शाह से जुड़े मुकदमे की सुनवाई करने वाले सीबीआई जज की मौत पर इतना सन्नाटा क्यों !

बड़ी ख़बर , , मंगलवार , 21-11-2017


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रवीश कुमार

अगर आपकी पत्रकारिता में दिलचस्पी है तो caravan की इस रिपोर्ट को दो बार पढ़िए। रिपोर्टर निरंजन टाकले ने तीन साल पहले हुई सीबीआई के जज बृजगोपाल लोया की मौत का ब्यौरा पेश किया है जिसे पढ़ते हुए आपकी हड्डियों में सिहरन हमेशा के लिए ठहर जाएगी। जस्टिस लोया मुंबई में सीबीआई जज के रूप में सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे थे जिसमें मुख्य आरोपी अमित शाह थे। 1 दिसंबर 2014 को उनकी नागपुर में मौत हो गई थी। जस्टिस लोया का परिवार आज भी भय से बोलने की स्थिति में नहीं हैं मगर उनकी बहनों ने जो ब्यौरा दिया है, उसे पढ़ते हुए आप निहत्थे और असहाय हो जाते हैं। काश वो सब सच न हो। अगर वो सच है तो फिर कोई महफ़ूज़ नहीं है।

लोया की बहन ने बताया कि नागपुर में दिल का दौरा पड़ने से मौत होती है। वहां जिस अस्पताल में ले जाया गया, वो बेहद संदिग्ध किस्म का है। वहां ईसीजी मशीन काम नहीं कर रही थी। एक जज को सीने में दर्द की शिकायत पर आटो रिक्शा में ले जाया गया जबकि उनके साथ दो जज मुंबई से नागपुर गए थे। दोनों के कहने पर ही जस्टिस लोया नागपुर जाने के लिए तैयार हुए थे। बहन ने बताया कि जब नागपुर से शव आया तब एंबुलेंस में सिर्फ ड्राईवर था। कोई सुरक्षा नहीं, उनके साथ गए जज तक नहीं थे। मुंबई से जब परिवार आया तो कुछ जज थे मगर उनमें से एक परिवार को हिदायत दे रहे थे कि किसी से बात नहीं करनी है। इस बीच रिपोर्ट में आरएसएस के शख्स का नाम उभरता है जो बहन के पास पहुंच जाता है ।

यह वाक़ई डरा देना वाली रिपोर्ट है। प्रशांत भूषण ने इसे साझा किया तब जाकर नज़र पड़ी। आप इस रिपोर्ट को पढ़िए। सारा अनुवाद करना मुश्किल है। रिपोर्ट के अंदर जो सवाल उठाए गए हैं उन्हें काफी सावधानी और ज़िम्मेदारी से लिखा गया है। वरना सबको पता है कि अमित शाह के ख़िलाफ़ लिखने का आजकल क्या मतलब है। मगर आपको पता होना चाहिए कि तीन साल बाद एक जज की मौत जिसे मीडिया ने सामान्य माना था, उसी मीडिया का कोई निरंजन उसकी पड़ताल कर तीन साल बाद उस स्टोरी को पहाड़ की तरह हम सबके सामने खड़ी कर देता है। इस रिपोर्ट को पढ़ना आसान नहीं है।

कमेंट करने वाले बहुत आ जाते हैं। अगर आपने रिपोर्ट नहीं पढ़ी है तो कमेंट न पढ़ें। नहीं पढ़ सकते तो छोड़ कर गुज़र जाइये। गाली देने वाले तो नहीं ही पढ़ते हैं जो नहीं देते हैं उनमें से भी कई बार शेयर की गई रिपोर्ट नहीं पढ़ते। 

रिपोर्ट के कुछ अंश और उससे उठते सवाल गिरीश मालवीय के हवाले से-

गुजरात पुलिस ने एक कथित फेक एनकाउंटर रच कर सोहराबुद्दीन को मार डाला था...इस केस में अमित शाह का भी नाम शामिल था...सोहराबुद्दीन केस मुंबई की सीबीआई अदालत के जज बृजगोपाल हरिकृष्ण लोया के पास था...2014 में मोदी सरकार बन जाने के बाद अचानक जज साहब की बेहद संदेहास्पद परिस्थिति में मृत्यु हो गयी...!!!

एक अंग्रेजी पत्रिका कारवां ने यह खबर छापी है कि जज लोया के परिवार ने अब इस समूचे घटनाक्रम पर गंभीर सवाल उठाए हैं...परिवार का कहना है कि जज की मौत के पीछे गहरी साज़िश है....परिवार का कहना है संदेहास्पद परिस्थितियों में जस्टिस लोया का शव नागपुर के सरकारी गेस्टहाउस में मिला था...इस मामले में तत्कालीन भाजपा सरकार ने हार्टफेलियर का रूप दिया था...!!!

बृजमोहन की बहन ने इस संदिग्ध मौत पर निम्न सवाल उठाए हैं...

1-जस्टिस लोया की मौत कब हुई, इस पर अफसर से लेकर डॉक्टर तक खामोश क्यों हैं...?

तमाम छानबीन के बाद भी अब तक मौत की टाइमिंग का खुलासा क्यों नहीं हुआ...?

2- 48 वर्षीय जस्टिस लोया की हार्ट अटैक से जुड़ी कोई मेडिकल हिस्ट्री नहीं थी,फिर मौत का हार्टअटैक से कनेक्शन कैसे? ये बात खुद उनकी बहन ने बताया जो एक डाक्टर हैं और अपना अस्पताल चलाती हैं।

3-जस्टिस लोया को वीआइपी गेस्ट हाउस से सुबह के वक्त आटोरिक्शा से अस्पताल क्यों ले जाया गया ?

4-दिल का दौरा पड़ने पर परिवार को तत्काल क्यों नहीं सूचना दी गई ? हार्टअटैक से नेचुरल डेथ के इस मामले में अगर पोस्टमार्टम जरूरी था तो फिर परिवार से क्यों नहीं पूछा गया?

5-पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के हर पेज पर एक रहस्मय दस्तखत हैं, ये दस्तखत जस्टिस लोया के कथित रिश्तेदार मैय्याताचाचुलतभउ के बताए जाते हैं...जिन्हें जस्टिस का ममेरा भाई बताया गया है...परिवार का कहना है-इस नाम का जस्टिस का कोई ममेरा भाई नहीं है !!!!

6-अगर इस रहस्यमय मौत के पीछे कोई साजिश नहीं थी तो फिर मोबाइल के सारे डेटा मिटाकर उनके परिवार को 'डिलीटेड डेटा' वाला फोन क्यों दिया गया ?

कहा जाता है कि जज की मृत्यु हो जाने के बाद मात्र 30 दिनों में नए जज ने मुकदमे में अमित शाह को क्लीन चिट दे दी थी!!!

(दोनों टिप्पणियां संबंधित लेखकों के फेसबुक से ली गई हैं।)

 






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