लोया केस: रोहतगी ने रखा महाराष्ट्र सरकार का पक्ष, कहा-डांडे में हुई थी ईसीजी,जल्द दिखाऊंगा रिपोर्ट

ख़ास रपट , नई दिल्ली, मंगलवार , 13-02-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। सीबीआई जज लोया की मौत के मसले पर सुप्रीम कोर्ट में जारी सुनवाई में सोमवार को बारी वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी की थी। रोहतगी ने महाराष्ट्र सरकार की तरफ से अपना पक्ष पेश किया। आपको बताते चलें कि लोया की मौत की जांच के लिए कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गयी हैं। जिसमें मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की गयी है। 

ये सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में जस्टिस एएम खानविल्कर और डीवाई चंद्रचूड को लेकर बनी बेंच में सोमवार को 2 बजे शुरू हुई। रोहतगी की शुरुआती दलील यही थी कि ये याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट की पीआईएल संबंधी बुनियादी मानदंडों पर ही खरी नहीं उतरती हैं।

इस संबंध में उन्होंने 2000 के स्टेट आफ उत्तरांचल बनाम बलवंत सिंह चुफाल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उदाहरण दिया। 

उन्होंने कहा कि “अदालत को पीआईएल दायर करने वालों की साख की जांच करनी चाहिए....कोर्ट को इस बात से संतुष्ट होना चाहिए कि याचिका में बड़ा सार्वजनिक हित शामिल है या नहीं।”

उनका कहना था कि मौजूदा याचिकाएं इन शर्तों को नहीं पूरा कर रही हैं। उन्होंने कहा कि “मौजूदा याचिकाएं एक जज की मौत को सनसनी बनाने के इरादे से प्रेरित हैं।”

उनका मुख्य तर्क ये था कि याचिकाएं लोया की मौत के तीन साल बाद दायर की गयी हैं और पूरी तरह से पत्रिका और अखबार की रिपोर्टों पर आधारित हैं। उन्होंने ये भी कहा कि ऐसी याचिका का कतई स्वागत नहीं किया जा सकता है जो केवल इस तरह की अखबारी रिपोर्ट पर आधारित हो। 

उनका कहना था कि “उनकी मौत दिसंबर 2014 में हुई। कोई भी तीन साल तक कुछ नहीं किया। न पीड़ित कुछ किए और न ही पीआईएल याचिकाकर्ता। 

एक लेख कारवां मैगजीन में आता है जो पूरी तरह से आधारहीन है। उसके बाद बांबे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं की बाढ़ आ जाती है।

ये पहले से ही स्थापित कानून है कि सामान्य तौर पर केवल अखबारों की रिपोर्टों पर आधारित याचिकाओं को स्वीकार नहीं किया जाएगा। सभी याचिकाएं कारवां में प्रकाशित एक लेख पर आधारित हैं। इन याचिकाकर्ताओं में किसी ने भी सच का पता लगाने के लिए कुछ नहीं किया।”

इन याचिकाओं को न्यायपालिका को बदनाम करने की गलत मंशा से दायर किए जाने की बात कहते हुए उन्होंने कहा कि “वहां रोजाना अखबारों में विरोधाभासी रिपोर्टें होंगी। कोर्ट उन सभी पर नजर नहीं रख सकता है। ये सब कुछ जो हो रहा है उसके पीछे कोई छिपा उद्देश्य है। ये सब कुछ न्यायपालिका और अदालतों को बदनाम करने के लिहाज से किया जा रहा है। केवल इसलिए क्योंकि इसमें सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़ा हुआ एक खास राजनीतिक कार्यकर्ता शामिल है। इसका ये मतलब नहीं है कि उसने जजों और अदालतों को बंधक बना लिया है....ये सब कुछ एक गलत मंशा के साथ किया गया है और न्यायपालिका की चिंता से बाहर नहीं है।”

रोहतगी ने ये भी कहा कि राज्य सरकार ने अपनी खुद की जांच की थी और उसमें किसी तरह की गड़बड़ी नहीं मिली।

उन्होंने कहा कि “वहां कोई गड़बड़ी नहीं है और एक विवेकशील जांच के बाद सरकार संतुष्ट है। अब ये ज्यादा उचित होगा कि इस मुद्दे पर पर्दे को गिरा दिया जाए।”

