दिल्ली की सड़क पर किसान मार्च, आहट है डगमगाते लोकतंत्र का

विश्लेषण , , शुक्रवार , 30-11-2018


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पुण्य प्रसून वाजपेयी

कोई नंगे बदन। कोई गले में कंकाल लटकाये हुये । तो कोई पेट पर पट्टी बांधे हुये । कोई खुदकुशी कर चुके पिता की तस्वीर को लटकाये हुये । अलग-अलग रंग के कपड़े । अलग-अलग झंडे-बैनर । और दिल्ली की कोलतार व पत्थर की सड़कों को नापते हजारों हजार पांव के सामानातांर लाखों रुपये की दौड़ती भागती गाड़ियां । जिनकी रफ्तार पर कोई लगाम ना लगा दे तो सैकड़ों की तादाद में पुलिसकर्मियों की मौजूदगी । ये नजारा भी है और देश का सच भी है । कि आखिर दिल्ली किसकी है । फिर भी दिल्ली की सड़कों को ही किसान ऐसे वक्त नापने क्यों आ पहुंचा जब दिल्ली की नजरें उन पांच राज्यों के चुनाव पर है जिसका जनादेश 2019 की सियासत को पलटाने के संकेत भी दे सकता है और कोई विकल्प है नहीं तो खामोशी से मौजूदा सत्ता को ही अपनाये रह सकता है । वाकई सियासी गलियारों की सांसें गर्म हैं । धड़कनें बढ़ी हुई हैं । क्योंकि जीत-हार उसी ग्रामीण वोटर को तय करनी है जिसकी पहचान किसान या मजदूर के तौर पर है ।

बीजेपी नहीं तो कांग्रेस या फिर मोदी नहीं तो राहुल गांधी । गजब की सियासी बिसात देश के सामने आ खड़ी हुई है जिसमें पहली बार देश में जनता का दबाव ही आर्थिक नीतियों में बदलाव के संकेत दे रहा है और सत्ता पाने के लिये आर्थिक सुधार की लकीर छोड़ कर कांग्रेस को भी ग्रामीण भारत की जरुरतों को अपने मैनिफेस्टो में जगह देने की ही नहीं बल्कि उसे लागू करवाने के उपाय खोजने की जरुरत आ पड़ी है । क्योंकि इस सच को तो हर कोई अब समझने लगा है कि तात्कालिक राहत देने के लिये चाहे किसान की कर्जमाफी और समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की बात की जा सकती है ।

और सत्ता मिलने पर इसे लागू कराने की दिशा में बढ़ा भी जा सकता है । लेकिन इसके असर की उम्र भी बरस भर बाद ही खत्म हो जायेगी । यानी सवाल सिर्फ ये नहीं है कि स्वामीनाथन रिपोर्ट के मद्देनजर किसानों के हक के सवाल समाधान देंखे । या फिर जिस तर्ज पर कारपोरेट की कर्ज मुक्ति की जो रकम सरकारी बैंकों के जरिये माफ की जा रही है उसका तो एक अंश भर ही किसानों का कर्ज है तो उसे माफ क्यों नहीं किया जा सकता ।

दरअसल ये चुनावी गणित के सवाल हैं देश को पटरी पर लाने का रास्ता नहीं है । क्योंकि किसानों का कुल कर्ज बारह लाख करोड़ अगर कोई सरकार सत्ता संभालने के लिये या सत्ता में बरकरार रहने के लिये माफ कर भी देती है तो क्या वाकई देश पटरी पर लौट आयेगा और किसानों की हालत ठीक हो जायेगी । ये समझ बिना डिग्री भी मिल जाती है कि जिन्दगी सिर्फ एकमुश्त रुपयों से चल नहीं सकती । वक्त के साथ अगर रुपये का मूल्य घटता जाता है । या फिर किसानी और मंहगी होती जाती है । या फिर बाजार में किसी भी उत्पाद की मांग के मुताबिक माल पहुंचता नहीं है । या फिर रोजगार से लेकर अपराध और भ्रष्टाचार से लेकर खनिज संसाधनों की लूट जारी रहती है ।

या फिर सत्ता में आने के लिये पूंजी का जुगाड़ उन्हीं माध्यमों से होता है जो ऊपर के तमाम हालातों को जिन्दा रखना चाहते हैं। तो फिर किसी भी क्षेत्र में कोई भी राहत या कल्याण अवस्था को अपना कर सत्ता तो पायी जा सकती है लेकिन राहत अवस्था को ज्यादा दिन टिकाये नहीं रखा जा सकता । और शायद मौजूदा मोदी सत्ता इसके लिये बधाई के पात्र है कि उन्होंने सत्ता के लिये संघर्ष करते राजनीतिक दलों को ये सीख दे दी कि अब उन्हें सत्ता मिली और अगर उन्होंने जनता की जरुरतों के मुताबिक कार्य नहीं किया तो फिर पांच बरस इंतजार करने की स्थिति में शायद जनता भी नहीं होगी ।

