आंदोलनों के लिए लैंडमार्क बन गया किसानों का नासिक मार्च

ख़ास रपट , मुंबई, मंगलवार , 13-03-2018


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लोकमित्र गौतम

पिछले दो सालों से पूरे हिंदुस्तान में रह रहकर किसान अपनी निराशा, बेचैनी और गुस्से से लिपटी हताशा व्यक्त कर रहे हैं। भले राज्य सरकारों के साथ-साथ केंद्र सरकार और तमाम सियासी पार्टियों की नजर में मोतियाबिंद उतर आया हो, जिससे ये सब इस हताशा और इस गुस्से को न देख पा रहे हों। लेकिन हकीकत यही है कि पिछले साल मई-जून में जिस तरह मध्यप्रदेश में मंदसौर से लेकर रतलाम तक, महाराष्ट्र में अहमदनगर से लेकर ठाणे तक और तामिलनाडु में मदुरई से लेकर कन्याकुमारी तक किसानों ने जबरदस्त आंदोलन किया, वह इस बात का सबूत है कि किसान गुस्से में है। पिछले कुछ महीनों में ये सिर्फ तीन आंदोलन ही नहीं हुए बल्कि पिछले 18 महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में 32 से ज्यादा किसान आंदोलन हुए हैं। इन दो दर्जन से ज्यादा आंदोलनों में  सबसे ज्यादा रूलाने वाला और मानवीय गरिमा को लज्जित करने वाला किसान आंदोलन राजधानी दिल्ली में हुआ।

पिछले साल हुआ यह आंदोलन तमिलनाडु के किसानों ने किया था। इसमें किसानों ने केंद्र सरकार ही नहीं बल्कि मीडिया और देश की जनता तक का ध्यान खींचने की कोशिश में अपने अस्तित्व को बहुत नीचे गिरा दिया था, इसके बाद भी न तो केंद्र सरकार का दिल पसीजा और न ही दिल्ली की जनता ही द्रवित हुई। राजधानी दिल्ली के प्रदर्शन केंद्र जंतर-मंतर में इन किसानों ने क्या-क्या नहीं किया था? वे जानवरों की तरह चैपाये बने, ढोरों की तरह जमीन में रखे हुए खाने को चारे की तरह बिना हाथ लगाये मुंह से चबर-चबर करके खाया था, अपनी ही अर्थी निकाली थी, नरमुंडों की माला पहनी थी और प्रतीकात्मक रूप से गले में फांसी के फंदे डाले थे। लेकिन हाय रे पत्थर दिल मोदी सरकार किसानों द्वारा खुद को इस हद तक नीचे गिराने के बाद भी वह नहीं पिघली। सरकार का कोई मंत्री तो छोड़िए, कोई बड़ा अधिकारी भी किसानों से मिलने नहीं आया, उन्हें सांत्वना देने नहीं आया और प्रधानमंत्री ने तो उन्हें तमाम दूसरे मसलों की तरह अनदेखा किया ही। 

किसानों का मार्च।

इस सारी पृष्ठभूमि में 6 मार्च 2018 से अखिल भारतीय किसान सभा की अगुवाई में एक दर्जन से ज्यादा विभिन्न छोटे-छोटे कामगार संगठनों ने जो नासिक से लेकर मुंबई तक 180 किलोमीटर लंबा पैदल लांग मार्च निकाला, वह ऐतिहासिक रहा। 6 मार्च 2018 की देर शाम नासिक के सीबीएस चैराहे में करीब 10 हजार किसान इकट्ठा हुए। गौरतलब है कि दो साल पहले मार्च 2016 में भी इसी जगह एक लाख से ज्यादा किसान इकट्ठा हुए थे, दो दिनों तक अखिल भारतीय किसानसभा के बैनर तले धरना दिया था और करीब-करीब वही मांगें तब भी सरकार के सामने रखी थीं,

जिन मांगों को लेकर दो साल बाद एक बार फिर किसानों को किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक धवले और स्थानीय विधायक जेपी गावित के नेतृत्व में लांग मार्च करना पड़ा। हैरानी की बात यह है कि दो साल पहले इस धरने का भी समापन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के आश्वासनों से हुआ था, लेकिन व्यवहार में कुछ भी नहीं हुआ। यही वजह है कि 6 मार्च 2018 की देर शाम जो करीब 10 हजार किसान इकट्ठे हुए थे, वह सुबह होते-होते यानी मार्च पर रवाना होते-होते 25 हजार तक पहुंच गये।

