क्या न्यायपालिका ने भी धारण कर लिया है राजनीतिक सत्ता का चरित्र?

विवाद , , बृहस्पतिवार , 25-04-2019


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वीना

कहावत है खरबूज़े को देखकर ख़रबूज़ा रंग बदलता है। लगता है कुछ ऐसे ही सुप्रीम कोर्ट के मुखिया जस्टिस रंजन गोगोई पर देश के मुखिया मोदी का रंग चढ़ गया है। जैसे मोदी या मोदी सरकार की नीतियों, वायदों-इरादों की आलोचना या सवाल करने पर राष्ट्र ख़तरे में पड़ जाता है वैसे ही व्यक्तिगत तौर पर भारत के चीफ जस्टिस (सीजेआई) रंजन गोगोई पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोप से न्यायपालिका की स्वतंत्रता ख़तरे में आ पड़ी है। 

बगै़र किसी जांच-पड़ताल की ज़रूरत समझे जस्टिस गोगोई ने ऐलान कर दिया है कि उन पर लगाया गया यौन उत्पीड़न का मामला झूठा-बेबुनियाद है। उन पर आरोप न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है। उनके मुताबिक इसके पीछे कोई बड़ी ताकत काम कर रही है। उन्होंने कहा है कि ये लोग मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को ही निष्क्रिय करना चाहते थे क्योंकि वह कुछ संवेदनशील मामलों की सुनवाई कर रहा था।  

अगर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (सीजेआई) गोगोई निर्दोष हैं। और अगर कानून सबके लिए बराबर है तो क्यों नहीं उन्होंने सामान्य प्रक्रिया से पीड़ित महिला के आरोपों की जांच होने दी? हड़बड़ा कर खुद संज्ञान लेकर छुट्टी के दिन कोर्ट क्यों सजा कर बैठ गए? और तुर्रा ये कि तीन में से एक जज वो खुद थे। खुद पर फै़सला देने के लिए! 

जब चारों तरफ आलोचना हुई तो यौन उत्पीड़न की जांच के लिए बनाए गए कोर्ट की आंतरिक यौन उत्पीड़न कमेटी में जांच करवाने के बजाय तीन जजों का एक पैनल बना दिया। और देखिये इस पैनल में भी घपला! पैनल की अगुआई दूसरे सबसे सीनियर जज एसए बोबडे कर रहे हैं। इस पैनल में जस्टिस रामन्ना और जस्टिस इंदिरा बनर्जी हैं। एक महिला, दो पुरुष। पीड़िता को 26 अप्रैल 2019 को इस पैनल के सामने पेश होने का नोटिस भेजा गया है। 

सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही बनाई गई विशाखा गाइड लाइन के मुताबिक जांच कमेटी के सदस्य संबंधित संस्था से बाहर के होने चाहिये। और उसमें भी अधितर महिलाएं हों। कमेटी की चेयरपर्सन भी महिला होगी। चेयरपर्सन सुप्रीम कोर्ट की महिला जज हो सकती हैं। 

अपनी सफाई में रंजन गोगोई ने अपनी अदालत में कहा कि उन्हें दुख इस बात का है कि 20 साल न्यायपालिका में काम करने के बाद भी उनके बैंक अकाउंट में सिर्फ 6,80,000 रुपये हैं और उनके पीएफ़ खाते में 40 लाख रुपये। ऐसे में जब वे लोग किसी और तरह से उन पर शिकंजा नहीं कस सके तो उन्होंने यौन उत्पीड़न जैसे किसी आरोप की तलाश की।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस का बेसिक मासिक वेतन 2 लाख 80 हज़ार रुपये है। सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों को 2 लाख 50 हजार रुपये प्रति माह बेसिक वेतन दिया जाता है। तन्ख़्वाह के अलावा टीए, सरकारी बंगला, खाना बनाने से लेकर कपड़े धोने आदि-आदि घर के हर काम के लिए नौकर मुफ्त। बिजली-पानी-सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, गाड़ी-ड्राइवर, क्लर्क-नौकर, और भी बहुत से भत्ते ठाट-बाट की सुविधाएं स...ब मुफ्त। मंहगाई भत्ता अलग से।

