ में वर्णित ईरान के प्रसंग गूंजे; हिंदी फिल्मों के सितारे राजकपूर, अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ खान आदि उनके अज़ीज़ अदाकार थे और लबों पर थे हिंदी  फिल्मों के गाने। और इन सबसे हट कर महात्मा गांधी,नेहरु, इंदिरा गांधी जैसे भारतीय नेताओं के लिए विशेषआदर भाव ईरानियों के दिलों में देखा। एक सड़क का नाम गांधी जी पर है। बुक शॉप में उन पर पुस्तकें मिलीं,फ़ारसी भाषा  में।

भारत के प्रति  इस प्रेम की छाया में आज के ईरान की अपेक्षाएं हमारे देश से क्या हैं, इसे समझने  की भी ज़रूरत है। भावनाएं अपनी जगह हैं, मगर ठोस यथार्थ की ज़मीन दूसरी है। इसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता।

पिछले चालीस सालों से यह देश अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। ट्रम्प शासन ने और तकलीफें बढ़ा दीं हैं। लेकिन सरकार और अवाम,दोनों का ही मनोबाल गिरने के बजाय, बुलंदी पर है। हर मोर्चे पर मुस्तैदी से दोनों ही डटे हुए हैं। अधिकृत क्षेत्रों का कहना है “ये  प्रतिबन्ध,70 प्रतिशत मनोवैज्ञानिक और 30 वास्तविक हैं। इसीलिए 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से आज़ तक ईरान की संघर्ष और विकास-निर्माण यात्रा आज तक ज़ारी है और भविष्य में भी हेगी। इंशाअल्लाह!”

मानना पड़ेगा, प्रतिबंधों के बावजूद ईरान में विदेशी नियोजन जारी है। फिर भी देश में  बेरोज़गारी है।11 प्रतिशत से अधिक की आबादी बेकारी की मार झेल रही है। लेकिन ईरान के लोग इतना ज़रूर मानते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प पूर्ण रूप से व्यापक प्रतिबंध नहीं लगा सकते क्यों वे स्वयं कॉर्पोरेट के हैं। उन्हें भी परोक्ष रूप से व्यापार चाहिए। पूर्व राष्ट्रपति बुश ने भी पिछले दरवाज़े से तेल का व्यापार जारी रखा था। बुश-परिवार तो तेल व्यापार में लिप्त है जबकि ट्रम्प सभी प्रकार के व्यापार में लिप्त हैं। अमेरिका जानता है कि ईरान पर युद्ध थोपना उसके लिए महंगा पड़ेगा।

इस संघर्ष-निर्माण सफ़र में ईरान चाहता है कि भारत उसका साथ दे। नेता, अधिकारी और बुद्धिजीवी वर्ग चाहते हैं ‘चाबहार बंदरगाह’ का विकास, गैस पाइप लाइन का निर्माण, आयात-निर्यात व सांस्कृतिक आदान प्रदान में वृद्धि, वैज्ञानिक शोध को प्रोत्साहन जैसे कामों में भारत अहम रोल अदा कर सकता है।

हालांकि,अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण व्यापार और मुद्रा अदायगी में अड़चने ज़रूर आ रही हैं। यह देश भारत को बड़ी मात्रा में तेल का निर्यात करता है।

तेहरान में रामशरण जोशी

लेकिन, अब दोनों देशों ने मूल्य अदायगी का मार्ग तलाश लिया है। इससे इस समस्या के हल की उम्मीद है। वैसे ये क्षेत्र स्वीकार करते हैं कि प्रतिबंधों के कारण पेट्रो-केमिकल उद्योग का अपेक्षित विकास नहीं कर सके हैं। भारत इसमें सहयोग कर सकता है। कई और भी परियोजनाएं हैं जिसमें नयी दिल्ली से सहयोग की अपेक्षा  है। भारत-ईरान चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स  भी अधिक सक्रिय हो सकता है। भारत  में जमा  ईरान  का ‘सरप्लस मनी’ अहम् भूमिका निभा सकता है। ईरान का मानना है, “अब गेंद भारत के पाले में है।” 

