क्रांति के मुहाने पर खड़े भारतीय समाज के सपनों की भ्रूण हत्या थी संपूर्ण क्रांति!

जयंती पर विशेष , , बृहस्पतिवार , 11-10-2018


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पुष्पराज

आज जेपी होते तो वे 116 साल के होते। भारत के प्रसिद्ध राजनेता जयप्रकाश नारायण को लोगबाग जेपी पुकारते हैं। इंदिरा विरोधी राजनीतिक आन्दोलन के नायक जयप्रकाश ही थे। इसलिए उनके अनुगामियों ने उन्हें लोकनायक घोषित किया था। जयप्रकाश नारायण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख नेता के रूप में भी प्रतिष्ठित थे लेकिन 70 के दशक में इंदिरा विरोधी –कांग्रेस विरोधी राजनीतिक आन्दोलन के सबसे बड़े नेता होने की वजह से इन्होंने ज्यादा प्रसिद्धि हासिल की। जेपी ने इंदिरा गांधी का तख़्ता पलट करने के लिए विपक्ष का नेतृत्व करते हुए ‘संम्पूर्ण –क्रांति’ का ऐलान किया था।

इंदिरा विरोधी वह राजनीतिक संघर्ष छात्र आन्दोलन में परिणत हुआ और उस छात्र आन्दोलन का गर्भ–गृह बिहार ही था। इसलिए उस आन्दोलन को ‘बिहार आन्दोलन’ कहा गया। कांग्रेस विरोधी आन्दोलन को बंदूक की ताकत से रोकने की कोशिश की गयी, इंदिरा गांधी ने अपने विरोध की आवाज को दबाने के लिए आपातकाल की घोषणा की। आपातकाल के दौरान भारतीय नागरिकों के बुनियादी मौलिक अधिकारों पर जबरन लगाम लगाने की कोशिश की गयी। आपातकाल का विरोध कर रहे छात्र आन्दोलन पर गोलियां चलीं।

आपातकाल का विरोध करते हुए कितने छात्र शहीद हुए इसका कोई सही आंकड़ा उपलब्ध नहीं है पर आन्दोलन के नेतृत्व में शामिल प्रमुख नेतृत्वकारियों के अनुसार 21 माह के आपातकाल के दौरान देश भर में 150 से ज्यादा आंदोलनकारी  शहीद हुए। देश भर की जेलें आन्दोलनकारियों से भर दी गईं थीं। आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र का सबसे बदनुमा अध्याय माना गया। बाबा नागार्जुन और दुष्यंत ने उस आपातकाल के विरूद्ध ऐतिहासिक रचनाएं की।

आपातकाल के बाद चुनाव हुआ और इंदिरा विरोधी जनता पार्टी की सरकार कायम हुई। आजादी के बाद केंद्र में पहली बार कांग्रेस सत्ता से बेदखल हुई थी। देश में कांग्रेस विरोधी राजनीति की को जेपी आन्दोलन में शामिल राजनीतिक समूह ने अपने कब्जे में लिया। गुजरात, उड़ीसा, उप्र, बिहार सहित ज्यादातर राज्यों की राजनीति  जयप्रकाश के अनुगामियों के द्वरा संचालित होने लगी। सत्ता का समीकरण बदला,वोट का गणित बदला पर भारतीय लोकतंत्र का कितना भला हुआ, इसका अभी ठीक से आकलन नहीं हुआ है।

हमारे देश में किसी प्रसिद्ध राजनेता को, फिल्म अभिनेता को जल्दी ही ईश्वर तुल्य बनाकर उनके मूर्ति पूजन की परंपरा शुरू हो जाती है। जैसे राम चन्द्र जी, कृष्ण, हनुमान,गणेश जी की आलोचना–विवेचना आप कहीं नहीं सुनेगें, उसी तरह लोकनायक के बाद भारत-रत्न से विभूषित जयप्रकाश नारायण की समीक्षा का कोई स्पेश हमारी मुख्यधारा की मीडिया, मुख्यधारा के बुद्धिजीवियों के पास शेष नहीं है। मुझे किसी प्रतिमान को पूज्य मानने से एतराज नहीं है पर पूज्य की गणेश –वंदना से राष्ट्र का कितना हित होने वाला है। एक किसान, मजदूर, आदिवासी–दलित, बेरोजगार की जिंदगी को बदलने के लिए जयप्रकाश के पास अगर कुछ भी नहीं है तो हमें इस लोकनायक बनाम भारत –रत्न, सत्ता परिवर्तन का इंदिरा विरोधी आन्दोलन बनाम संपूर्ण क्रांति की परिकल्पना पर जरुर खुली बहस करनी चाहिए।

यह सर्वविदित है कि जयप्रकाश नारायण पर गांधी का गहरा प्रभाव था इसलिए उन्होंने इंदिरा की सत्ता को उखाड़ फेंकने के राजनीतिक संघर्ष को आन्दोलन का रूप देते हुए पग–पग पर गांधीवादी वसूलों को लागू किया। आज जब करोड़ों युवा बेरोजगार होकर देश के अलग –अलग नगरों में दिहाड़ी का रोजगार ढूंढते हुए दोजख की जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त हैं। अगर गांधी भारत के करोड़ों युवाओं की जिन्दगी में बदलाव लाने में अक्षम हैं, अगर गांधी इस देश के करोड़ों भूमिहीनों, बेघरों की फटेहाली दूर करने में हितकर नहीं हैं तो गांधीवादी जयप्रकाश नारायण की गणेश–वंदना की आज क्या उपादेयता है।  