अब यहां फिर प्रधान न्यायधीश प्रधानमंत्री मोदी के सुर में सुर मिलाते लग रहे हैं। जैसे 10 लाख का सूट पहनकर मोदी फ़कीर हैं। वैसे ही वर्तमान में 2 लाख 80 हज़ार रुपया बेसिक वेतन प्रतिमाह पाने वाले गोगोई अपनी फ़कीरी का सबूत दे रहे हैं।

अगर सीजेआई ने अपने खाते की जानकारी दी है जिसमें कि उनके मुताबिक मात्र 6 लाख 80 हज़ार रुपये मौजूद हैं। तो जनता को ये ख़्याल आना लाज़िमी है कि जनाब जहां भारत की बड़ी आबादी 20 रुपये प्रतिदिन से भी कम में गुजर-बसर कर रही है वहां आप प्रतिमाह लाखों कहां खर्च कर रहे हैं? क्योंकि आपका सारा खर्चा तो 20 रुपये में जीने-मरने वाली जनता उठा रही है। 

2018 से सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीशों को 2 लाख पचास हज़ार रुपये और मुख्य न्यायाधीश को 2 लाख 80 हज़ार रुपये बेसिक वेतन मिल रहा है। उससे पहले यह 90 हज़ार था। जस्टिस गोगोई 2012 से सुप्रीम कोर्ट के जज हैं। अगर हम जनवरी 2018 से अक्तूबर तक 2 लाख 50 हज़ार और अक्तूबर से अप्रैल 2019 तक 2 लाख 80 हज़ार के हिसाब से उनकी तन्ख्वाह का मोटा-मोटा हिसाब लगाएं तो करीब 41 लाख 50 हज़ार रूपये सिर्फ़ बेसिक वेतन बनता है। और जज साहब बता रहे हैं कि उनके खाते में अभी कुल 6 लाख 80 हज़ार रुपये बाक़ी हैं। तो करीब 34 लाख़ रूपये आपने मात्र 16 महीनों में कहां खर्च किए? 

जबकि ऊपर लिखित आपकी सभी सुविधाएं जनता के खाते से मुफ्त अदा की जा रही हैं। इसका एक मतलब ये भी निकलता है कि जज गोगोई बहुत खर्चीले हैं। 

पढ़ने वाले कहेंगे कि ये क्या बेकार का तर्क़ कर रही हूं मैं। जी साहेबान, मैं भी मानती हूं कि ये वक़्त की बर्बादी है। बकवास हिसाब है। ठीक वैसे ही जैसे सीजेआई अपना बैंक खाता दिखा कर कह रहे हैं कि वो यौन-शोषण नहीं कर सकते। क्या यौन कुंठा जात-धर्म, अमीरी-गरीबी, पद के आधार पर किसी व्यक्ति में प्रवेश करती है? और सीजेआई जैसे पद के तो पास भी नहीं फटक सकती! 

अब बात करते हैं सीजेआई के इस दावे की कि आने वाले दिनों में वो कुछ अहम फैसलों की सुनवाई कर रहे हैं इसलिए उन्हें और उनके कार्यालय को निष्क्रिय बनाने की साजिश मात्र है ये यौन शोषण के आरोप। 

आखि़र क्या हैं वो बड़े मामले जिनकी सीजेआई सुनवाई करने वाले हैं? 

मोदी की बायोपिक से लेकर राहुल गांधी के ख़िलाफ़ मानहानि के मामले और चुनाव संबंधी मामलों पर सुनवाई करेंगे।

तमिलनाडु में कथित तौर पर चुनावों को प्रभावित करने के उद्देश्य से बड़े पैमाने पर मतदाताओं को पैसे बांटने के मामले पर दायर याचिका की भी सुनवाई कर रहे हैं।

इसके अलावा चीफ़ जस्टिस गोगोई जनहित से जुड़ी याचिकाओं पर भी सुनवाई कर सकते हैं।

इनमें से ऐसी कौन सी सुनवाई है जिससे कांग्रेस-बीजेपी या किसी के भी खि़लाफ़ फैसला होने से भारी नुकसान हो सकता है। और जिसे रोकने के लिए सीजेआई को इतने नीच आरोप में फंसाना ज़रूरी हो गया हो। वैसे सीजेआई ने कहा है कि उन पर लगे आरोप से वो डरेंगे नहीं और अपना कार्यकाल पूरा करेंगे। 