नासिक से मुंबई की दूरी सड़क मार्ग से 180 किलोमीटर है। इन किसानों ने ऐलान किया कि वह 30 किलोमीटर हर दिन चलकर 12 मार्च की सुबह मुंबई पहुंचेंगे और महाराष्ट्र विधानसभा को तब तक घेरेंगे जब तक उनकी मांगों पर सरकार ठोस अमल का फैसला नहीं करती। अखिल भारतीय किसान सभा ने एक महीने पहले ही मुंबई में एक दिन का सांकेतिक प्रदर्शन करके और प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह स्पष्ट कर दिया था कि अगर एक महीने में महाराष्ट्र की फडनवीस सरकार किसानों की मांग नहीं मानती तो नासिक टू मुंबई कूच किया जायेगा।

जिसकी परिणति विधानसभा को अनिश्चित काल तक के लिए घेराव में होगा। लेकिन इतनी दो टूक घोषणा के बाद भी फडनवीस सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया कि किसानों को अपने कहे पर अमल करने की नौबत न आती। हद तो यह है कि मीडिया ने भी इसको तव्वजो नहीं दिया, जबकि मीडिया इस बात को भली भांति समझ रहा था कि देश भर में किसान उबल रहे हैं। अभी पिछले ही दिनों राजस्थान में किसानों के ऐसे ही भड़के आंदोलन की अखबारी सुर्खियां भी तब तक विस्मृत नहीं हुईं थीं। इसके बाद भी मीडिया ने अखिल भारतीय किसानसभा की चेतावनी को महत्व नहीं दिया। 

लेकिन सोचा जाए तो अच्छा ही किया, क्योंकि नासिक से मुंबई तक का लांग मार्च न सिर्फ सफल रहा बल्कि इसने अपने चाल, चरित्र और चेहरे से महज किसानों, मजदूरों, आदिवासियों को ही नहीं बल्कि देश के मध्यवर्ग को भी झकझोर करके जगा दिया है। अगर ऐसा नहीं होता तो इस मार्च के मुंबई पहुंचने के बाद हजारों की संख्या में खुशहाल मध्यवर्गीय जीवन बिताने वाले लोग, किसानों के लिए गर्म पराठा, चाय, पानी की बोतल, साफ तौलिया और नये चप्पल लेकर न खड़े मिलते। इस सबकी वजह से नासिक टू मुंबई लांग मार्च ऐतिहासिक हो गया है।

हाल के सालों का शायद यह ऐसा पहला आंदोलन है, जो देश के नेताओं पर तो कोई फर्क नहीं डाल पाया और अभी यह भी नहीं माना जा सकता कि महाराष्ट्र की राज्य सरकार ने किसानों की जो करीब-करीब सभी मांगे मानी हैं, उन्हें वह सचमुच दिल से मानेगी या फिर आंदोलन की तात्कालिक रूप से हवा निकालने के लिए ही यह बड़ा फैसला लिया है और कुछ दिनों के बाद अपने उसी ढर्रे व रवैये पर लौट आयेगी? जैसे पिछले दिनों यह सरकार खुद और उसके पहले दूसरी सरकारें लौटती रही हैं।

लेकिन इस नासिक टू मुंबई लांग मार्च ने कई मायनों में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। हाल के सालों में जब लगातार आंदोलनों की विफलता और देश के बहुसंख्यक आम लोगों की इनके प्रति उदासीनता से प्रतिरोध की यह परंपरा अर्थहीन होने लगी थी, उस समय इस लांग मार्च ने फिर से आंदोलनों की नैतिक प्रतिष्ठा स्थापित की है। कहने और सुनने के लिए यह भले किसान आंदोलन माना जा रहा हो, लेकिन इसमें जीवनयापन की भीषण परेशानियों से गुजर रहे समाज के बहुत सारे तबके शामिल थे, जिनमें सबसे ज्यादा संख्या किसानों की थी,

फिर किसानी से जुड़े तमाम काम करने वाले मजदूरों की थी। इसके अलावा इसमें मछली पकड़ने वाले मछुआरों और जंगलात उत्पादों के जरिये रोजी रोटी कमाने वाले बड़े पैमाने पर आदिवासी शामिल थे। यह एक किस्म से सही मायनों में ग्रामीण मेहनतकश लोगों का मुखर आंदोलन था, जिसके केंद्र में किसान थे और तमाम मांगों का जरिया भी किसान और कृषि से जुड़ी सहूलियतें थीं। 

