एक और मोदी गेट! बैंकों से 824 करोड़ रुपये का लोन लेकर कनिष्क गोल्ड का मालिक फरार

बड़ी ख़बर , नई दिल्ली/चेन्नई, बृहस्पतिवार , 22-03-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली/ चेन्नई। पीएनबी और नीरव गेट के बाद एक और बैंक घोटाला सामने आया है। 824 करोड़ रुपये के इस घोटाले को कनिष्क गोल्ड के मालिक भूपेश कुमार जैन ने अंजाम दिया है। ये मामला तब सामने आया जब स्टेट बैंक ने सीबीआई से कनिष्क गोल्ड प्राइवेट लिमिटेड के फ्राड की जांच करने की गुजारिश की।

कनिष्क का मुख्यालय चेन्नई के टी नगर में है और भूपेश कुमार जैन और उनकी पत्नी नीता जैन उसके मालिक हैं। बैंकरों का कहना है कि उनका दोनों से संपर्क नहीं हो पा रहा है। बुधवार को सीबीआई ने आरोपियों के दफ्तर और रिहाइशी ठिकानों पर छापा डालकर खोजबीन की। 

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि “आरोपियों से संपर्क किया जा चुका है और उनसे पूछताछ में शामिल होने के लिए आगे आने को कहा गया है।”

कनिष्क को लोन देने वाले 14 सरकारी क्षेत्र के बैंकों में एसबीआई सबसे आगे था। 25 जनवरी 2018 को लिखे गए एक पत्र में एसबीआई ने कनिष्क पर रिकार्ड को तोड़ने मरोड़ने और एकाएक दुकानों को बंद करने का आरोप लगाया था।

हालांकि मूल ऋण तकरीबन 824 करोड़ रुपये का है अगर इस पर ब्याज लगा दिया जाए तो ये कुल मिलाकर 1000 करोड़ रुपये के आसपास हो जाएगा। एसबीआई पहला बैंक था जिसने 11 नवंबर 2017 को कनिष्क के एकाउंट को फ्राड घोषित किया था। उसके बाद जनवरी में दूसरे सदस्य बैंकों ने भी ऐसा ही किया।

एसबीआई ने बताया कि ज्वेलर सबसे पहले मार्च 2017 में आठ बैंकों की ऋण अदायगी करने में नाकाम रहा। और फिर अप्रैल 2017 तक उसने सभी 14 बैंकों का ऋण देना बंद कर दिया। बैंकरों ने जब 5 अप्रैल 2017 को अपना स्टॉक आडिट करना शुरू किया तो बैंकर उससे संपर्क करने में नाकाम रहे।

25 मई 2017 को जब बैंकरों ने कनिष्क के कॉरपोरेट आफिस, फैक्टरी और शोरूम का दौरा किया तो सारी सुविधाएं बंद मिलीं और उनमें किसी तरह की गतिविधि नहीं हो रही थी।

भूपेश जैन ने उसी दिन अपने बैंकरों को पत्र लिखा जिसमें उसने रिकार्ड के गलत होने और लोन की सिक्योरिटी के तौर पर जमा स्टाक को हटाने की बात को स्वीकार की। उसी दौरान बैंकरों का भूपेश के दूसरे शोरूमों का दौरा करने के बाद पता चला कि वो भी बंद हो गए हैं।

मद्रास ज्वेलर्स और डायमंड मरचेंट्स एसोसिएशन के प्रतिनिधि ने कहा कि “कंपनी 2017 में ही बंद हो गयी थी क्योंकि वो नुकसान से नहीं उबर पा रही थी।”

एसबीआई कनिष्क गोल्ड के लोन की तिथि 2007 दिखाता है। समय बीतने के साथ ही बैंकों ने क्रेडिट और कनिष्क गोल्ड पर वर्किंग कैपिटल लोन की सीमा बढ़ा दी। 2008 में एसबीआई ने आईसीआईसीआई बैंक से इस बिंदु पर ऋण लिया जिसमें 50 करोड़ वर्किंग कैपिटल लोन और 10 करोड़ टर्म लोन था। मार्च 2011 में ये पंजाब नेशनल बैंक और बैंक आफ इंडिया के साथ बहु बैंकिंग व्यवस्था में तब्दील हो गया।

2012 में एसबीआई की अगुवाई में बैंकों के कंसोर्टियम ने कनिष्क को मेटल लोन (एमजीएल) की ग्रांट आवंटित कर दी। एसबीआई ने कहा कि “इस विकल्प का इस्तेमाल करके कनिष्क कंसोर्टियम में नामित बैंकों या फिर खुले बाजार से एमजीएल या फिर अपने करेंट एकाउंट से क्रेडिट के तहत बहुमूल्य धातु खरीद सकेगा।”

इस कड़ी में स्टेट बैंक ने 215 करोड़ रुपये, पीएनबी ने 115 करोड़, यूनियन बैंक आफ इंडिया 50 करोड़, सिंडीकेट बैंक 50 करोड़, बैंक आफ इंडिया 45 करोड़, आईडीबीआई बैंक 45 करोड़, यूको बैंक 40 करोड़, तमिलनाडु मरकेंटाइल बैंक 37 करोड़, आंध्रा बैंक 30 करोड़, बैंक आफ बड़ोदा 30 करोड़, एचडीएफसी बैंक 25 करोड़, आईसीआईसीआई बैंक 25 करोड़, सेंट्रल बैंक आफ इंडिया 20 करोड़ और कारपोरेशन बैंक ने 20 करोड़ रुपये कनिष्क गोल्ड को लोन दिया है।

टाइम्स नाऊ को दिए एक इंटरव्यू में कारपोरेशन बैंक के एजीएम आर सौंदार्जन ने कहा कि वो मामले को जानते थे। उन्होंने कहा कि “सवालों के जवाब देने के लिहाज से एसबीआई सबसे बेहतर स्थिति में होगा। दूसरे बैंकों के मुकाबले कनिष्क के साथ हम लोगों का संपर्क बहुत कम है। हमने तकरीबन 20 करोड़ रुपये का वर्किंग कैपिटल लोन दिया है।”

एसबीआई के जनरल मैनेजर जीडी चंद्रशेखर ने कहा कि उसके बाद आगे कोई सूचना आती है तो बैंक प्रतिक्रिया देगा। 






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