मोदी-शाह का संदेश और उसे भिजवाने के उनके रवैये से जोशी भी आहत

ख़ास रपट , नई दिल्ली, सोमवार , 25-03-2019


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। बीजेपी के बुजुर्ग नेता लाल कृष्ण आडवाणी के बाद मार्गदर्शक मंडल के दूसरे सदस्य और सांसद मुरली मनोहर जोशी के बारे में भी कुछ उसी तरह की खबरें आ रही हैं। वरिष्ठ पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी के मुताबिक बाकायदा संदेश भिजवाकर उनसे कहा गया है कि पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह चाहते हैं कि वह चुनाव में न खड़ा हों।

बीजेपी के अध्यक्ष रहे जोशी को यह संदेश किसी और से नहीं बल्कि पार्टी महासचिव और संघ तथा पार्टी के बीच पुल का काम करने वाले रामलाल से भिजवाया गया। रामलाल ने संघ के इस बेहद करीबी नेता से कहा कि पार्टी को शर्मिंदगी से बचाने के लिए वह खुद ही इस बात का ऐलान करें। कानपुर से एक बार फिर लड़ाई की तैयारी कर चुके जोशी को यह बात बिल्कुल नागवार लगी। लिहाजा भौतिक शास्त्र के इस प्रोफेसर ने उनकी बात मानने से इंकार कर दिया।

बताया जाता है कि इस पूरे प्रकरण से आहत जोशी ने रामलाल से कहा कि वह कोई घोषणा नहीं करने जा रहे हैं। वाकया एक सप्ताह पहले का है। साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया कि वह चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं। आपको बता दें कि जोशी इस समय कानपुर से सांसद हैं। और उन्हें 2014 में तकरीबन 57 फीसदी वोट मिले थे।

पार्टी के कभी कद्दावर नेता माने जाने वाले जोशी यहीं नहीं रुके। उन्होंने रामलाल को सीधे तौर पर कहा कि यह उनका सरासर अपमान है। उन्होंने कहा कि मोदी और शाह को अगर कोई संदेश देना ही था तो उन्हें सीधे उनसे बातचीत करनी चाहिए थे बनिस्पत किसी दूसरे को भेजने के।

लेकिन जोशी की यह नाराजगी भी काम नहीं आयी। दो दिन पहले जारी हुई सूची में जोशी का नाम गायब है। और माना जा रहा है कि जोशी को भी आडवाणी के घाट लगा दिया गया है। 

बताया जाता है कि इस पूरे प्रकरण पर जोशी ने कहा कि वे किस बात से डर रहे हैं? क्यों नहीं मेरा सामना कर सकते हैं?

“दि वायर” में छपी चतुर्वेदी की रिपोर्ट में इस पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।

2014 के चुनाव में जोशी ने अपनी वाराणसी की सीट को मोदी के लिए छोड़ दिया था। उसके बाद उन्हें कानपुर से मैदान में उतारा गया था। जहां उनकी रिकार्ड मतों से जीत हुई।

बाहर बीजेपी के नेता यह कह रहे हैं कि 2014 के चुनाव के बाद मार्गदर्शक मंडल में डाल दिए गए सभी पार्टी नेता चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं हैं। लिहाजा उन्होंने खुद ही चुनावी मैदान से बाहर जाने का फैसला लिया है। इसमें लाल कृष्ण आडवाणी और शांता कुमार का नाम लिया जा रहा है।

आडवाणी के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने खुद ही फैसला लिया है लेकिन सूत्रों की मानें तो सार्वजनिक रूप से हुई इस शर्मिंदगी से वह बेहद आहत हैं। जोशी और आडवाणी दोनों यह आशा कर रहे थे कि कम से कम शाह सद्भावना स्वरूप ही सही खुद जाकर उन्हें यह बताएंगे।

सूत्रों की मानें तो जोशी अब अपने नये कदम की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन वह क्या होगा उसके बारे में सिर्फ कयास ही लगाए जा सकते हैं।

गौरतलब है कि इस्टीमेट कमेटी का चेयरमैन रहते जोशी ने कई बार मोदी सरकार को शर्मिंदा होने के लिए मजबूर किया। रक्षा तैयारियों, गंगा की सफाई तथा एनपीए पर आई उनकी रिपोर्टों ने सरकार को बुरी तरीके सांसत में डाल दिया था। जोशी ने राजन सूची के तौर पर जानी जाने वाली डिफाल्टरों की सूची को भी सामने लाने का काम किया था।

कानपुर से उनको टिकट नहीं दिया जाना उसी की सजा के तौर पर देखा जा रहा है। एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा कि “हमारे संस्थापकों से व्यवहार का यह कोई तरीका नहीं है। उन्हें बेआबरू कर बाहर फेंक दिया गया। मोदी और शाह ने एक खतरनाक सिद्धांत पेश किया है और वे भी बाद में इसी तरह के व्यवहार का सामना करेंगे।”

शायद दीवार पर लिखी इस इबारत को साफ तौर पर देखने का ही नतीजा था कि पार्टी के बहुत सारे नेताओं ने पहले से ही चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी थी। इसमें सुषमा स्वराज और उमा भारती शामिल हैं।

बताया जा रहा है कि आरएसएस ने पहले ही शाह को चेतावनी दी थी कि जोशी चुप नहीं बैठने जा रहे हैं। और उनका टिकट कटने से ऊपरी जातियों और कम से कम ब्राह्मणों में एक गलत संदेश जाएगा। और चुनाव के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण यूपी इससे प्रभावित हो सकता है। लेकिन बताया जा रहा है कि मोदी और शाह अड़ गए थे। जो भी हो यह मामला यहीं नहीं रुकने जा रहा है। 








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