किसान मार्च में एक बुजुर्ग महिला।

बहरहाल जब 7 मार्च 2018 को सुबह 6 बजे यह मार्च नासिक से शुरु हुआ और वाया आगरा-मुंबई राजमार्ग आगे बढ़ने लगा तो करीब-करीब हर एक किलोमीटर की दूरी में इस मार्च में दो सौ से लेकर पांच सौ तक लोग शामिल होने लगे। हर दिन 30 किलोमीटर का सफर करने वाले इस कूच में बहुत कुछ ऐतिहासिक था। सालों बाद यह आंदोलन अपने उच्च नैतिक अनुशासन से गांधी जी के आंदोलनों की याद दिला रहा था। इस मार्च में शामिल हुए तमाम मेहनतकश लोग अपने हिस्से का राशन और पानी तक लेकर साथ चले थे और उसमें भी वह कम से कम एक और व्यक्ति की हिस्सेदारी की कोशिश कर रहे थे।

हालांकि पूरे रास्ते जगह-जगह गांव के गरीब गुरबा, आंदोलनकारियों को रोक रोककर भाखरी, (ज्वार, बाजरे की बड़ी-बड़ी रोटियां) चटनी, मट्ठा, बेल का शर्बत और जो भी उनसे हो सकता था या संभव था, उसे मुहैया करा रहे थे। हिंदी, मराठी, पारधी और कहीं-कहीं मराठी मिश्रित गुजराती में लगातार जनवादी नारों का घोष करते हुए इन आंदोलनकारियों का यह कारवां जैसे-जैसे आगे बढ़ा, नैतिकता की मिसाल बनता गया। इस आंदोलन में पहली बार बहुत बड़ी संख्या में आदिवासी शामिल हुए, यह अलग बात है कि हमारे ज्यादातर मीडियाकर्मी किसानों और आदिवासी किसानों में फर्क नहीं जानते, इसलिए वह सबको किसान ही कहते रहे। इस आंदोलन की बहुत साफ मांगे थीं, जो इस प्रकार थीं- 

- कृषि उपज संबंधी स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को तुरंत पूरी तरह से लागू किया जाये जिसमें किसानों को उनकी पूरी लागत के अतिरिक्त 50 फीसदी लाभ की गारंटी दी जाए। 

- महाराष्ट्र के सभी किसानों के सभी तरह के कर्ज पूरी तरह से माफ किये जाएं। जिसमें 2001 से 2008 के बीच वंचित किसानों को मिला कर्ज भी शामिल हो और कृषि कर्ज के साथ ही सावधि कर्ज भी जुड़ा हो। 

- नदी जोड़ योजना के तहत महाराष्ट्र की नदियों का पानी महाराष्ट्र को ही दिया जाये।

- वन्य जमीन पर पीढ़ियों से खेती करते आ रहे किसानों को जमीन का मालिकाना हक दिया जाए।

- संजय गांधी निराधार योजना का लाभ किसानों को दिया जाये और इसके तहत सहायता राशि 600 रुपये प्रतिमाह से बढ़ाकर 3000 रुपये की जाए।

- जीर्ण-शीर्ण राशन कार्ड बदलकर उनकी जगह नये राशन कार्ड दिये जाएं।

हैरानी की बात यह है कि किसानों की इन तमाम मांगों में एक भी मांग ऐसी नहीं थी, जो पहली बार सामने आयी हो, या जिसे महाराष्ट्र की विभिन्न सरकारों ने अलग-अलग समय में स्वीकार न किया हो। लेकिन सरकारों का जैसा कि चरित्र होता है, वे आंदोलनों के प्रभाव और आंदोलकारियों के गुस्से को फुस्स करने के लिए मांगें तो मान लेते हैं लेकिन बाद में बहुत काईयां ढंग से उन पर अमल नहीं करते। इसलिए 12 मार्च को आंदोलनकारियों के सामने पूरी तरह से झुकते हुए देवेंद्र फडनवीस की सरकार ने तमाम मांगें तो मान ली है, लेकिन ये मांगें वह पूरी भी करें इस पर भी न सिर्फ किसानों को बल्कि उन तमाम लोगों को नजर रखनी होगी, जो लोग बदहाल अन्नदाताओं से सहानभूति रखते हैं और इस देश में न्याय और लोकतंत्र को बनाये रखना चाहते हैं।

नासिक टू मुंबई लांग मार्च अपनी मौजूदगी के हर तरीके में बेहद सफल, ऐतिहासिक और नैतिक मानदंडों को स्थापित करने वाला साबित हुआ है। इसने न सिर्फ देश में हताश लोगों में हौसला भरा है, उनमें प्राण फूंके हैं बल्कि जिस तरह से मुंबई का मध्यवर्ग इन किसानों की भलाई के लिए घर से निकलकर इनके साथ कदम से कदम मिलाकर कुछ दूर चला, वह भी मानवीय गरिमा स्थापित करने वाली एक बड़ी सफलता है। इन कई वजहों से यह लांग मार्च किसान आंदोलनों के इतिहास में हमेशा अपनी जगह बनाकर रखेगा।

(लोकमित्र गौतम वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल मुंबई में रहते हैं।)






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