उसके बाद रोहतगी चुफाल मामले के प्रकाश में मौजूदा याचिका के तत्वों, शपथ पत्रों और याचिकाकर्ताओं की साख पर बहस करने के लिए आगे बढ़े।

उन्होंने कहा कि “एक याचिका तहसीन पूनावाला ने दायर की है जो पूरे समाज के कल्याण के लिए काम करने का दावा करते हैं। याचिकाकर्ता कौन है? वो क्या करता है? जज लोया की मौत से समाज का लाभ कैसे जुड़ा हुआ है? उससे भी आगे सूचना का पूरा स्रोत मीडिया और न्यूजपेपर की रिपोर्टें हैं- याचिका खुद कहती है इंडियन एक्सप्रेस, कारवां, एनडीटीवी- बस इससे ज्यादा कुछ नहीं। सुप्रीम कोर्ट आने से पहले तथ्यों की कोई जांच नहीं की गयी। आरोपों की प्रकृति में भी पूरी लापरवाही दिखती है। एक आधार ये गिनाया गया है कि पोस्टमार्टम बगैर परिवार की सहमति के किया गया। जज लोया का मेडिट्रिना अस्पताल के रास्ते में ही निधन हो गया था और उन्हें मृत लाया गया था। इसी वजह से अस्पताल ने पोस्टमार्टम को करने का निर्देश दिया क्योंकि वो मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं जारी कर सकता था। उसके लिए परिवार की किसी तरह की सहमति की जरूरत नहीं थी।”

उन्होंने आगे कहा कि “एक दूसरी याचिका बंधुराज संभाजी लोने द्वारा दायर की गयी है जो एक पत्रकार-सामाजिक कार्यकर्ता हैं। एक बार फिर सूचना का स्रोत अखबार और मीडिया रिपोर्टें हैं। जाहिर तौर पर कारवां फिर एक बार स्रोत है जिसके जरिये राज्य सरकार की जांच पर सवाल खड़ा किया जा सकता है। और मामले को एक अपील के तौर पर ले लिया गया। उससे भी आगे एक और आधार के लिए उदाहरण अखबारों में छपी विरोधाभासी खबरों को बनाया गया है। वो कैसे मायने रख सकता है? आखिर में ये कैसे कहा जा सकता है कि पूरा कथन सत्य है और मेरी जानकारी में सही है? अब समय आ गया है जब कोर्ट और रजिस्ट्री को ये बताना चाहिए कि शपथपत्र क्या होता है।”। 

बांबे लायर्स एसोसिएशन की याचिका पर जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही बांबे हाईकोर्ट से अपने पास स्थांतरित कर लिया है, उन्होंने कहा कि “ऐसा कहा गया है कि याचिकाकर्ता वकीलों का एक निकाय है।  इसका रजिस्ट्रेशन और कौन है इसका पदाधिकारी? इसके बारे में कुछ नहीं बताया गया है। उससे भी आगे जज उत्पट के तबादले के तीन साल बाद 2017 में ट्रायल शुरू होता है। तबादले से संबंधित तथ्य पूरी तरह से अप्रासंगिक है। क्यों एसोसिएशन कारवां में आर्टिकिल छपने के बाद ही हाईकोर्ट गया? तबादले के समय नहीं? जब उन्हें सच्चाई के बारे में पता था।”

अशोक अस्थाना के शपथ पत्र का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि “जो भी अखबार में दावा किया जाता है वो “ज्ञान” बन जाता है। जस्टिस खानविल्कर के ये सवाल पूछने पर कि अशोक अस्थाना कौन है। रोहतगी ने कहा कि कुछ नहीं पता। हम नहीं जानते कि कौन-कौन पदाधिकारी हैं।” इस बिंदु पर एसोसिएशन का प्रतिनिधित्व कर रहे दुष्यंत दवे ने कहा कि “पीआईएल में इस तरह के तकनीकी मामलों का कोई मतलब नहीं होता है।”

इसके बाद पीआईएल की वैधता और प्रासंगिकता पर उन्होंने फैसलों की एक पूरी श्रृंखला गिना डाली। जिसमें कुसुमलता बनाम यूओआई, रोहित पांडेय बनाम यूनियन आफ इंडिया, बीपी सिंघल बनाम स्टेट आफ तमिलानाडु शामिल थे।