अब बात करते हैं गोगोई के चीफ बनने के बाद कितने क्रांतिकारी फैसले उन्होंने लिए। जैसे कि चीफ बनने से पहले उन्होंने अपनी छवि को गढ़ा था। जैसे जस्टिस गोगोई ने अपने मामले में खुद ही संज्ञान लेकर आनन-फानन में कोर्ट लगाई। क्या उन्होंने जज लोया की मौत की जांच पर स्वयं संज्ञान लेने की ज़रूरत महसूस की? अभी तक तो नहीं। राफेल विमान की ख़रीद मामले में साफ नज़र आता है कि सीजेआई ने सरकार के पक्ष की रक्षा की।

उससे पहले जब राफेल घोटाले पर कार्रवाई करने की तैयारी करने वाले पूर्व सीबीआई चीफ आलोक वर्मा को मोदी सरकार ने रातों-रात ग़लत तरीके़ से उनके पद से हटा दिया। तब जस्टिस गोगोई की बेंच ने वर्मा की इंसाफ की अपील को इतना लंबा खींचा कि तब तक आलोक वर्मा के रिटायर होने का वक़्त आ गया। और नए सीबीआई चीफ की नियुक्ति में भी जस्टिस गोगोई जो कि चयन कमेटी के तीन सदस्यों में से एक थे सरकार के पसंदीदा अफसर पर अपनी मुहर चस्पा कर आए। इस कमेटी के मेंबर विपक्ष के नेता अकेले पड़ गए। सुप्रीम कोर्ट के चीफ बनने के बाद गोगोई सरकार के पक्ष की तरफ ही झुकते दिखाई दिए हैं।  

गोदी मीडिया ने चीफ जस्टिस के पद पर आसीन होने से पहले गोगोई की तारीफ़ों में खूब कसीदे पढ़े थे। बावजूद इसके कि वो जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ़ प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले चार जजों में से एक थे। उन दीपक मिश्रा के खि़लाफ़ जिन्होंने अपनी ही बिरादरी के जज लोया की रहस्मय मौत की जांच से पर्दा उठाने की जांच की अर्जी को खारिज कर दिया। उस जांच को जिससे बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह की आज़ादी ख़तरे में पड़ सकती थी। 

उदारवादी तबकों में हलचल थी कि सरकार किसी ऐसे व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में स्वीकार नहीं करेगी जिसकी छवि स्पष्ट तौर पर आज़ाद हो और राजनीतिक दबाव के सामने झुकने वाले शख्स की ना हो। लेकिन सरकार ने बिना किसी ना-नुकर के रंजन गोगोई को सीजेआई बना दिया। 

सीजेआई बनने से पहले दिल्ली में आयोजित तीसरे रामनाथ गोयनका स्मृति व्याख्यान के दौरान गोगोई ने कहा था कि न्यायपालिका को आम आदमी की सेवा के योग्य बनाए रखने के लिए सुधार नहीं एक क्रांति की जरूरत है। तब उन्होंने न्यायपालिका को उम्मीद का आख़िरी गढ़ बताया था और कहा था कि न्यायपालिका को पवित्र, स्वतंत्र और क्रांतिकारी होना चाहिए।  पर खुद पर छींटे पड़ते ही जस्टिस गोगोई अपने सब व्याख्यान और आर्दश भूल गए हैं। और न्याय की उम्मीद के पीछे खुद ही हथौड़ा लेकर दौड़ते नज़र आ रहे हैं। टीवी की बहस में हिस्सा लेने वाले ज़्यादातर रिटायर्ड जज साहेबान जस्टिस गोगोई के पक्ष में पीड़ित महिला को भला-बुरा सुना रहे हैं। सबके लिए न्याय का नाम रंजन गोगोई हो गया है। 

