जियो इंस्टीट्यूट के उत्कृष्टता के तमगे के पीछे एक पूर्व नौकरशाह

पहली ख़बर , नई दिल्ली, बृहस्पतिवार , 12-07-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। एक नये खुलासे में ये बात सामने आयी है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी के नेतृत्व में गठित टीम ही प्रस्तावित जियो इस्टीट्यूट को उत्कृष्टता का दर्जा दिलाने के लिए सरकारी कमेटी के सामने पेश हुई थी।

उस समय उनकी टीम में कंपनी के शिक्षा सलाहकार विनय शील ओबेराय भी मौजूद थे जो पहले मानव विकास मंत्रालय में सचिव रह चुके थे। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी के नेतृत्व में गठित विशेषज्ञ समिति के सामने अपना पक्ष पेश करने वाली 8 सदस्यीय जियो टीम के वो सदस्य थे।

हालांकि अंबानी इतनी तैयारी से गए थे कि उन्होंने अकेले ही कमेटी के सारे सवालों का जवाब दिया। सूत्रों का कहना है कि उन्हें मामले का पूरा ज्ञान था। बताया जा रहा है कि विश्वविद्यालय अंबानी का डीम प्रोजेक्ट है। ऐसा कहा जाता है कि पिछली सरकार को भी उन्होंने इसी तरह का प्रस्ताव दिया था।

ओबेराय उस समय एचआरडी के उच्च शिक्षा विभाग में सचिव थे जब 2016 में वर्ल्ड क्लास इंस्टीट्यूट प्रोग्राम के नाम से इस स्कीम की यूनियन बजट में घोषणा की गयी थी।

हालांकि उत्कृष्ट संस्था के नियमतीकरण की घोषणा सितंबर 2017 में की गयी जब ओबेरॉय रिटायर हो गए थे। ईईसी इस साल के फरवरी में स्थापित की गयी और इसका पहला प्रेजेंटेशन अप्रैल में शुरू हुआ।

भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अफसरों को रिटायर होने के बाद किसी दूसरी व्यवसायिक सेवा में जाने से पहले एक साल का ब्रेक लेना पड़ता है।

1979 बैच के अफसर ओबेरॉय ने इस शर्त को पूरा करने के साथ ही रिलायंस के साथ मार्च 2018 के बाद रिश्ता बनाना शुरू कर दिया था।

इस मसले पर इकोनामिक टाइम्स ने ओबेराय और रिलायंस को सवाल भेजे थे लेकिन उन्होंने उसका कोई जवाब नहीं दिया। 

रिलायंस के अलावा इसमें वेदांता, भारती एयरटेल और क्री फाउंडेशन ने भी आवेदन डाला था। लेकिन जियो का प्रस्ताव सभी पर भारी पड़ा। इस मामले में बताया जा रहा है कि कंपनी की शिक्षा के क्षेत्र में भूमिका काम आयी। जिसमें उसने धीरूभाई अंबानी इंटरनेशनल स्कूल, 13 रिलायंस फाउंडेशन स्कूल और धीरूभाई अंबानी इंस्टीट्यूट ऑफ इनफार्मेशन एंड कम्यूनिकेशन टेक्नालॉजी आदि का हवाला दिया। कमेटी ने इस तरह के 11 ग्रीनफील्ड प्रस्तावों पर विचार किया। लेकिन दूसरे प्रस्तावों में कुछ न कुछ कमियां थीं।

कमेटी ने देखा कि ऐसी कोई उपलब्धि नहीं है जिसके आधार पर ग्रीन फील्ड संस्था का मूल्यांकन किया जा सके। इसलिए उसे केवल उनकी संभावनाओं और कंपनियों द्वारा मुहैया कराई गई सूचनाओं के आधार पर फैसला लेना था। इस पैमाने पर रिलायंस दूसरों से बेहतर साबित हुआ।

लेकिन इसमें सबसे बड़ा सवाल यही है कि अभी जो संस्था पैदा ही नहीं हुई सरकार कैसे उसे उत्कृष्टता का प्रमाण पत्र दे सकती थी। इस पर विचार होना ही तमाम सवालों को जन्म दे देता है। बताया जा रहा है कि पहले रिलायंस इस प्रोजेक्ट को पुणे में स्थापित करना चाहता था लेकिन बाद में इसे नवी मुंबई शिफ्ट कर दिया गया। यानी जो प्रोजेक्ट अभी हवा में है और जमीन पर उतरा भी नहीं है उससे 10 सालों के भीतर ग्लोबल रैंकिंग में आ जाने की आशा की जा रही है।

हालांकि मामले की चौतरफा आलोचना होने के बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सफाई पेश की है। उसका कहना था कि प्रस्तावित विश्वविद्यालय को तीन साल के भीतर अपनी शैक्षणिक गतिविधियों को शुरू कर देना होगा। और कंपनी ने इसके लिए नवी मुंबई के करजाट में 800 एकड़ जमीन भी खरीद रखी है।

गौरतलब है कि तीन श्रेणियां थीं जिसके तहत संस्थाएं आवेदन दे सकते थीं। जिसमें सार्वजनिक संस्थान, पहले से ही स्थापित निजी संस्थान और ग्रीनफील्ड संस्थान जिसका मतलब निजी संस्थाएं जो अभी प्रस्तावित चरण में होने के बावजूद बहुत संभावनामय हैं, शामिल हैं। 29 मौजूदा निजी संस्थानों में और 11 ग्रीन फील्ड श्रेणी में आवेदन आए थे। उच्च शिक्षा सचिव आर सुब्रमण्यम ने बताया कि मणिपाल एकैडमी और बिट्स पिलानी का मौजूदा निजी संस्थाओं की श्रेणियों में चयन हुआ जबकि जियो इंस्टीट्यूट को ग्रीनफील्ड श्रेणी में चुना गया।

एचआरडी मंत्रालय का कहना है कि ग्रीन फील्ड संस्थाओं को अभी केवल लेटर ऑफ इंटेट जारी होगा और उनकी प्रगति संतोषजनक नहीं होती है तो संबंधित कमेटी उसको रद्द करने की संस्तुति कर सकती है। 

 








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