मेरा जन्म एक गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी परिवार में हुआ तो गांधी के प्रति अनासक्ति की कोई वजह नहीं थी। जेपी आन्दोलन के सबसे बड़े थिंक टैंक के रूप में प्रतिष्ठित आचार्य राममूर्ति के साथ कुछ वर्ष प्रवास करते हुए जेपी के बारे में घंटों बातें करते हुए जेपी से घृणा का कोई मतलब नहीं। प्रभाष जोशी और कुलदीप नैयर तो जेपी के अनन्य रहे। पत्रकारिता के इन दोनों प्रतिमानों के साथ निकटता के बावजूद अगर जयप्रकाश नारायण के पूरे चरित्र में एक तरह का अवसरवाद दिखता है और इन लोकनायक से अपनी रत्ती भर की भी आस्था नहीं जुड़ पाई तो अपना क्या दोष है।

दिवंगत अरूण कुमार पटना में वरिष्ठ अंग्रेजी पत्रकार के साथ–साथ पत्रकारों के ट्रेड –यूनियन लीडर थे। वे वाम–छात्र राजनीति से पत्रकारिता में आए थे। वे बताते थे कि जेपी आन्दोलन से पूर्व सात राज्यों में छात्र आन्दोलन चरम पर था। उस छात्र आन्दोलन में वाम उभार सबसे ज्यादा शक्तिशाली था। जेपी ने छात्रों को विश्वविद्यालयों से निकालकर सड़कों पर खड़ा कर दिया। सत्ता पलट गयी पर सत्ता परिवर्तन से विश्वविद्यालय, युवाओं के भविष्य और शिक्षा की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हुआ। लिहाजा छात्र और उनकी शिक्षा का सवाल जेपी का मूल सवाल नहीं था। जेपी आन्दोलन का मूल मन्त्र इंदिरा को सत्ता से बेदखल कर अपने लोगों को सत्ता सौंपना ही था।

अरुण कुमार कहते थे कि विश्वविद्यालयों के छात्रों में गुस्सा था पर छात्रों के सामने कोई चेगुवेरा नहीं था। चेगुवेरा होता तो भारत में वास्तविक क्रांति होती। जेपी ने क्रांति का स्वप्न देखने वाले छात्रों को संपूर्ण क्रांति का झुनझुना थमाकर भारत में क्रांति के स्वप्नों का बधिया कर दिया। जेपी मार्क्सवाद के गहरे अध्येता थे पर मार्क्सवादी नहीं थे। जेपी मानवतावादी थे पर मनुष्य के द्वारा मनुष्यों के शोषण की व्यवस्था को जड़ –मूल से ख़त्म करने के पक्षधर नहीं थे। वे पूंजीवादी व्यवस्था को कायम रखते हुए भारत में ऐसे समाजवाद की कल्पना करते थे,जिसमें पूंजीवाद का विकास हो और पूंजीवाद विरोधी क्रांतिकारी समाज के निर्माण के सारे स्वप्नों को ध्वस्त कर दिया जाए।

मुझे जेपी के द्वारा घोषित संपूर्ण क्रांति की अवधारणा से आपत्ति क्योँ है। जेपी के अनुसार संपूर्ण क्रांति के सात चरण हैं– राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक,सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक। ये सातों चरण क्रांति के चक्र हैं। इन सात पहियों से होते हुए भारत में संपूर्ण क्रांति ने सफलता हासिल की। जात–पात तोड़ दो,तिलक–दहेज़ छोड़ दो जैसे नारे इस संपूर्ण क्रांति आन्दोलन के लिए चमत्कृत छवियां निर्मित करते थे। जीपी ने खुद संपूर्ण क्रांति की घोषणा के साथ कहा था –‘संपूर्ण क्रांति से मेरा तात्पर्य समाज के सबसे दबे–कुचले व्यक्ति को सत्ता के शिखर पर देखना है’। आचार्य राममूर्ति मंडल कमीशन को संपूर्ण क्रांति का अगला चरण मानते थे। लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार अगर सत्ता के शीर्ष पर कायम हुए तो जरुर जेपी के संपूर्ण क्रांति का प्राथमिक स्वप्न पूरा हुआ।

अगर जेपी के भक्तों की तरह ही संपूर्ण क्रांति की व्याख्या करें तो पूजा-पाठ में निपुण एक हिन्दू साधु का प्रधानमंत्री होना संपूर्ण क्रांति के आखिरी चरण ‘आध्यात्मिकता’ की सफलता है तो भारत में भारत रत्न जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के सपनों को पूर्णाहुति प्राप्त हो चुकी है। इसलिए वर्तमान भारतीय राज्यसत्ता को अघोषित आपातकाल लागू करते हुए ‘आपातकाल –पर्व ‘ मनाने के साथ –साथ ‘संपूर्ण क्रांति पूर्णाहुति यज्ञ’ भी आयोजित करने चाहिए।

लोकनायक बनाम भारत रत्न को उनकी जयंती पर याद करते हुए हम भारत के बौद्धिक वर्ग से अपेक्षा करते हैं कि क्रांति के स्थापित सिद्धांतों की कसौटी पर इस बात की समीक्षा की जाए कि ‘संपूर्ण क्रांति’ के उस टोटके ने किस तरह भारत में क्रांति की संभावना को कई दशक पीछे धकेल दिया है। क्या आप मानने के लिए तैयार हैं कि भारतीय युवाओं में बदलाव और क्रांति के सपनों की जो मजबूत जमीन 70 के दशक में निर्मित हुई थी, संपूर्ण क्रांति ने उन सपनों की भ्रूण –हत्या कर दी।

 (पुष्पराज जनांदोलनों से जुड़े रहे हैं और पत्रकार हैं।)     










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