पर उच्च न्यायालय के पूर्व जस्टिस एसएन ढींगरा इन सबसे अलग न्यायिक प्रक्रिया का ठीक से पालन करने की बात कहते दिखाई दिए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को पद से अलग किया जाना चाहिये। आरोप व्यक्ति रंजन गोगोई पर लगा है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ पर नहीं। और जस्टिस रंजन गोगोई को एक व्यक्ति के तौर पर इसका सामना करना चाहिये। जस्टिस ढींगरा ने ये भी कहा कि जैसे पीड़ित महिला को अपराधी बताकर उसके आरोपों को ख़ारिज किया जा रहा है ये ग़लत है। किसी अपराधी के साथ यदि अपराध होता है तो क्या उसको न्याय नहीं मिलना चाहिये? आप कह सकते हैं कि एक महिला होने के नाते मैं सीजेआई के प्रति कुछ ज़्यादा ही कठोर रुख अपना रही हूं।

हो सकता है आपका एतराज़ दुरुस्त हो। पर मैं ये नज़रिया क्यों न रखूं। जबकि कानून के मंदिरों की किताबें महिलाओं के खि़लाफ भेदभाव के बेशर्म विवरणों-फैसलों से भरी पड़ी हैं। 1992 में राजस्थान के भटेरी गांव की दलित भंवरी देवी के साथ तथाकथित ऊंची जाति के मर्दों द्वारा सामूहिक बलात्कार किया जाता है, उसी के खेत में। उसका कुसूर ये था कि वो बाल विवाह रोकने वाले एक स्वयं सेवी संगठन की साथिन का काम कर रही थी।

भंवरी देवी के बलात्कारियों को बलात्कारी इसलिए नहीं माना गया क्योंकि वो तथाकथिम बड़ी जाति वाले थे। और ऊंची जाति के पुरुष कथित नीची जाति की महिला के शरीर को छूकर अपने को अपवित्र नहीं करेंगे। इसलिए भवरी देवी झूठी करार दे दी गईं। आज भी उच्च न्यायालय में भवरी की अपील इंसाफ का इंतज़ार कर रही है।

जाकर झांकिये अदालती कार्यवाहियों के उन शर्मनाक लम्हों में जहां हिम्मत करके अपने बलात्कारियों को सज़ा दिलवाने आईं स्त्रीजात का कानून की अंधी देवी के सामने बार-बार बलात्कार हुआ। जहां उसकी हिम्मत को हमारे माननीय जजों के फैसलों में चरित्रहीनता के थप्पड़ जड़े हैं। बलात्कार की पीड़िता को सिर्फ इसलिए चरित्रहीन मान लिया गया है क्योंकि उसने अपने साथ होने वाले अन्याय की रिपोर्ट करवाई। क्योंकि अदालतों में इंसाफ की कुर्सी पर बैठे पुरुषों का मानना था कि भारतीय सभ्यता में कोई चरित्रवान स्त्री अपने साथ हुए कुकर्म का बयान कर ही नहीं सकती। इसलिए या तो वो झूठी है या बलात्कार योग्य।

आज भी जस्टिस गोगोई का साथ देने वाले पूर्व और साथी जज इसी मानसिकता का परिचय दे रहे हैं। और न्याय पालिका में आम लोगों को इंसाफ देने के लिए क्रांति का बिगुल फूंकने वाले जस्टिस गोगोई खुद इस पंक्ति में सबसे आगे आ खड़े हुए हैं। अपने ऊपर लगे आरोपों को खुद ही खारिज कर आरोप लगाने वाली स्त्री के अस्तित्व, उसके सम्मान पर प्रश्नचिन्ह लगाकर।

महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान फिर एक बार मोदी सरकार। ये उसी मोदी का ताज़ा चुनावी नारा है जो बीते बरस बनारस विश्वविद्यालय की अपने साथ होने वाली छेड़छाड़ का विरोध करने वाली बेटियों को पिटता छोड़, रास्ता बदल, मुंह छुपाकर चल दिए थे। 

जस्टिस गोगोई ने सीजेआई बनने से पहले दिल्ली के तीन मूर्ति भवन में ‘न्याय की दृष्टि’ विषय पर व्याख्यान में कहा था कि न्यायपालिका उम्मीद की आखिरी किरण है और वह महान संवैधानिक दृष्टि का गर्व करने वाला संरक्षक है। इस पर समाज का काफी विश्वास है। क्या लॅार्डशिप को अपनी कही ये बात आज भी याद है?