ईरानी नेताओं और राजनयिकों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र के लोकतंत्रीकरण में दोनों देश परस्पर सहयोग की भूमिका निभा सकते हैं। सिर्फ ‘सुरक्षा परिषद्’ का सदस्य बनने से काम नहीं चलेगा। यदि भारत इसका सदस्य बन भी जाता है तो संघ का चरित्र नहीं बदलेगा। ज़रूरत इस बात की है कि इसके ढांचे में बुनियादी परिवर्तन लाया जाए। इसका व्यापक विस्तार होना चाहिए इसका मुख्यालय न्यूयॉर्क से हट कर गैर-अमेरिकी प्रभाव के देश में होना चाहिए। क्योंकि राष्ट्र संघ अमेरिकी साम्राज्यवाद की कठपुतली बना हुआ है। इस संस्था के माध्यम से वह इस्लामी राष्ट्रों और दूसरे देशों पर अपनी धौंस जमाता रहता है।

आज अफगानिस्तान,सीरिया, फिलिस्तीन और अन्य क्षेत्रों में फैली अशांति का मुख्य कारण अमेरिका और उसकी पिट्ठू सरकारें है। अल क़ायदा, इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक़-सीरिया जैसी आतंकी तंजीमें अमेरिकी गुप्तचर संस्था सीआईए की देन है। ईरान का मानना है कि अमेरिकी ब्लॉक ने भारत और ईरान के संबंधों को गाढ़ा नहीं होने दिया। दुष्प्रचार किया, गलतफमियां पैदा कीं। एकल ध्रुवीय शक्ति तंत्र के अंत और बहु ध्रुवीय शक्ति तंत्र के उदय में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ईरान सहयोग देगा।

ईरान का मानना है की अमेरिका ने उसके खिलाफ “फुल स्केल  सॉफ्ट वार” छेड़ रखा है। अमेरिका और पश्चिमी देशों  का  सांस्कृतिक हमले ज़ारी हैं। मीडिया प्रोपोगंडा  जोरों पर है। दोनों ही देश अमेरिकी ब्लॉक् द्वारा प्रचारित ‘फेक ख़बरों’ के शिकार हैं। भारतीय मीडिया-ईरानी मीडिया संयुक्त रूप से इन हमलों को नाकाम कर सकते हैं।भारत भी इन हमलों का शिकार बना हुआ है। इसलिए दोनों देशों के मीडिया में परस्पर सहयोग बढ़ना चाहिए।

ईरानी अधिकृत क्षेत्रों का कहना है कि वे अपने यहां किसी भी भारत विरोधी प्रचार की इज़ाज़त नहीं देते हैं और न ही भारत के विरुद्ध आतंकवादी गतिविधियों को। ईरान चाहता है जहां दोनों देशों के बीच संपर्क है वहीं “अवाम -से- अवाम”  के रिश्ते भी बढ़ने चाहिए; कलाकारों, लेखकों, मीडियाकर्मियों, बुद्धिजीवियों  जैसे लोगों का आदान-प्रदान होना चाहिए। दोनों देशों पर सार्थक फ़िल्में और डाक्यूमेंट्री  बननें चाहिए। भारत में रहे ईरान के पूर्व राजदूत का का कहना था कि सोवियत संघ के पतन और शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से विभिन्न देशों में अमेरिकी  ‘दादागीरी’ बढ़ गयी है। इसका हर मोर्चे पर मुकाबला ज़रूरी है। इस काम में मीडिया प्रमुख भूमिका निभा सकता है। ईरान अफगानिस्तान की केन्द्रीय सरकार को अपना समर्थन दे रहा है। भारत भी दे रहा है। भारत की तरह ईरान भी  तालिबान के खिलाफ है। वह इसे अपना समर्थन नहीं देता है। सारांश में, ईरानी नेता चाहते हैं कि दोनों देश मिल कर आपसी संबंधों का एक “नया व्याख्यान” रचें।

   (रामशरण जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं और अभी हाल ही में ईरान यात्रा से लौटे हैं।) 

 










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