उन्होंने कहा कि “ सवाल ये है कि जज लोया की मौत किसी चिकित्सकीय बीमारी से हुई या नहीं। अगर नहीं तो इसका मतलब है कि उनकी मौत अस्वाभाविक थी। इस बात पर कोई सवाल नहीं है कि उनका उचित इलाज कराया गया या नहीं। उसकी भरपाई पर भी कोई सवाल नहीं है।” इसके बाद रोहतगी ने नवंबर 2017 में बांबे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को कमिश्नर ऑफ स्टेट इंटेलिजेंस द्वारा लिखे गए पत्र का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि “ पत्र का विषय कहता है ‘विवेकशील सत्यापन’। कमिश्नर द्वारा जिले और हाईकोर्ट के जजों से संपर्क करने के लिए अनुमति मांगी जाती है। हालांकि पहले के सम्मान में चीफ जस्टिस अनुमति दे देते हैं।”

उसी समय रोहतगी केस का मेरिट के आधार पर परीक्षण करने की दिशा में आगे बढ़े। इस संबंध में उनके तर्क काफी हद तक चार जजों के बयानों पर आधारित थे जिन्होंने सामने आकर कहा था कि लोया की मौत बिल्कुल स्वाभाविक थी।

उन्होंने कहा कि “गवाह के तौर पर मौजूद चार अतिरिक्त जिला जजों के बयानों को खारिज करने के बाद ही कोर्ट एक जांच का आदेश दे सकता है। ये जज उनके साथ (जज लोया) अंत तक थे। चीफ जस्टिस समेत हाईकोर्ट के जजों को उसी समय सूचना दे दी गयी थी। यही वजह है कि वो लोग सुबह 7 बजे मेडिट्रिना अस्पताल पहुंच गए थे।”

चार जजों के बयानों के बारे में रोहतगी ने कहा कि चारों जजों ने बयान को अपने लेटरहेड पर और हस्ताक्षर करने के बाद जारी किया था।

उन्होंने कहा कि “ये ऐसा बयान नहीं है जिसे पुलिस अफसरों ने लिखा हो। उनके लेटरहेड पर जारी इन बयानों पर उनके हस्ताक्षर थे। मामले की सच्चाई ये है कि चारों जज हमेशा लोया के साथ थे।”

इस संदर्भ में वो जज श्रीकांत कुलकर्णी के बयान के एक हिस्से को कोट करते हैं। “ सुश्री स्वपना जोशी ने श्री मोदक, श्री लोया और मुझे आमंत्रित किया था......हम रवि भवन में वीआईपी स्यूट में ठहरे थे.....30 नवंबर 2014 की रात को हम लोग जोशी की बेटी की शादी के रिसेप्शन में शामिल हुए....1 दिसंबर 2014 को बिल्कुल सुबह श्री लोया ने सीने में दर्द की शिकायत की....हमने जज बर्डे को फोन किया जो सुबह 4.15 के आस-पास जज आर राठी के साथ आए.....हम जज लोया को डांडे अस्पताल ले गए जहां उनका इमरजेंसी इलाज किया गया....एक दूसरे स्थानीय जज वायकर भी अपनी कार से पहुंच गए.....जज राठी ने उनके चचेरे भाई डॉ. पंकज हरकुट को बुलाया....हम लोग जज लोया को मेडिट्रिना अस्पताल लेकर भागे.....उनका रास्ते में ही निधन हो गया.....मेडिट्रिना में उन्हें स्ट्रेचर पर रखा गया था....सीपीआर का उन पर कोई असर नहीं हुआ....हमको बताया गया कि उनकी मौत हो गयी है......हमने हाईकोर्ट के जजों को इसकी सूचना दी जो आधे घंटे में वहां पहुंच गए थे.....जज लोया की शरीर के पोस्टमार्टम के लिए नागपुर के दो स्थानीय मजिस्ट्रेटों को साथ भेजा गया ।”

जज मोदक के बयान के मुताबिक “ मेरे भाई की मौत के बाद तीन साल का गैप हो गया है....ये पत्र मेरी याददाश्त पर आधारित है जिसे मैं फिर से याद कर सकता हूं.....मैं जज कुलकर्णी और लोया के साथ एक शादी में गया था.....हम एक ही कमरे में ठहरे थे......हमने शायद जज बर्डे और आर राठी को बुलाया था.....जज लोया को डांडे ले जाया गया था.....मुझे ये भी याद है कि एक और स्थानीय जज वायकर डांडे में मौजूद थे......मुझे ये नहीं याद है कि किसने लोया के परिवार को सूचना दी.....”