(वीना व्यंग्यकार, फिल्मकार और पत्रकार हैं।)



 








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Umesh Chandola :: - 04-25-2019
हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश गोगोई साहब पर सुप्रीम कोर्ट की एक महिला कर्मचारी ने छेड़छाड़ के गंभीर आरोप लगाए हैं । इस पर जस्टिस गोगोई का कहना है कि यह न्यायपालिका पर हमला है ।इस विचित्र तर्क पर मात्र हंसा जा सकता है ।भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों का उल्लेख है जिसमें अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता के अधिकार से संबंधित है। अन्य सारे मौलिक अधिकार जहां भारत के नागरिकों हेतु उपलब्ध हैं यह मौलिक अधिकार विश्व के किसी भी नागरिक के लिए उपलब्ध है। यानी भारत के मुख्य न्यायाधीश हो या राष्ट्रपति या पाकिस्तान का एक साधारण आतंकवादी भारत का कानून समता की दृष्टि से ही व्यवहार करेगा। भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद पवित्र गाय नहीं है यह बात तो 2010 में ही प्रमाणित हो गई थी ।उस समय भारत के भूतपूर्व कानून मंत्री शांति भूषण द्वारा आरोप लगाया गया था कि भारत क 16 में से 8 पूर्व मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट रहे है । भ्रष्टाचार अधिनियम की परिभाषा के अनुसार केवल पैसे का लेनदेन ही भ्रष्टाचार नहीं है बल्कि इसमें "ग्रेटिफिकेशन "शब्द का प्रयोग हुआ है यानी पैसे के अलावा स्त्री या नाम आदि का लालच भी भ्रष्टाचार है। इससे पहले भी कई बार सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों के कदाचारों के किस्से गलियारों में वरिष्ठ वकीलों के बीच आम चर्चा का विषय रहे हैं। बेहद विवादास्पद और विश्व प्रसिद्ध किस्से के रूप में चंडीगढ़ हाई कोर्ट के एक जज को उद्धृत किया जा सकता है जिसने कहा था कि अगर मारुति मानेसर के मजदूरों को जमानत दे दी तो विदेशी पूंजी निवेश प्रभावित होगा ।इसी प्रकार हजारों लाखों निर्दोष आदिवासी मुसलमान दलित गरीब लोग अदालतों में केवल पैसे की कमी के कारण जेल में सड रहे हैं। भारत के कानून के मुताबिक 3 माह के अंदर चार्जशीट ना पेश होने पर स्वयं जमानत हो जाती है लेकिन मारुति के मजदूरों को 2 साल तक बिना चार्जशीट के जेल में रखा गया । कसूर इतना है कि अपनी यूनियन बनाना चाहते थे। क्या तब न्यायपालिका की साख खतरे में नहीं हुई ?स्वयं भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वी एन खरे ने कहा था कि मैं मोदी पर गुजरात नरसंहार के लिए एफ आई आर दायर करता । तो क्या आज उस व्यक्ति का प्रधानमंत्री पद पर रहना ही संविधान एवं न्यायपालिका की विश्वसनीयता को खतरे में नहीं डालता ? जज लोया के मामले में इतने साफ सबूतों के होते हुए भी उसकी जांच तक न करवाना क्या यह न्यायपालिका की साख को खतरे में नहीं डालता ? आखिर जज हो या पीएम हैं तो हाड़ मांस का एक पुतला ही । अगर सरकार मारुती के गरीब मजदूरों के खिलाफ सरकारी वकील केटीएस तुलसी को 11 लाख रुपए प्रति पेशी के दे सकती है तो क्यों ना एक ऐसा ही वकील उस कथित रूप से पीड़ित महिला को भी उपलब्ध कराया जाये जिससे न्यायपालिका की साख दुनिया भर में पुनः रोशन हो। याद रहे योर आनर ! इस साख को बचाने के लिए ही एक ऐतिहासिक प्रेस काफ्रेंस हुई थी। आखिर आप न्याय पालिका नहीं जैसे मोदी या भाजपा देश नहीं।