कर्नाटक में सरकार: किसके पक्ष में हैं संवैधानिक कसौटियां

विशेष , नई दिल्ली, बुधवार , 16-05-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। कर्नाटक चुनावों में किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत न मिलने से सरकार के गठन की प्रक्रिया अधर में लटक गयी है। सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने के बावजूद विधानसभा में साबित करने के लिए बीजेपी के पास जरूरी संख्या नहीं दिख रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस और जेडीएस के साथ आकर सरकार बनाने के दावे ने मामले को और पेंचीदा बना दिया है। 

अब मामला राज्यपाल की अदालत में है। पूरे देश की निगाहें कभी गुजरात में मोदी के मंत्री रहे वाजूभाई वाला पर टिकी हैं। संवैधानिक विशेषज्ञ से लेकर आम पत्रकार और जानकार तक अपने-अपने तर्क दे रहे हैं। इस मामले में दो नजीरें रही हैं जिनका इस तरह के किसी संवैधानिक संकट के समय जिक्र किया जाता रहा है। पहला एसआर बोम्मई का मामला है। जो सरकार के गठन नहीं बल्कि धारा 356 लगाए जाने के संदर्भ में पूरी व्यवस्था देता है। इसमें ये बात बिल्कुल साफ कही गयी है कि बहुमत का परीक्षण विधानसभा के फ्लोर पर होगा। और धारा 356 तभी लगाया जा सकता है जब राज्य में पूरी संवैधानिक मशीनरी फेल हो गयी हो। वरना 356 को भीम राव अंबेडकर के शब्दों में एक डेड लेटर समझा जाएगा। बोम्मई मामले में भी एक स्थाई सरकार की गारंटी की बात की गयी है जिसको कि सदन में बहुमत हासिल हो।

दूसरा 1998 में गठित अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से जुड़ा है जिसमें पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन ने एक व्यवस्था दी थी। के आर नारायणन द्वारा 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के गठन के वक्त तय की गयी यह व्यवस्था किसी भी समय के लिए सबसे ज्यादा अनुकूल है। जिसमें उन्होंने कहा था कि “जब कोई भी दल या फिर चुनाव पूर्व राजनीतिक दलों का गठबंधन स्पष्ट तौर पर पूर्ण बहुमत की स्थिति में नहीं है, भारत या फिर कहीं का भी राष्ट्राध्यक्ष ऐसी पार्टी या फिर पार्टियों के गठजोड़ के नेता को पहला अवसर देगा जिसने सबसे ज्यादा सीटें जीती हों। और प्रधानमंत्रियों को नियुक्त करेगा जिन्हंप एक दिये गए समय के भीतर सदन के फ्लोर पर अपना बहुमत सिद्ध करना होगा।”

यहां ये बात स्पष्ट तौर पर कही गयी है कि चुनाव पूर्व दलों और गठबंधनों के बहुमत न हासिल करने पर सबसे बड़ी पार्टी या फिर गठबंधन को मौका दिया जाएगा। अब यहां सबसे बड़े गठबंधन के तौर पर स्पष्ट रूप से कांग्रेस और जेडीएस का दावा बनता है। और चूंकि सूबे में स्थाई सरकार बनाने का गणित भी उनके पक्ष में है। लिहाजा उनको मौका न देकर सबसे बड़ी पार्टी के नाते बीजेपी को मौका देना सूबे में खरीद-फरोख्त को बढ़ावा देना होगा। क्योंकि उसको अपने सदस्यों के अलावा किसी दूसरे दल या फिर विधानसभा सदस्य का समर्थन नहीं हासिल हो पा रहा है। यहां तक दो निर्दलीयों ने भी कांग्रेस और जेडीएस को अपना समर्थन देने का फैसला राज्यपाल के सामने उपस्थित होकर जाहिर कर दिया है।

मौजूदा सरकार में वित्तमंत्री और कानून के जानकार अरुण जेटली ने भी इसी आशय का एक ट्वीट 2017 में किया था जो इस बात को और पुख्ता कर देता है।

जेचली का ट्वीट।

राष्ट्रपति या फिर राज्यपाल के सामने बहुमत के आंकड़े के स्पष्ट न होने से हर तरह की संवैधानिक दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। इसी तरह की एक दुर्घटना 1996 में घटित हुई थी जब तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने अटल बिहारी वाजपेयी को सबसे बड़ी पार्टी का नेता होने के नाते सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर लिया था और उनसे बहुमत के आंकड़ों की कोई जानकारी नहीं मांगी थी। बाद में वो सरकार 13 दिन के भीतर ही गिर गयी थी। जिसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ा था। 

वैसे भी वैचारिक आधार पर कांग्रेस और जेडीएस के बीच एक स्वाभाविक गठजोड़ बनता है। इनके बीच किसी तरह का अंतरविरोध नहीं है। दोनों का मूल चरित्र सेकुलर है और दोनों सांप्रदायिकता के खिलाफ हैं। सामाजिक आधार भी दोनों का कमोवेश एक है। विधानसभा के हंग होने का मतलब है कि जनता ने गठजोड़ के पक्ष में फैसला दिया है। इनके वोट का प्रतिशत भी बीजेपी के मतों से तकरीबन दोगुना है। दोनों के वोटों का प्रतिशत मिलाकर 56 फीसदी के आस-पास होता है जबकि बीजेपी को केवल 36 फीसदी वोट मिले हैं। वोट की गणित के हिसाब से सिद्धारमैया या फिर कांग्रेस बीजेपी पर भारी पड़ रहे हैं। कांग्रेस के पक्ष में तकरीबन 38 फीसदी वोट पड़े हैं जो बीजेपी से दो फीसदी ज्यादा है। इसलिए सूबे में किसी सत्ता विरोधी रुझान का भी संकेत नहीं मिलता है।

लेकिन मामला चूंकि राज्यपाल के पाले में है। इसलिए देखना होगा कि कभी मोदी के लिए अपनी सीट छोड़ने वाले वाजूभाई वाला अबकी बार संविधान के साथ होंगे या फिर मोदी के साथ?   








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