रोहतगी ने इसको और साफ करते हुए कहा कि “परिस्थितियों में आपाधापी के चलते ये याद करना संभव नहीं हो सका कि किस जज ने परिवार को फोन किया था। ये कैसे प्रासंगिक है? घटना के बाद तीन साल हो गया है और उनकी याददाश्त भी धूमिल हो गयी है। वो एक कमरे में क्यों ठहरे वो ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। सच्चाई ये है कि तीन जज एक रूम में रुके।”

जज बर्डे के पत्र को पढ़ते हुए उन्होंने कोट किया कि “ मुझे जज कुलकर्णी ने सुबह तकरीबन 4 बजे रिसीव किया.....मैं जज राठी के साथ रविभवन पहुंचा.....हम पांच लोग डांडे अस्पताल की तरफ चल दिए.....जज वायकर को भी बुलाया गया था......जज राठी द्वारा उनके चचेरे भाई डॉ. पंकज हरकुट को बुलाए जाने के बाद हम मेडिट्रिना अस्पताल की तरफ चल दिए.....हम लोगों ने जज लोया के हाजी अली के मित्र से संपर्क किया था.....दो दूसरे जजों के साथ सुबह 10 बजे शरीर को पोस्टमार्टम के लिए ले जाया गया.... ”

आखिर में उन्होंने जज रूपेश आर राठी के बयानों के कुछ हिस्से को पढ़ा जिसनमें कहा गया था कि डांडे अस्पताल की ईसीजी मशीन टूटी हुई थी। रोहतगी ने कहा कि “ विवेकशील जांच की प्रक्रिया में दिए गए इन चार जजों के बयान उनकी याददाश्त पर आधारित हैं जो 1 दिसंबर 2014 को घटित हुआ था। छोटी-मोटी खामियां जिसमें समय और किसने किसको फोन किया शामिल हैं प्रासंगिक नहीं होनी चाहिए।”

मेडिट्रिना अस्पताल द्वारा मृत्य प्रमाणपत्र देने की जगह पोस्टमार्टम करने का निर्देश देने के सवाल पर रोहतगी ने कहा कि “उन्हें अस्पताल में मृत लाया गया था। वो अस्पताल में नहीं मरे थे। इसलिए वो मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं जारी कर सकते थे क्योंकि उनका निधन पहले ही हो गया था। इसलिए उसने पोस्टमार्टम का सुझाव दिया।”

उसके बाद रोहतगी घटनाओं की श्रृंखला की तरफ बढ़े जो चारों जजों के बयानों पर आधारित थीं।

चारों जजों के बयानों में विरोधाभास होने के बारे में उनका कहना था कि बयानों में छोटे-मोटे अंतर से बयानों पर अविश्वास करने का कोई कारण नजर नहीं आता है।

उन्होंने कहा कि “इसमें जजों के बयानों पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है क्योंकि उनके पास पीसने के लिए कोई कुल्हाड़ी नहीं थी। यहां और वहां उनके बयानों में कुछ अंतर हो ही सकता है क्योंकि घटना बहुत साल पहले हुई थी लेकिन वो सब कुछ अप्रासंगिक है। वास्तव में अगर हर गवाह तोते की तरह कुछ याद किए रहा होता तब जरूर उसके बारे में संदेह होता।”

ईसीजी से संबंधित विवादित मुद्दे के संदर्भ में रोहतगी ने कहा कि “डांडे में ईसीजी की गयी थी। उसकी रिपोर्ट पुलिस के रिकार्ड का एक हिस्सा है जिसे मैं दिखाऊंगा। अपने बयान में जज बर्डे ने कहा है कि ड्यूटी पर मौजूद मेडिकल अफसर ने ईसीजी के माध्यम से जज लोया का परीक्षण किया था। जज राठी ने कहा है कि ईसीजी मशीन टूटी हुई थी एक स्वाभाविक अंतरविरोध है। ऐसा केवल एक जज को लगा। जहां तक मेडिसिन की बात है तो उस मामले में जज ले मैन होते हैं और वो कुछ अलग सोच ही सकते हैं।”

अगली सुनवाई शुक्रवार को होगी।

https://www.youtube.com/watch?v=Px0ON-cXBms

(कुछ इनपुट बार एंड बेंच के साथ लाइवलॉ पोर्टल से लिए गए हैं।)










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