क्योंकि कांग्रेस ने अपनी सत्ता के वक्त संस्थानों को ढहाया नहीं बल्कि आर्थिक सुधार के जरियों को उसी अनुरुप अपनाया जैसा विश्व बैंक या आईएमएफ की नीतियां चाहती रहीं । लेकिन मोदी सत्ता ने संस्थानों को ढहा कर कारपोरेट के हाथों देश को कुछ इस तरह सौंपने की सोच पैदा की जिसमें उसकी अंगुलियों से बंधे धागों पर हर कोई नाचता हुआ दिखायी दे । यानी आर्थिक सुधार की उस पराकाष्टा को मोदी सत्ता ने छूने का प्रयास किया जिसमें चुनी हुई सत्ता के दिमाग में जो भी सुधार की सोच हो वह उसे राजनीतिक तौर पर लागू करवाने से ना हिचके । और शायद नोटबंदी फिर जीएसटी उस सोच के तहत लिया गया एक निर्णय भर है । लेकिन ये निर्णय कितना खतरनाक है इसके लिये मोदी सत्ता के ही आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम की नई किताब '"आफ कांउसल : द चैलेंजेस ऑफ द मोदी-जेटली इकोनामी " से ही पता चल जाता है जिसमें बतौर आर्थिक सलाहकार सुब्रहमण्यम ये कहने से नहीं चूकते कि जब मोदी नोटबंदी का एलान करते हैं तो नार्थ ब्लाक के कमरे में बैठे हुये वह सोचते हैं कि इससे ज्यादा खतरनाक कोई निर्णय हो नहीं सकता ।

यानी देश को ही संकट में डालने की ऐसी सोच जिसके पीछे राजनीतिक लाभ की व्यापक सोच हो । यानी से संकेत अब कांग्रेस को भी है कि 1991 में अपनाये गये आर्थिक सुधार की उम्र ना सिर्फ सामाजिक आर्थिक तौर पर बल्कि राजनीतिक तौर पर भी पूरे हो चले हैं । क्योंकि दिल्ली में किसानों का जमघट पूरे देश से सिर्फ इसलिये जमा नहीं हुआ है कि वह अपनी ताकत का एहसास सत्ता को करा सके । बल्कि चार मैसेज एक साथ उपजे हैं । पहला , किसान एकजुट है । दूसरा , किसानों के साथ मध्यम वर्ग भी जुड़ रहा है ।

तीसरा, किसानों की मांग रुपयों की राहत में नहीं बल्कि इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने पर जा टिकी है । चौथा , किसानों के हक में सभी विपक्षी राजनीतिक दल हैं तो संसद के भीतर साफ लकीर खिंच रही है किसानों पर मोदी सत्ता अलग-थलग है । कह सकते हैं कि 2019 से पहले किसानों के मुद्दों को केन्द्र में लाने का ये प्रयास भी है । लेकिन इस प्रयास का असर ये भी है कि अब जो भी सत्ता में आयेगा उसे कारपोरेट के हाथों को पकड़ना छोड़ना होगा ।

यानी अब इकोनामिक माडल इसकी इजाजत नहीं देता है कि कारपोरेट के मुनाफे से मिलने वाली रकम से राजनीतिक सत्ता किसान या गरीबों को राहत देने या कल्याण योजनाओं का ऐलान भर करें बल्कि ग्रामीण भारत की इकोनामी को राष्ट्रीय नीति के तौर पर कैसे लागू करना है अब परीक्षा इसकी शुरु हो चुकी है। इस रास्ते मोदी फेल हो चुके हैं और राहुल की परीक्षा बाकी है । क्योंकि याद कीजिये तो 2014 में सत्ता में आते ही संसद के सेन्ट्रल हाल में जो भाषण मोदी ने दिया था वह पूरी तरह गरीब, किसान, मजदूरों पर टिका था । लेकिन सत्ता चलाते वक्त उसमें से साथी कारपोरेट की लूट, ब्लैक मनी पर खामोशी और बहुसंख्यक जनता को मुश्किल में डालने वाले निर्णय निकले । तो दूसरी तरफ राहुल गांधी उस कांग्रेस को ढोने से बार-बार इंकार कर रहे हैं जिनके पेट भरे हुये हैं, एसी कमरों में कैद हैं और जो मुनाफे की फिलास्फी के साथ इकोनामिक मॉडल को परोसने की दुहाई अब भी दे रहे हैं ।

आसान शब्दों में कहें तो ओल्ड गार्ड के आसरे राहुल कांग्रेस को रखना नहीं चाहते हैं और कांग्रेस में ये बदलाव कांग्रेसी सोच से नहीं बल्कि मोदी दौर में देश के बिगड़ते हालातों के बीच जनता के सवालों से निकला है । और सबसे बड़ा सवाल आने वाले वक्त में यही है कि क्या राष्ट्रीय नीतियां वोट बैंक ही परखेंगी या वोट बैंक की व्यापकता राष्ट्रीय नीतियों के दायरे में आ जायेगी । क्योंकि संकट चौतरफा है जिसके दायरे में किसान-मजदूर, दलित-ओबीसी, महिला-युवा सभी हैं और सवाल सिर्फ संवैधानिक संस्थाओं को बचाने भर का नहीं है बल्कि राजनीतिक व्यवस्था को भी संभालने का है जो कारपोरेट की पूंजी तले मुश्किल में पड़े हर तबके को सिर्फ वोटर मानती है।

(ये लेख वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)








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