कर्नाटक ने भी चख लिया “मोदी का लड्डू”

बड़ी ख़बर , नई दिल्ली, मंगलवार , 15-05-2018


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महेंद्र मिश्र

कर्नाटक के नतीजे साफ हो गए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में जो एक चीज नहीं बदली वो है कर्नाटक का 1985 के बाद का अपना इतिहास। उसने लगातार दूसरी बार किसी सरकार को नहीं चुना था। हालांकि सिद्धारमैया उसको तोड़कर इतिहास बनाने की बात जरूर कर रहे थे। लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। हालांकि बीजेपी भी 112 के मैजिक आंकड़े को नहीं पा सकी है और उससे कुछ सीटें पीछे रहने के ही आसर हैं। और इस बीच एक एंटी क्लाइमैक्स की तरफ चीजें बढ़नी शुरू हो गयी हैं जिसमें कांग्रेस ने जेडीएस को सरकार बनाने तक का प्रस्ताव दे दिया है और पार्टी उसे बाहर से समर्थन देने के लिए तैयार है। 

अगर चुनाव नतीजों का सरसरी तौर पर विश्लेषण किया जाए तो चुनाव में मोदी सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर के तौर पर उभरे हैं। इसके साथ ही कांग्रेस की हार के पीछे सूबे में समान विचारधारा वाले दलों से गठबंधन का न बना पाना है। 

कांग्रेस और बीजेपी के तकरीबन बराबर वोट (वास्तव में कांग्रेस को 2 फीसदी ज्यादा वोट मिले हैं) बताते हैं कि सत्ता विरोधी रुझान ने उस रूप में काम नहीं किया है। लेकिन कांग्रेस के आधार वोटों खासकर दलित और अल्पसंख्यकों में बड़े स्तर पर बंटवारे ने पार्टी को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। अल्पसंख्यकों का एक हिस्सा जेडीएस के साथ गया है तो दलित जेडीएस और बीजेपी दोनों में बंट गए हैं।

बीजेपी के सबसे बड़ी पार्टी बनने के पीछे पार्टी का एक विजन के साथ काम करना बेहद अहम रहा है। जिसमें पार्टी हिंदुत्व के अपने मुद्दे को प्रचार का केंद्रीय धुरी बनाए रखी। और उसके इर्द-गिर्द ही चीजों को उसने बुनना शुरू किया। जिसमें टीपू सुल्तान का विरोध शामिल था। और नेहरू से लेकर गौरी लंकेश तक तमाम सेकुलर चेहरों के खिलाफ एक साफ और खुला संदेश था। और आखिरी वक्त में अलीगढ़ से ही जिन्ना को चुनाव प्रचार का हिस्सा बना लेना इसी रणनीति का हिस्सा था। जिसको पीएम मोदी ने झूठ बोलने की हद तक बनाए रखा। इस मुद्दे को मतदान के दिन तक जिंदा रखने के लिए पीएम मोदी नेपाल में मंदिरों का दर्शन करते रहे। और वहां खुद को प्रधान तीर्थ यात्री का दर्जा देने तक नहीं चूके। 

कांग्रेस का लिंगायत कार्ड लगता है नहीं चला। हालांकि पार्टी इसे ब्रह्मास्त्र के तौर पर देख रही थी। लेकिन आखिरी दौर में इस फैसले को लगता है जनता ने चुनाव गिमिक के तौर पर लिया और उसको बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं दी। साथ ही इसके पीछे लगता है एक और भावना काम कर रही थी जिसमें कांग्रेस को हिंदुओं में बंटवारा कराने वाली पार्टी के तौर पर भी देखा जाने लगा।

कर्नाटक को लेकर बीजेपी का विजन बिल्कुल साफ था। उसे किसी भी तरीके से चुनाव जीतना था। उसमें उसके पास हिंदुत्व को आगे बढ़ाने की पहचान का केंद्रीय एजेंडा था। साथ ही मोदी जैसा एक चेहरा था जिसका लड्डू अभी कर्नाटक ने नहीं चखा था। लिहाजा उसको लेकर भी जनता में अपने तरह की आशाएं थीं। साथ ही अमित शाह के नेतृत्व में बड़े से बड़े गठबंधन को बनाते हुए चुनाव को अपनी मुट्ठी में करने की सोच और दिशा थी। जिसमें भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद येदुरुप्पा को चेहरा बनाया गया। भ्रष्टाचार के लाख सबूतों के बावजूद रेड्डी ब्रदर्स को साथ लिया गया। और जरूरत पड़ने पर असाउद्दीन ओवैसी को सिर पर भगवा लगवा कर जेडीएस के पक्ष में प्रचार करने के लिए उतारा गया। इस तरह से देखा जा सकता है कि बीजेपी ने बड़े से बड़ा गठबंध बनाने के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ा।

लेकिन इस मोर्चे पर कांग्रेस पूरी तरह से नाकाम रही। दस साल तक गठबंधन सरकार चलाने के बावजूद कांग्रेस के लिए गठबंधन उसकी जेहनियत का स्वाभाविक हिस्सा नहीं बन पाया है। इस काम को वो बिल्कुल मजबूरी में करती है। और जहां उसके अपने बल पर सरकार के गठन की कोई संभावना रहती है वहां तो किसी तरह के गठजोड़ में जाने का वो प्रयास भी नहीं करती है। वरना देश के दूसरे हिस्सों में गठजोड़ करने की बात करने वाली पार्टी यहां इसके लिए क्यों नहीं तैयार हुई? क्या इसका कोई तर्क बनता है कि यूपी में बीएसपी बीजेपी को हराने के लिए किसी भी गठजोड़ के लिए तैयार हो जाएगी और कर्नाटक में वही बीजेपी की जीत की वजह बन जाएगी?

हालांकि अभी कर्नाटक से 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कोई आखिरी नतीजा नहीं निकाला जाना चाहिए। क्योंकि यहां भी कांग्रेस की सरकार थी। और अभी तक की बीजेपी की जीतें सूबों में सामने कांग्रेस या फिर किसी विपक्षी दल की सरकार के रहते हुई हैं। अपनी सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान को नाकाम करने का उसके पास कोई मौका नहीं आया है। बल्कि कुछ जगहों पर उपचुनावों के रूप में अगर आया भी तो उसमें बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है। लेकिन फिर भी ये बीजेपी के नैतिक मनोबल को बढ़ाने वाला नतीजा है। और 2019 की उसकी दावेदारी को और पुख्ता करता है।

और इसीलिए इस कड़ी में कांग्रेस और राहुल गांधी को कुछ चीजें जरूर समझनी होंगी। सबसे पहले उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अपना एक नया विजन तैयार करना होगा जो मोदी और बीजेपी के विजन को सरपास करता हुआ दिखे। साथ ही गठबंधन को पार्टी की जेहनियत का हिस्सा बनाना होगा। बीजेपी के दक्षिणपंथी हिंदूवादी एजेंडे के बरखिलाफ अपना भी एजेंडा बिल्कुल साफ रखना होगा। दोनों में किसी तरह का घालमेल राहुल की शख्सियत को उभरने से रोकेगा। औऱ फिर राहुल मोदी के सामानांतर उभरने की जगह उसके एक हिस्से के तौर देखने लगेंगे जो किसी भी रूप में पार्टी के लिए उचित नहीं होगा।     




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